राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने कहा है कि जम्मू-कश्मीर को लेकर किए गए हाल के फैसलों से वहां के नागरिकों को फायदा होगा. साथ ही अब वहां के नागरिकों को भी उन समस्त अधिकारों और सुविधाओं का लाभ मिल सकेगा जो देश के दूसरे हिस्सों के लोगों को मिलती हैं. उन्होंने आगे कहा कि जम्मू-कश्मीर में ‘शिक्षा का अधिकार’ कानून लागू होने से सभी बच्चों की शिक्षा सुनिश्चित हो सकेगी. वहीं ‘सूचना के अधिकार’ से लोग जनहित से जुड़ी जानकारियां हासिल कर सकेंगे. पारंपरिक तौर पर वंचित रहे लोगों को भी शिक्षा, नौकरियों और आरक्षण संबंधी सुविधाएं मिलेंगी. रामनाथ कोविंद ने यह बातें 73वें स्वतंत्रता दिवस की पूर्व संध्या पर राष्ट्र के नाम दिए अपने संबोधन में कहीं.

इस मौके पर उन्होंने राष्ट्रपिता महात्मा गांधी को याद करते हुए कहा कि इसी साल दो अक्टूबर को हम बापू की 150वीं जयंती मनाएंगे. बापू भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के महानायक थे. इसके अलावा समाज को हर तरह के अन्याय से मुक्त कराने के प्रयासों के लिहाज से वे हमारे मार्गदर्शक भी थे. उनका मार्गदर्शन आज भी पूर्व कही ही तरह प्रासंगिक है. इस प्रासंगिकता को प्राकृतिक संसाधनों के विवेकशील उपयोग, प्रकृति के संतुलन, कल्याणकारी कार्यक्रमों के तौर पर देखा-समझा जा सकता है.

इसके साथ ही कोविंद ने साल 2019 को एक और मायने में भी खास बताया. उन्होंने कहा कि इसी साल पूरा देश गुरु नानक देव की 550वीं जयंती मनाएगा. गुरु नानक देव देश के महान संतों में से एक है. दुनियाभर के करोड़ों लोगों की उन पर आस्था है. ऐसे में उनके अनुयायियों को मैं इस पावन मौके की शुभकामनाएं देता हूं.

अपने संबोधन में राष्ट्रपति ने इसी साल संपन्न हुए आम चुनाव का जिक्र भी किया और कहा कि मतदाताओं ने लोकसभा के 17वें चुनाव में भाग लेकर दुनिया की सबसे बड़ी लोकतांत्रिक प्रकिया को पूरा करवाया इसके लिए वे सब बधाई के पात्र हैं.

अपने संबोधन में रामनाथ कोविंद ने उन असंख्य स्वतंत्रता सेनानियों को भी कृतज्ञता के साथ याद किया जिनके त्याग, साहस, संघर्ष और बलिदान से देश को आजादी मिली. वहीं अपने संबोधन के आखिरी हिस्से में उन्होंने कवि सुब्रमण्य भारती को याद करते हुए उनकी रचित पंक्तियां ‘मंदरम् कर्पोम्, विनय तंदरम् कर्पोम्, वानय अलप्पोम्, कडल मीनय अलप्पोम्...’ पढ़ीं. साथ ही इसका अर्थ बताते हुए कहा, ‘हम शास्त्र और कार्यकुशलता दोनों सीखेंगे. हम आकाश और महासागर की सीमाएं नापेंगे. हम चंद्रमा की प्रकृति को गहराई से जानेंगे, हम सर्वत्र स्वच्छता रखने की कला सीखेंगे.’

राष्ट्रपति ने आगे कहा, ‘सुब्रह्मण्य भारती ने दशकों पहले जिस भारत की परिकल्पना की थी आज वह साकार हो रही है. मेरी कामना है कि हमारी समावेशी संस्कृति, हमारे आदर्श, करुणा, जिज्ञासा, सामाजिक भाईचारा हमेशा बना रहे. इन्हीं मूल्यों की छत्र-छाया में हम आगे बढ़ते रहें.’