बीते दिनों उत्तर प्रदेश के सोनभद्र में जमीन पर कब्जे को लेकर आदिवासियों की हत्या ने राजस्थान के चार साल पुराने डांगावास कांड की ख़ौफ़नाक यादें ताजा कर दीं. फर्क़ सिर्फ़ इतना था कि डांगावास में आदिवासियों के बजाय दबंगों के निशाने पर दलित थे. तब सैंकड़ों हथियारबंद लोगों ने जमीन विवाद के चलते दलित परिवारो पर हमला बोल दिया था. उस घटना की भयावहता का ज़िक्र करते हुए दलित-सामाजिक कार्यकर्ता भंवर मेघवंशी हमें बताते हैं, ‘दलितों को ट्रेक्टरों से कुचला गया, जलती लकड़ियों से उनकी आंखें फोड़ दी गईं, पुरुषों के लिंग नोच लिए गए जबकि महिलाओं के साथ ज्यादती कर उनके गुप्तांगों में लकड़ियां घुसेड़ दी गईं.’ मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक डांगावास कांड में पांच लोगों की हत्या कर दी गई थी और कई अन्य गंभीर रूप से घायल हुए थे.

डांगावास कांड में राजस्थान में दलितों के ख़िलाफ़ चले आ रहे एक चिंताजनक पैटर्न की पुनरावृति देखी गई थी. इस मामले में सभी आरोपित अन्य पिछड़ा वर्ग (जाट) से ताल्लुक रखते थे. राजस्थान के जितने भी दलित-सामाजिक कार्यकर्ताओं से सत्याग्रह ने बात की, उन सभी का एक स्वर में मानना है कि बीते कुछ समय में दलितों के ख़िलाफ़ होने वाले अत्याचारों में अन्य पिछड़ा वर्ग (प्रमुखता से जाट, गुर्जर, विश्नोई, धाकड़ और यादव) की भागीदारी में जबरदस्त बढ़ोतरी देखने को मिली है. भंवर मेघवंशी के अनुसार राजस्थान में छूआछूत के मामलों में लुहार, सुथार, देवासी और कुम्हार जैसे शांत छवि वाले समुदायों के लोगों की संख्या में भी तेजी से इज़ाफ़ा हुआ है.

लेकिन दलित संगठनों के सामने इस बात को स्थापित करने में प्रमुख चुनौती यह है कि सरकार इस तरह के अपराधों में पीड़ितों के जाति/वर्ग का तो विवरण उपलब्ध करा देती है, लेकिन आरोपितों के समुदायों से जुड़ी जानकारी बताने की कोई व्यवस्था उसके पास नहीं है. नतीजतन प्रदेश के दलित-सामाजिक कार्यकर्ताओं ने अपने-अपने क्षेत्र में निजी स्तर पर संबंधित तथ्य इकठ्ठा करने के प्रयास शुरु किए हैं ताकि शासन-प्रशासन का ध्यान इस समस्या की ओर खींचा जा सके.

राजस्थान हाईकोर्ट में अधिवक्ता ताराचंद वर्मा हालिया आंकड़ों के आधार पर हमें बताते हैं, ‘बीते एक महीने में राजस्थान भर के अलग-अलग जिलों से दलितों पर अत्याचार के बीस अलग-अलग तरह के मामले सामने आए और इनमें से पंद्रह में आरोपितों का संबंध ओबीसी समुदाय से था. इनमें भी सबसे ज्यादा आरोपित जाट और गुर्जर जातियों के थे.’

राजस्थान में घोड़ी से उतारे जाने वाले मामलों में भी कमोबेश यही रुझान देखने को मिलता है. और प्रदेश में दलित महिलाओं के ख़िलाफ़ होने वाले अपराधों, जैसे बलात्कार या उसकी कोशिश, अपहरण, छेड़छाड़, जाति सूचक शब्दों से अपमानित करना और मारपीट में भी कमोबेश यही स्थिति नज़र आती है. ऑल इंडिया दलित महिला अधिकार मंच की राज्य संयोजक सुमन देवठिया इस बारे में जानकारी साझा करते हुए कहती हैं, ‘हाल ही में पूरे प्रदेश से हमारे पास दलित महिलाओं के खिलाफ होने वाले अपराध के ग्यारह मामले सामने आए हैं जिनमें से आठ में आरोपित ओबीसी हैं.’ गौरतलब है कि दो महीने पहले हुए अलवर के चर्चित थानगाजी रेप कांड में भी सभी आरोपित गुर्जर ही थे. सुमन देवठिया के अनुसार खास तौर पर जमीन से जुड़े विवादों में दलितों पर दबाव बनाने के लिए उनकी महिलाओं और लड़कियों को सबसे ज्यादा शिकार बनाया जाता है.

