महादेव देसाई तब कोई बीसेक साल के नौजवान रहे होंगे. उनके कई सहपाठी और दोस्त खूब पैसे कमा रहे थे. ऐसे ही एक दोस्त के पिता उनके घर चाय पीने आए. घर की बैठकी से पड़ोस का एक महलनुमा बंगला दिख रहा था. दोस्त के पिता ने महादेव से कहा— ‘देखो भाई, मैं तो तब समझूंगा जब तुम उतना ही बड़ा बंगला अपनी कमाई से बनाकर दिखाओगे!’ इस पर महादेव के पिता ने ऐतराज़ करते हुए कहा - ‘हम तो महल या बंगला नहीं चाहते. हमारी झोपड़ियां ही हमारे महल हैं. हमें कैसे पता कि इन महलों में रहने वाले लोग वास्तव में कैसा जीवन जी रहे हैं? न ही हमें यह मालूम कि वे खुश हैं या दुखी हैं. अगर हम एक निष्कलुष और बेदाग जीवन जी सकें तो हम अपने मौजूदा हाल में ही पूरी तरह संतुष्ट हैं.’ यह घटना जानकर कहा जा सकता है कि आज भी हमारे समाज में ऐसे पिता कम ही होते होंगे और महादेव इस मामले में भाग्यशाली रहे.

पिता हरिभाई गुजराती साहित्य के मर्मज्ञ थे और प्राइमरी स्कूल में सहायक शिक्षक की नौकरी से शुरू करके वीमेंस ट्रेनिंग कॉलेज के प्राचार्य पद तक पहुंचे थे. मां जमनाबाई बहुत ही सुघड़ और समझदार महिला थीं. महादेव से पहले उनके तीन बच्चे शैशवावस्था में ही चल बसे थे. इसलिए जब महादेव गर्भ में थे तो वे सरस के सिद्धनाथ महादेव मंदिर में मन्नत मांग आई कि यदि यह बच्चा जीवित बच गया तो लड़की होने पर ‘पार्वती’ और लड़का होने पर ‘महादेव’ नाम रखूंगी. बच्चा बच गया और महादेव के नाम से अपना नाम सार्थक भी कर गया. लेकिन महादेव केवल सात वर्ष के थे जब उनकी मां चल बसीं. लालन-पालन पिता और दादी ने मिलकर किया. महादेव को मां के बारे में केवल इतना याद रहा कि पिता का केवल पंद्रह रुपये मासिक वेतन होने के बावजूद मां उन्हें राजकुमार की तरह लाड़ करती थीं और जब कहो तब हलवा बनाकर खिलाती थीं!

महादेव की पढ़ाई-लिखाई वैसी ही हुई जैसी एक गरीब लेकिन सुसंस्कृत और मेधावी पिता के सुतीक्ष्ण बच्चे की होती है. अंग्रेजी शिक्षा के लिए उन्हें सूरत भेजना पड़ता, लेकिन पिता उन्हें अपनी नज़रों से दूर भेजना नहीं चाहते थे. बाद में गांव में ही एक अंग्रेजी स्कूल खुला तो नौ साल की उमर में उसमें दाखिला लिया. तबके अंग्रेजी के कड़क अध्यापक का उनपर गहरा असर हुआ और उन्हें वे जीवनभर नहीं भूल सके. बाद में जब वे ‘अर्जुनवाणी’ के संपादक बने तो उसकी एक प्रति पर अपने उन शिक्षक को लिख भेजा- ‘प्रेज़ेन्टेड विद प्रणाम्स टू माय फर्स्ट इंग्लिश टीचर.’ महादेव अंग्रेजी भाषा और साहित्य के बहुत बड़े विद्वान के रूप में भी जाने गए. वे लड़कपन में इतने शर्मीले थे कि नशाखोरी की बुराई के खिलाफ एक जगह भाषण देना था तो मंच पर पर्दे के पीछे खड़े रहकर दिया. तालियां फिर भी खूब बजीं. सुदर्शन और सुकुमार इतने थे कि एक बार दोस्तों के उकसावे पर एक पारसी ताड़ी विक्रेता को धमकाने के लिए साहब की वेश-भूषा बनाकर चले. हैट पहनी और स्टिक हाथ में पकड़ी और धड़ाधड़ अंग्रेजी में लगे उसे हड़काने. ताड़ीवाला डर भी गया. लेकिन तभी सिर में खुजली हुई और जैसे ही हैट उतारा तो पकड़े जाने के डर से भाग खड़े हुए.

