कलाकार : अक्षय कुमार, विद्या बालन, नित्या मेनन, तापसी पन्नू, सोनाक्षी सिन्हा, कीर्ति कुल्हारी, एचजी दत्तात्रेय, शरमन जोशी
निर्देशक : जगन शक्ति
लेखक : जगन शक्ति और आर बाल्की
रेटिंग : 3/5

पांच नवंबर, 2013 को आंध्र प्रदेश के सतीश धवन स्पेस सेंटर से मार्स ऑर्बिटर मिशन यानी मंगलयान लॉन्च किया गया था. मंगलयान देश की ऐसी उपलब्धि है, जिसने अंतरिक्ष विज्ञान में भारत को वह कद दिया कि दुनिया ने उसकी तरफ गर्दन उठाकर देखना शुरू कर दिया. मंगलयान पर टिप्पणी करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा था, ‘ऑटोरिक्शा से यात्रा करने पर दस रुपए प्रति किलोमीटर के हिसाब से किराया लगता है जबकि भारतीय वैज्ञानिकों ने सात रुपए प्रति किलोमीटर के खर्चे पर मंगल तक की दूरी तय कर ली.’ धरती से तकरीबन साढ़े पांच करोड़ किलोमीटर दूर स्थित मंगल पर पहुंचने में भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन यानी इसरो ने करीब सात करोड़ डॉलर (करीब चार अरब रुपए) खर्च किए थे. दिलचस्प है कि उसी साल आई हॉलीवुड की साइंस फिक्शन फिल्म ‘ग्रैविटी’ का बजट 10 करोड़ डॉलर था. दुनिया के लिए यह चौंकाने वाली बात थी कि जितनी लागत से अमेरिका एक फिल्म बनाता है, उसके दो तिहाई खर्चे पर भारत ने मंगलयान भेज दिया.

‘मिशन मंगल’ भारत के मंगल अभियान की इसी खासियत को अपनी यूएसपी बनाती है. किस तरह से कम बजट, सीमित संसाधनों और ढेर सारी बाधाओं के बाद भी भारतीय वैज्ञानिकों ने मंगल तक पहुंचने की राह बनाई थी, यहां इसका एक काल्पनिक रूपांतरण आपको देखने को मिलता है. ‘मिशन मंगल’ की सबसे अच्छी बात यह है कि ये किसी एक नायक को मंगलयान बनाने का क्रेडिट देने के बजाय इसे बहुत सारे लोगों की कोशिश और जज्बे का नतीजा बनाकर पेश करती है. इसके लिए वह सात काल्पनिक किरदार चुनती है और उनकी कहानियां बस इतनी कहती है कि देखने वालों का उनसे परिचय भी होता रहे और मनोरंजन भी.

बेशक कई बार फिल्म लॉजिक से जरा दूर लगती है लेकिन जिस मंगल अभियान को सैकड़ों लोगों की टीम ने मिलकर सफल बनाया था, उनकी कहानी मुट्ठीभर किरदारों के जरिए दिखाते हुए ऐसा होना लाजिम सी बात है. कुछ मौकों पर यह भी होता है कि ‘मिशन मंगल’ मसाला बढ़ाने के लिए कई जरूरी-गैरजरूरी ट्विस्ट और किरदारों को भी खुद में शामिल करती है. इसके अलावा जरूरत से थोड़ी ज्यादा देशभक्ति वाले दृश्य और वर्डप्ले कर रचे गए जोशीले संवाद भी पूरी फिल्म के दौरान आते रहते हैं. मतलब कि फिल्म बॉलीवुड मार्का छाप लेकर ही चलती है. हालांकि इन सब खामियों की खूबी यह है कि इस दौरान सच्चाई से थोड़ी दूर जाकर भी फिल्म मनोरंजन से भरपूर बनी रहती है.