सामाजिक संगठन ‘दलित मानव अधिकार केंद्र’ के निदेशक व अधिवक्ता सतीश कुमार का इस बारे में कहना है कि प्रदेश के कई क्षेत्रों में दलितों के ख़िलाफ़ हुए अपराधों के आरोपितों में ओबीसी की तादाद साठ फीसदी से ज्यादा रहती है. सूचना का अधिकार के तहत जुटाए गए आंकड़े बताते हैं कि भीलवाड़ा में 2003 से 2006 के बीच दलितों पर किए गए अत्याचार के कुल 495 मामलों में से 333 यानी 67.27 प्रतिशत में आरोपितों का संबंध ओबीसी समुदाय से था. इन हालात पर राजस्थान प्रशासनिक सेवा में उच्चाधिकारी रह चुके डॉ एमएल परिहार तंज कसते हुए कहते हैं कि ‘प्रदेश में दलितों पर अत्याचार करने में पिछड़े सबसे अगड़े हैं.’

चौंकाने वाली बात यह है कि राजस्थान में दलितों पर अत्याचार करने में अनुसूचित जनजाति यानी एसटी वर्ग से ताल्लुक रखने वाले लोग भी कोई कमी नहीं छोड़ते. ऐसे मामले खास तौर पर मीणा बहुल पूर्वी राजस्थान में सामने आते हैं. आंकड़े बताते हैं कि प्रदेश के पूर्वी जिलों में दलितों के ख़िलाफ़ छूआछूत, मारपीट और यौन अपराधों में चिंताजनक बढ़ोतरी हुई है. इस क्षेत्र से ताल्लुक रखने वाले दलित-सामाजिक कार्यकर्ता गोपाल वर्मा कहते हैं, ‘दलितों की सबसे बड़ी मुश्किल यह है कि वे एसटी समुदाय से आने वाले असामाजिक तत्वों के ख़िलाफ़ एससी/एसटी अत्याचार रोकथाम कानून के तहत मामला ही दर्ज़ नहीं करा सकते. आरोपित भी इस बात को अच्छी तरह जानते हैं और इस लीगल लूपहोल का जमकर दुरुपयोग करते हैं.’

वरिष्ठ समाजशास्त्री राजीव गुप्ता इस बारे में कहते हैं कि अलग-अलग तरह के संवैधानिक उपायों से मजबूत हुए वर्ग अब दलितों के शोषण को अपना जन्मसिद्ध अधिकार मानने लगे हैं. ‘अफ़सोस इस बात का है कि मजहबी उन्माद के समय जिस हिंदू धर्म को बचाने के लिए दलितों को बरगला कर आगे कर दिया जाता है, उसी धर्म में सवर्णों के बाद अब पिछड़े और एसटी वर्ग द्वारा दलितों के खिलाफ किए जाने वाले अपराध और अत्याचार का सिलसिला लगातार बढ़ रहा है. ये सामंतवाद का नया चेहरा है!’ गुप्ता आगे जोड़ते हैं.

वहीं, भंवर मेघवंशी इस नव-सामंतवाद के एक गंभीर पहलू की तरफ़ हमारा ध्यान आकर्षित करते हैं. वे कहते हैं, ‘कुछ साल पहले तक दलित लड़कियों से बलात्कार की ख़बरें सर्वाधिक आती थीं. अब कुछ पिछड़े वर्गों द्वारा दलित लड़कियों से शादियां करने का जबरदस्त चलन सामने आया है. सामाजिक सौहार्द के लिहाज से ये बात कहने-सुनने में बड़ा सुकून देती है. लेकिन है ये एक भयानक समस्या.’

मेघवंशी के शब्दों में, ‘प्रदेश के दबंग लेकिन कमज़ोर मानसिकता वाले समुदायों ने भ्रूण और नवजात बच्चियों की हत्याएं करके अपना लिंगानुपात बहुत बिगाड़ लिया है. ऐसे लोग पहले देश के दूसरे हिस्सों से लड़कियों को खरीदकर उनसे शादी रचाते थे. लेकिन वे लड़कियां यहां के खान-पान, बोली-भाषा, वेशभूषा से लेकर रीति-रिवाज तक कुछ नहीं समझती थीं. फ़िर लुटेरी दुल्हनों की संख्या में खासी बढ़ोतरी देखी गई जो शादी के कुछ ही दिन बाद घर को लूटकर भाग जाती थीं.’ बकौल मेघवंशी, ‘इससे निजात पाने के लिए कुछ क्षेत्रों में दलित लड़कियों से जबरन या दवाब बनाकर शादी का चलन बढ़ा. इसका एक कारण यह भी है कि बाहर से लड़की खरीदने में पैसे ख़र्च करने पड़ते थे. लेकिन दलित लड़की से शादी करने पर सरकार ढाई लाख रुपए प्रोत्साहन के तौर पर देती है. निजी बातचीत में तो दलित परिवार अपनी बेटी के साथ हुई ज्यादती का ज़िक्र दबी आवाज़ में करते हैं. लेकिन लोक-लाज और बेटी के भविष्य को देखते हुए वे सार्वजनिक तौर पर अपना मुंह नहीं खोलते’

मेघवंशी आगे जोड़ते हैं, ‘इसके चलते दलित समुदाय में लड़कियों की संख्या घट गई है और दूसरे समुदाय अपनी लड़कियां दलित लड़कों से ब्याहते नहीं हैं. ऐसे में दलितों में कुंवारे लड़कों की संख्या में चिंताजनक बढ़ोत्तरी देखने को मिली है.’ गोपाल वर्मा मेघवंशी से सहमति जताते हुए कहते हैं, ‘हमारे क्षेत्र के अंदरूनी गांवों में कुछ मामले ऐसे भी सुनने को मिले हैं जब शादी न होने पर दो या ज्यादा भाइयों के बीच एक दलित लड़की को जबरन पत्नी की शक्ल में बंधक बनाकर रखा जाता है. वही उन सभी के लिए दूर-दराज से पानी भरकर लाती है. खाना बनाती है. खेत में काम करती है. और सारे ज़ुल्म सहकर भी खामोश रहती है.’