तेरह साल की छोटी उम्र में ही महादेव का विवाह बारह साल की दुर्गाबहन से हो गया. महादेव तब छठी कक्षा में ही पढ़ते थे. इस बारे में दुर्गाबहन एक दिलचस्प किस्सा सुनाती थीं. शादी के बाद यह जोड़ा बैलगाड़ी में बैठकर सूरत से दिहेन आ रहा था. महादेव और दुर्गाबहन के अलावा उस गाड़ी में महादेव की दो हमउम्र बहनें भी थीं. उन्होंने महादेव से पूछा - ‘तुम तो बड़ी डींगें हांकते थे कि शादी नहीं करूंगा, मंडप पर से भाग जाऊंगा. लेकिन तुम तो बड़े मज़े से खुश होकर फेरे लगा रहे थे.’ इस पर महादेव ने जवाब दिया - ‘भागता तो तब, जब दुल्हन पसंद नहीं आती. लेकिन ये दुल्हन तो मुझे बहुत पसंद है.’ जब गाड़ी ससुराल (महादेव के घर) पहुंची और दुर्गाबहन को एक फूस और मिट्टी के घर के सामने उतरने को कहा गया तो उन्हें लगा कि यह किसी अन्य गरीब की झोपड़ी होगी. लेकिन यही महादेव का घर था. जल्दी ही दुर्गा को यहां इतना प्यार मिला कि वे इसमें पूरी तरह से रच-बस गईं.

1907 में जब एलिफिन्स्टन कॉलेज में दाखिले का समय आया तो पिता की आय 40 रुपये मासिक की थी. उस समय इस कॉलेज में केवल अमीर घरानों के छात्र ही पढ़ पाते थे और यहां के छात्रावास का जीवन भी विलासितापूर्ण और खर्चीला था. यह सब देखकर महादेव फूट-फूटकर रोए थे. वह तो ऐसा हुआ कि उन्हें गोकुलदास तेजपाल बोर्डिंग हाउस में निःशुल्क रहने की सुविधा मिल गई और कॉलेज की आधी-फीस के साथ-साथ छात्रवृत्ति भी मिल गई. छात्र जीवन में ही महादेव स्वामी विवेकानंद के जीवन और लेखन से बहुत प्रभावित हुए थे.

एलएलबी की पढ़ाई के दौरान ही महादेव ओरिएंटल ट्रांसलेटर्स ऑफिस में प्रशिक्षण भी लेने लगे. अनुवाद का यह अनुभव जीवनभर उनके और गांधीजी के काम आया. अंग्रेजी, गुजराती और हिंदी इन तीनों ही भाषाओं में महादेव देसाई की ग़ज़ब की दक्षता थी. इसके अलावा उन्हें मराठी भी खूब अच्छी आती थी. ट्रांसलेटर्स ऑफिस में काम करने के दौरान महादेव के सामने एक गुजराती किताब आई जिसका नाम तो था ‘सब्जियों से बनने वाली दवाइयां’, लेकिन वास्तव में उसमें बम बनाने के तरीके दिए गए थे.

इसके लेखक थे क्रांतिकारी मोहनलाल पंड्या, जो बाद में गांधीजी के प्रभाव में अहिंसक सत्याग्रही बन गए. महादेव ने इस पुस्तक को प्रतिबंधित करने की सिफारिश की. हालांकि जब इसके बाद पुलिस पंड्या के पीछे पड़ गई, तो राहत के लिए गवर्नर को आवेदन लिखने वाले भी महादेव देसाई ही थे. इसके बाद जब लोकमान्य तिलक ने बर्मा के मांडले जेल में अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ‘गीता-रहस्य’ लिखी, तो उसकी पांडुलिपी सेंसरशिप परीक्षण के लिए महादेव देसाई के पास ही आई. इस तरह तिलक की लिखी वह पुस्तक सबसे पहले महादेव देसाई ने ही पढ़ी थी. उन्होंने अपने बचपने से लेकर आजवीन बने रहने वाले मित्र और बाद में उनके जीवनीकार नरहरि परीख के साथ मिलकर टैगोर की विभिन्न कृतियों, जैसे-‘चित्रांगदा’, ‘विदाई अभिशाप’ और ‘प्राचीन साहित्य’ इत्यादि का गुजराती में अनुवाद भी किया था.

