देश का ऑटो सेक्टर पिछले 19 सालों के सबसे खराब दौर से गुजर रहा है. हालत यह है कि पिछले 18 महीनों में इस क्षेत्र से जुड़े 286 से ज्यादा आउटलेट बंद हो चुके हैं और कम से कम 15,000 नौकरियां खत्म हुई हैं. वहीं, इस क्षेत्र के विशेषज्ञों का कहना है कि ग्राहकों की मांग और नकदी की कमी से हालात अभी और खराब होने वाले हैं. वहीं, वाहन बनाने वाली कंपनियां अब नई तकनीक अपना रही हैं जिससे उनके उत्पाद और ज्यादा महंगे हो जाएंगे.

सोसायटी ऑफ इंडियन ऑटोमोबाइल मैन्युफैक्चरर्स (एसआईएएम) के आंकड़ों के मुताबिक बीते जुलाई में घरेलू वाहनों की बिक्री में 19 प्रतिशत तक की गिरावट दर्ज की गई है. इंडियन एक्सप्रेस में प्रकाशित खबर के मुताबिक इससे पहले साल 2000 में घरेलू वाहनों की बिक्री में 22 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई थी. इस स्थिति के लिए गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों, नकदी की कमी और ग्राहकों के बढ़ते अविश्वास को प्रमुख रूप से जिम्मेदार बताया जा रहा है.

उधर, भारत स्टेज-6 उत्सर्जन मानकों के तहत कंपनियों को अनिवार्य रूप से अपने वाहनों को अप्रैल, 2020 तक अपग्रेड भी करना है. इससे वाहनों की कीमतें बढ़ना तय माना जा रहा है. ऐसे में काफी संभावना है कि गाड़ियों की बिक्री और कम हो जाए. अखबार ने एक कार कंपनी के वरिष्ठ अधिकारी के हवाले से बताया कि आम तौर पर डिस्काउंट ऑफर देकर इस तरह की स्थिति से निपटा जाता है. लेकिन नए उत्सर्जन नियमों की वजह से इस बार यह विकल्प भी कारगर नहीं होने वाला.

रिपोर्ट के मुताबिक मारुति सुजुकी ने अपने नए उत्पादों की कीमत दस से 16 हजार रुपये तक बढ़ा दी है. मंगलवार को इंडिया यामाहा मोटर ने भी कहा कि उसके दोपहिया वाहन दस से 15 प्रतिशत तक महंगे हो सकते हैं. यह स्थिति थ्री-व्हीलर वाहन बनाने वाली कंपनियों के साथ भी हो सकती है. नए उत्सर्जन नियमों के तहत उन्हें 2023 तक इलेक्ट्रिक वाहन बनाने पर जोर देना है.

इससे पहले मंगलवार को खबर आई कि जुलाई में घरेलू यात्री वाहनों की बिक्री में करीब 31 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई है. एसआईएएम के मुताबिक घरेलू कारों की बिक्री 35.95 प्रतिशत घटी है. वहीं, मोटरसाइकल की बिक्री में 18.88 प्रतिशत की कमी आई है. सभी प्रकार के दोपहिया वाहनों की बात करें तो उनकी बिक्री में कुल 16.82 प्रतिशत की गिरावट आई है. इसके अलावा व्यावसायिक वाहनों की बिक्री 25.71 प्रतिशत तक कम हो गई है.