सामाजिक कार्यकर्ता जितेंद्र महला अन्य पिछड़ा वर्ग द्वारा दलितों पर बढ़ते अत्याचार से जुड़े कारणों को इतिहास के पन्नों में तलाशते हैं. वे तफ़सील से बताते हैं, ‘आजादी से पहले सामंतों के खिलाफ लड़ाई में पिछड़े वर्ग और दलितों ने एक-दूसरे को भरपूर सहयोग दिया. बाद में भूमि अधिग्रहण कानून और आरक्षण की वजह से राजपूत तो प्रशासनिक और आर्थिक तौर पर पिछड़ते गए, वहीं उनकी जगह पिछड़े वर्ग ने ले ली. चूंकि सदियों से पिछड़ा वर्ग दलितों के सीधे संपर्क में था. इसलिए आगे चलकर वह प्रतिस्पर्धा भी इन्हीं से करने लगा. यहीं से एक नए तरह के सामंतवाद का उभार हुआ.’

लेखक और राजनैतिक अध्येता संदीप मील भी कुछ ऐसी ही बात दोहराते हैं. वे कहते हैं, ‘ख़ुद पर हुए ज़ुल्मों की वजह से जो कुंठा पिछड़े और एसटी वर्ग के मन में घर कर गई थी, वही खीज बनकर दलितों पर उतरने लगी. शिक्षा का इस्तेमाल सिर्फ़ नौकरियां पाने तक किया गया, न कि सामाजिक नैतिकता और चेतना विकसित करने में. अफ़सोस कि हमारे लोगों ने शक्ति तो संवैधानिक मूल्यों से हासिल की, लेकिन जीवन पद्धतियां सामंतों वाली अपना लीं.’

राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी और जातिगत राजनीति ने भी दलितों की परेशानियों को बढ़ाने में कोई कसर नहीं छोड़ी है. इसकी वजह है राजस्थान में अधिकतर दबंग जातियों का अपने-अपने क्षेत्र में जबर्दस्त जनसंख्या घनत्व. राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार प्रत्येक चुनाव में सबसे ज्यादा टिकट भी इन्हीं समुदायों को दिए जाते हैं और अक्सर इनका वोट भी एकतरफ़ा पड़ता है. लिहाजा राजस्थान में भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस, दोनों ही प्रमुख दल इन समुदायों को नाराज़ करने से साफ़ बचने की रणनीति अपनाते रहे हैं. डांगावास कांड के बाद भी कुछ ऐसी ही स्थिति बनी थी. दलित-सामाजिक कार्यकर्ताओं का आरोप है कि राजनेताओं की यह चुप्पी वर्ग विशेष के अपराधियों को शह देने का काम करती है.

राजनीति की ही तरह प्रशासनिक ढांचे में भी मौजूद जातिगत प्रभाव दलितों के लिए एक बड़ी चुनौती साबित होता है. पूर्व एसीपी अनिल गोठवाल इस बारे में बताते हैं, ‘यह एक बड़ा दुष्चक्र है. चूंकि प्रशासनिक नियुक्तियां राजनैतिक अनुशंसाओं पर होती है. इसलिए कई अधिकारियों की निष्ठा कानून के बजाय राजनेताओं के प्रति ज्यादा नज़र आती है. और अधिकतर नेताओं के लिए जातिगत तुष्टीकरण पहली प्राथमिकता रहता है, फिर चाहे वह किसी अपराधी की प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से मदद करके ही क्यों न हो!’

गोठवाल आगे जोड़ते हैं, ‘अक्सर दबंग समुदायों के प्रभुत्व वाले क्षेत्रों में सिपाही से लेकर थानेदार, एसडीएम, एडीएम, अदालत का मुंशी, विधायक और सांसद सभी उसी समुदाय से ताल्लुक रखते हैं. नतीजतन पीड़ित दलित को प्राथमिकी तक दर्ज़ करवाने में पसीना आ जाता है.’ बकौल गोठवाल, ‘प्रशासनिक नियुक्तियों में राजनैतिक दखल को ख़त्म कर और प्रशासन में उचित संतुलन बिठाकर ही दलितों के लिए न्याय की राह सुगम की जा सकती है. अन्यथा दलित यूं ही मरते-खपते रहेंगे और किसी के कान पर जूं भी नहीं रेंगेगी!’