महादेव के पिताजी रिटायर होने वाले थे और घर का भार भी महादेव के कंधों पर आनेवाला था. इसलिए थोड़े समय तक वकालत करने के बाद उन्होंने को-ऑपरेटिव सोसाइटी के इन्स्पेक्टर का काम स्वीकार कर लिया. इसके तहत उन्हें गुजरात और महाराष्ट्र में को-ऑपरेटिव सोसाइटियों के काम की जांच और समीक्षा करनी होती थी. इस काम के सिलसिले में महादेव को बैलगाड़ी पर महाराष्ट्र और गुजरात के सुदूर गांवों में घूमने का मौका मिला. उन्होंने इस अवसर का लाभ गुजराती और मराठी लोक-साहित्य और संत-साहित्य को जुटाने और समझने में लगाया. हालांकि अपना काम भी उन्होंने उतनी की कड़ाई से किया. फिर भी एक साहित्य-रसिक का कहां इन सबमें मन इसमें लगने वाला था!

प्रथम विश्वयुद्ध शुरू हो चुका था और उस दौरान भारत सचिव मोंटेग्यू ने युद्ध की समाप्ति पर भारत में एक जिम्मेदार सरकार बनाने के बारे में एक जोरदार भाषण दिया था. बम्बई की होमरूल लीग ने इस भाषण का अनुवाद महादेव देसाई से कराया और जब वह अखबारों छपा तो सब उसे पढ़कर वाह-वाह कर उठे. इसके बाद तो बंबई के कई दिग्गज नेता उन्हें अपना निजी सचिव बनाने की कोशिश करने लगे. लेकिन महादेव इन प्रलोभनों में भी कहां फंसने वाले थे. उनकी मंजिल तो कहीं और थी.

महादेव के जीवन में सबसे दिलचस्प मोड़ तब आया, जब वे महात्मा गांधी से मिले. अप्रैल 1915 में गांधी ने अहमदाबाद के कोचरब में एक किराए के मकान में अपना आश्रम शुरू किया. कुछ दिनों बाद उन्होंने आश्रम की नियमावली का एक मसौदा बनाया और देशभर के लोगों से अपील की कि वे इस पर अपनी राय और आलोचनाओं से उन्हें अवगत कराएं.

महादेव देसाई और नरहरि परीख को यह मसौदा गुजरात क्लब की टेबल पर पड़ा मिला और दोनों ने संयुक्त रूप से अपने किताबी ज्ञान के आधार पर इसकी आलोचना महात्मा गांधी को लिख भेजी. दो आलोचनाएं प्रमुख थीं - पहली कि आश्रम में ब्रह्मचर्य अनिवार्य कर देने से बुराइयां बढ़ेंगी और दूसरी कि हथकरघा पर ज्यादा जोर देने से देश के आर्थिक विकास में बाधा पहुंचेगी. यह भी लिखा कि गांधी इन आलोचनाओं का लिखित जवाब पत्र के रूप न दें, बल्कि यदि इस पर चर्चा करनी हो तो उन्हें व्यक्तिगत रूप से आश्रम बुला लें. एक सप्ताह तक जब महादेव और नरहरि को इसका जवाब न मिला तो उन्होंने समझ लिया कि गांधी ने उनके पत्र को कोई महत्व नहीं दिया.

इसके बाद गांधी स्थानीय प्रेमाबाई हॉल में एक जनसभा में बोलने आने वाले थे. कार्यक्रम के बाद जब गांधी हमेशा की तरह अपनी तेज गति में आश्रम वापस जाने लगे तो दोनों ने लगभग दौड़ते हुए उनके साथ चलना शुरू कर दिया.

उन्होंने पूछा - ‘आपको हमारा पत्र मिला?’

गांधीजी ने कहा - ‘अच्छा, वो पत्र आप दोनों ने ही लिखा है?’

फिर गांधीजी ने पूछा - ‘आप लोग करते क्या हो?’

महादेव ने कहा - ‘वकालत की प्रैक्टिस.’

गांधी ने पूछा - ‘इंडियन ईयर बुक का ताज़ातरीन संस्करण है आपके पास?’

