लगातार दूसरे आम चुनाव में कांग्रेस को मिली करारी हार के तुरंत बाद से कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी इस पद से अपने इस्तीफे पर अड़े हुए थे. पार्टी में उन्हें मनाने की काफी कोशिशें हुईं, लेकिन उन्होंने अपना फैसला नहीं बदला. अगले कांग्रेस अध्यक्ष के नाम के बारे में बार-बार वे कहते रहे कि इस पद पर गांधी परिवार के बाहर के किसी व्यक्ति की नियुक्ति होनी चाहिए. लेकिन तमाम नए नामों की अटकलों के बीच बीते दिनों जब इस काम के लिए कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक हुई तो 19 सालों तक कांग्रेस अध्यक्ष रहीं सोनिया गांधी को ही फिर से अंतरिम अध्यक्ष नियुक्त कर दिया गया.

इसके बाद से इस नियुक्ति को लेकर तरह-तरह की बातें चल रही हैं. राजनीतिक विश्लेषक कह रहे हैं कि कांग्रेस एक कदम आगे बढ़ने के बजाए और पीछे चली गई है. 19 सालों तक कांग्रेस अध्यक्ष रहने के बाद जब सोनिया गांधी ने 2017 में यह पद छोड़ा था तो लगा था कि कांग्रेस में नेतृत्व के स्तर पर पीढ़ी बदल रही है. लेकिन एक बार फिर से सोनिया गांधी के हाथों में कमान जाने से कांग्रेस में नई पीढ़ी के नेतृत्व की स्थिति में आने की संभावनाओं को लेकर तरह-तरह की आशंकाएं व्य​क्त की जा रही हैं.

इस सबके बीच कांग्रेस और पार्टी के बाहर के लोगों में भी यह चर्चा चल रही है कि राहुल गांधी के इस्तीफे के बाद अगर गांधी परिवार से ही किसी को नेतृत्व देना था तो सोनिया गांधी के मुकाबले प्रियंका गांधी बेहतर विकल्प होतीं. प्रियंका गांधी को कांग्रेस अध्यक्ष बनाने के पक्ष में कई तर्क दिए जा रहे हैं.

एक वरिष्ठ कांग्रेसी नेता नाम न छापने की शर्त पर कहते हैं, ‘कांग्रेस के लिए गांधी परिवार एक बोझ नहीं बल्कि पूरी पार्टी को एकसूत्र में बांधकर चलने वाली ताकत है. ऐसे में अगर प्रियंका गांधी अध्यक्ष बनतीं तो कमान गांधी परिवार की नई पीढ़ी के हाथों में होती. परिवार के बाहर से अध्यक्ष लाने की स्थिति में पार्टी के अंदर बनी खेमेबंदी की आशंका भी इससे खत्म हो जाती.’ वे आगे कहते हैं कि कांग्रेस में जब भी गांधी परिवार के बाहर का कोई अध्यक्ष बना है तो पार्टी खेमों में बंटी है लेकिन जब-जब कमान गांधी परिवार के हाथ में आई है तब यह खेमेबाजी खत्म हुई है और पूरी ताकत गांधी परिवार से आने वाले कांग्रेस अध्यक्ष पर केंद्रित हुई है.

जानकारों के मुताबिक सोनिया गांधी की जगह अगर प्रियंका गांधी कांग्रेस अध्यक्ष बनतीं तो पूरी पार्टी में नई पीढ़ी का नेतृत्व विकसित होने की संभावना रहती. पार्टी में नेतृत्व के स्तर पर युवा पीढ़ी को आगे लाने का जो काम बतौर कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने शुरू किया था, उसे प्रियंका गांधी आगे बढ़ा सकती थीं. राहुल गांधी कांग्रेस कार्यसमिति में नए लोगों को नहीं ला पाए थे. इस काम को कांग्रेस अध्यक्ष के तौर पर प्रियंका गांधी अंजाम दे सकती थीं.