फिल्म के बाकी हिस्सों से अगर आपको थोड़ी-बहुत शिकायत होती भी है तो क्लाइमैक्स उसकी पूरी भरपाई कर देता है. मंगल अभियान के बारे में आप जानते हैं कि यह सफल रहा था लेकिन इसके बाद भी आखिरी दृश्यों में आप सांस रोककर नतीजे का इंतजार करते हैं. यहां पर आप हर पल यह जानने के लिए उत्सुक रहते हैं कि अब परदे पर क्या होने वाला है. इस दौरान मंगलयान की यात्रा दिखाने के लिए इस्तेमाल किए गए कम्प्यूटर ग्राफिक्स बेहतरीन और सच्चाई के बेहद करीब भी हैं, जो इस हिस्से को और प्रभावी बना देते हैं.

अभिनय पर आएं तो अक्षय कुमार ने वैसा ही अभिनय किया है जैसा वे हमेशा अपनी फिल्मों में करते रहे हैं. हालांकि इस बार उनके पास एक्शन करने का मौका नहीं था. शुरुआत में अजीब की हद तक सरफिरे वैज्ञानिक लग रहे अक्षय, बाद में ज्यादातर वक्त गुस्सा या चहलकदमी करते दिखाई देते हैं. लेकिन जैसा कि आशंका जताई जा रही थी कि वे फिल्म को हाईजैक कर लेंगे और बाकी कलाकारों को मौका नहीं मिलेगा, ऐसा कुछ भी फिल्म में नहीं होता. अक्षय से ज्यादा वक्त तक स्क्रीन पर विद्या बालन नज़र आती हैं और ‘तुम्हारी सुलू’ का साइंटिस्ट वर्जन आपके सामने पेश करती हैं. उनके अभिनय में कोई खोट आपको नज़र नहीं आता लेकिन नयापन भी इससे दूरी बनाकर रखता है.

कीर्ति कुल्हारी, तापसी पन्नू और शरमन जोशी भी अपनी भूमिकाएं इस तरह से निभाते हैं कि जब स्क्रीन पर होते हैं, आपकी नज़र उन पर ही होती है. शरमन जोशी के हिस्से में कुछ बढ़िया हंसाने वाले संवाद आए हैं लेकिन उनका किरदार भी ‘थ्री इडियट्स’ के राजू रस्तोगी का एक्सटेंशन लगता है. उम्रदराज साइंटिस्ट की भूमिका निभाने वाले मशहूर थिएटर आर्टिस्ट एचजी दत्तात्रेय जब भी परदे पर होते हैं, आपको हंसी आती है. दत्तात्रेय और नित्या मेनन को जितनी गुंजाइश मिलती है उतने में ही ये अपने बढ़िया अभिनय की उपस्थिति दर्ज करवा देते हैं. इनके अलावा नासा से लौटे साइंटिस्ट की ग्रे-शेड भूमिका में दिलीप ताहिल भी विश्वसनीय हैं.

‘मिशन मंगल’ के जरिए जगन शक्ति ने बतौर निर्देशक डेब्यू किया है. जगन इसके पहले ‘पैडमैन’ ‘डियर जिंदगी’ ‘पा’ और ‘चीनी कम’ जैसी कई हिट फिल्मों में बतौर सहायक निर्देशक काम कर चुके हैं. उनके साथ मिलकर इस फिल्म की पटकथा मशहूर लेखक-निर्देशक आर बाल्की ने लिखी है. जगन शक्ति के पुराने काम पर नज़र डालें तो वे बाल्की की कई फिल्मों में कैमरे के पीछे महत्वपूर्ण भूमिकाएं निभाते दिखाई देते हैं और इससे अंदाजा लगता है कि उन्होंने बाल्की से काफी कुछ सीखा होगा. यह बात उनकी पहली ही फिल्म साबित भी करती है और स्वतंत्रता दिवस की छुट्टी पर जरूर देखी जाने वाली फिल्म बन जाती है.