इस बार नरहरि ने कहा— ‘नहीं जी, वो पिछले साल वाला है हमारे पास. आपको नया वाला चाहिए तो हम ला देंगे आपको.’

गांधी ने कहा - ‘तो इसी तरह करते हैं आप लोग वकालत की प्रैक्टिस? जब मैं अपनी दाढ़ी खुद बनाता था न, तो उसके आधुनिकतम औजार अपने पास रखता था.’

उसके बाद आश्रम पहुंचकर गांधी ने उनका पत्र निकाला और डेढ़ घंटे तक दोनों को विस्तार से अपनी बात समझाई. रात के दस बज चुके थे. वापस लौटते हुए एलिस ब्रिज पर महादेव ने नरहरि से कहा- ‘नरहरि, मेरा तो आधा मन बन गया है कि मैं जाऊं और इस आदमी के चरणों में बैठ जाऊं.’

उसी साल फोर्ब्स एसोसिएशन ने महादेव देसाई को एक कड़ी प्रतियोगिता के बाद लॉर्ड मोर्ले की पुस्तक ‘ऑन कॉम्प्रोमाइज़’ के अनुवाद के लिए चुना था. अनुवाद सौंपने से पहले महादेव देसाई ने सोचा कि गांधी साहब विदेशों से लौटे हैं और अंग्रेजों के साथ काफी समय बिताया है इसलिए उस देश की भाषा-संस्कृति को ये बेहतर समझते हैं और इसलिए इन्हें अपना ड्राफ्ट दिखा लेना एक बार ठीक रहेगा. महादेव ने अनुवाद और लॉर्ड मॉर्ले को लिखी जाने वाली चिट्ठी का ड्राफ्ट आश्रम जाकर गांधीजी को दिखाया. गांधीजी को यह ड्राफ्ट बिल्कुल भी पसंद नहीं आया.

गांधी ने कहा - ‘ऐसे ही नहीं अंग्रेज हमें चापलूस और स्वराज के लिए अयोग्य समझते हैं. मोर्ले की प्रशंसा इतना विद्वान और दार्शनिक के रूप में बढ़ा-चढ़ाकर करने की क्या जरूरत है? और उसे एक चिट्ठी लिखने में तुम्हारे हाथ क्यों कांप रहे हैं?’ इसके बाद गांधी ने आपसी बातचीत में अंग्रेजी के लच्छेदार शब्दों का बार-बार इस्तेमाल करने को लेकर भी महादेव को आड़े हाथों लिया. कहा- ‘ऐसी भाषा यदि तुम अपनी मां के सामने बोलो तो वह तुम्हें विद्वान भले ही समझ ले, लेकिन बेचारी तुम्हारी एक भी बात समझ नहीं पाएगी.’ गांधीजी की इन बातों ने महादेव को अवश्य ही भीतर तक झकझोरा होगा.

इसके बाद महादेव के साथी नरहरि परीख ने गांधीजी के आश्रम स्थित स्कूल में बतौर शिक्षक काम करना शुरू कर दिया. महादेव देसाई आश्रम आते-जाते रहते थे. एक दिन गांधीजी ने ‘सत्याग्रह’ पर गुजराती में एक पर्चा लिखा और सभी शिक्षकों से कहा कि वे अंग्रेजी में इसका अनुवाद करें. सभी जानते थे कि गांधी द्वारा ली गई अंग्रेजी की इस परीक्षा में पास होना आसान नहीं था. उसी समय महादेव देसाई वहां आ गए. नरहरि ने महादेव देसाई से उसका अनुवाद कराया और गांधीजी के पास ले गए. उसके बाद उस अनुवाद पर महादेव देसाई और गांधीजी के बीच लंबी बहस हुई. इस बहस ने महादेव की योग्यता को गांधीजी की नज़रों में बहुत ऊंचा उठा दिया. गांधी समझ चुके थे कि यही वह व्यक्ति है जिसकी उन्हें तलाश है.