प्रियंका गांधी को कांग्रेस अध्यक्ष पद पर लाने का एक लाभ यह भी होता कि इसके बाद कांग्रेस पार्टी युवाओं में अपनी स्थिति मजबूत करने की कोशिश कर सकती थी. पार्टी के एक युवा नेता कहते हैं, ‘प्रियंका गांधी जब राजनीति में पूरी तरह से सक्रिय नहीं थी तब भी और राजनीति में आने के बाद भी उनकी सभाओं में अच्छी-खासी संख्या में युवा आते रहे हैं.’ जब वे कांग्रेस में महासचिव के तौर पर आई ही थीं तब भी राजनीतिक जानकारों ने कहा था कि पार्टी युवाओं में अपनी स्थिति मजबूत करने के लिए उनका ठीक से इस्तेमाल नहीं कर रही है. कई मानते हैं कि अगर वे कांग्रेस अध्यक्ष बन गई होतीं तो पार्टी की ओर से नए सिरे से युवाओं में पैठ बनाने की कोशिश की जा सकती थी.

प्रियंका गांधी के अध्यक्ष बनने से कांग्रेस महिलाओं के बीच भी अपनी स्थिति मजबूत करने की कोशिश कर सकती थी. पार्टी की एक महिला नेता कहती हैं, ‘ऐसा करके कांग्रेस भाजपा के खिलाफ इस बात को मुद्दा बना सकती थी कि आज तक भाजपा में किसी महिला को अध्यक्ष नहीं बनाया गया इसलिए महिलाओं की चिंता करने वाली पार्टी कांग्रेस ही है.’ कुछ लोग यह भी मानते हैं कि प्रियंका गांधी जिस तरह से बोलती हैं, उससे ​महिलाओं के बीच वे आकर्षण पैदा करके उन्हें कांग्रेस पार्टी के पक्ष में करने की कोशिश कर सकती थीं.

जानकारों के मुताबिक प्रियंका गांधी को अध्यक्ष बनाने का पार्टी को एक और फायदा हो सकता था. जिस तरह से भाजपा के शीर्ष नेता नरेंद्र मोदी और अमित शाह समेत पार्टी के अन्य नेता राहुल गांधी के खिलाफ हमलावर रुख अपनाए रखते हैं, उसी तरह का रुख प्रियंका गांधी के खिलाफ अपनाना उनके लिए मुश्किल होता. राहुल गांधी पर होने वाले सियासी हमलों की स्थिति में कई बार खुद राहुल गांधी और कांग्रेस के दूसरे नेता भी जवाब की मुद्रा में ही रहते हैं. प्रियंका गांधी के आने से यह स्थिति थोड़ी बदल सकती थी.

हालांकि ऐसा मानने वाले भी हैं कि कांग्रेस अध्यक्ष के तौर पर प्रियंका गांधी को लाने से पार्टी को नुकसान भी हो सकता था. पार्टी के एक अन्य नेता कहते हैं, ‘इससे भाजपा और दूसरे लोगों को यह कहने का अवसर मिल सकता था कि कांग्रेस पार्टी गांधी परिवार से बाहर नहीं सोच सकती.’ हालांकि कई दलील देते हैं कि यह बात तो सोनिया गांधी को अंतरिम अध्यक्ष बनाने के बाद भी कही जा रही है.

कइयों के मुताबिक प्रियंका गांधी को कांग्रेस अध्यक्ष बनाने का दूसरा नुकसान यह हो सकता था कि उनके पति रॉबर्ट वाड्रा के खिलाफ चल रहे मामलों में सरकार तेजी बरतते हुए पति-पत्नी दोनों को घेरने की कोशिश करती और इसकी आंच कांग्रेस पार्टी तक भी आती. ऐसी​ स्थिति प्रियंका गांधी और कांग्रेस दोनों को असहज करती. हालांकि भारतीय राजनीति में कई बड़े नेता ऐसे हुए हैं जिन्होंने अपने खिलाफ होने वाले वाजिब कार्रवाइयों में भी खुद को जनता की नजरों में ‘पीड़ित’ के तौर पर स्थापित करके इसका राजनीतिक लाभ लिया है. प्रियंका गांधी के भाषणों में भावुकता के तत्वों को देखते हुए कुछ राजनीतिक जानकार उन्हें भी ऐसा करने में सक्षम मानते हैं.

कांग्रेस के अंदर के और बाहर के भी अधिकांश लोग यह मान रहे हैं कि सोनिया गांधी को अंतरिम अध्यक्ष बनाकर कुछ कदम पीछे जाती हुई दिख रही कांग्रेस प्रियंका गांधी को आगे करके कुछ कदम आगे बढ़ती हुई दिख सकती थी, लेकिन पार्टी ने यह अवसर गंवा दिया.