इसके बाद दोनों की रोज मुलाकात होती और खूब अंतरंग बातचीत होती. एक दिन गांधीजी ने कह दिया - ‘महादेव, दो साल से मुझे जिस व्यक्ति की तलाश थी, वो तुमसे मिलकर खत्म हो गई. तुमसे पहले मैंने इतना खुलकर, इतने विश्वास के साथ केवल तीन व्यक्तियों से बातचीत की है. मिस्टर पोलक (दक्षिण अफ्रीका में गांधी के अन्यतम सहयोगी), मिस शेल्सिन (दक्षिण अफ्रीका में सत्याग्रह के दौरान गांधी की निजी सचिव), और मगनलाल.’ महादेव ने पूछा - ‘लेकिन आप जानते ही क्या हैं मेरे कार्यों के बारे में कि आपको इतना विश्वास हो चला? मैंने तो आपको इतना कुछ बताया भी नहीं है.’ इस पर गांधी ने कहा - ‘मिस्टर पोलक को मैंने पांच घंटों के भीतर पहचान लिया था.’

इधर महादेव के मन में तो चल ही रहा था कि वे जल्दी-से-जल्दी गांधी के साथ हो जाएं. वे अब सब कुछ छोड़कर गांधीजी के साथ चंपारण जाना चाहते थे लेकिन महादेव के पिताजी इसके पक्ष में नहीं थे. उन्हें धन-दौलत की लालसा नहीं थी. बल्कि इसके दो कारण थे. पहला यह कि पिताजी की दृष्टि में महादेव देसाई बड़े सुकुमार थे और उन्हें शरीरिक श्रम की आदत नहीं रही थी, जो उन्हें गांधीजी के साथ करना ही पड़ता. दूसरा, वे चाहते थे कि महादेव पहले अपना खुद का मुकाम या समाज में अपनी खुद की पहचान हासिल कर लें, फिर गांधीजी या राष्ट्रीय आंदोलन से जुड़ें. इन बातों पर महादेव का कहना था - ‘मैं महानता हासिल करने की महत्वाकांक्षा से गांधीजी के साथ नहीं जाना चाहता हूं. मैं तो बस उनकी छाया की तरह उनके साथ रहना चाहता हूं, उनसे सीखना चाहता हूं, उनके सान्निध्य में अधिक-से-अधिक ज्ञान हासिल करना चाहता हूं. जहां तक नाम और सम्मान की बात है तो वह तो गांधीजी के पास है ही, फिर मुझे इसकी क्या चिंता करनी?’

महादेव अपनी जिद में गांधीजी के साथ चंपारण चले तो आए, लेकिन पिताजी बहुत नाराज औऱ दुखी थे. पिता को मनाने के लिए उन्हें चंपारण से वापस दिहेन (गुजरात) आना पड़ा. एक दिन नरहरि परीख को चंपारण में महादेव का टेलीग्राम मिला कि मैं फलां तारीख को अपनी पत्नी के साथ फिर से चंपारण आ रहा हूं. नरहरि उन्हें लेने स्टेशन गए तो देखा कि वे आए ही नहीं. वापस आए तो गांधीजी ने महादेव का दूसरा टेलीग्राम दिखाया जिसमें लिखा था कि कितना समझाने पर भी वे अपने दुखी पिता को मना नहीं पाए हैं, इसलिए चंपारण नहीं आ पाएंगे. लेकिन आखिरकार पिताजी महादेव का दुःख देखकर पसीज गए. तीसरे दिन फिर से महादेव का टेलीग्राम आया कि पिताजी मान गए हैं और उनका आशीर्वाद लेकर मैं चंपारण के लिए रवाना हो चुका हूं. जैसे ही महादेव देसाई को लेने नरहरि फिर से स्टेशन चलने लगे, तो गांधीजी ने मजाक किया - ‘कितना मज़ेदार होगा न,यदि हमें फिर से महादेव का टेलीग्राम मिले कि वह नहीं आ रहा है!’

हालांकि उस दिन महादेव अपनी पत्नी के साथ चंपारण पहुंच ही गए. और उसके बाद इन दोनों के बीच कभी न बिछड़ने वाला रिश्ता बन गया. फिर भी, महादेव देसाई पर अंग्रेजी शिक्षा और पश्चिमी कार्यशैली का बहुत प्रभाव था. निजी सचिव की भूमिका को वे यांत्रिक दृष्टि से ही देख-समझ पा रहे थे. गांधीजी के प्रति आत्मार्पण को लेकर उनके मन में अभी भी एक द्वंद चल रहा था. असहयोग आंदोलन के दौरान गांधी पूरे देश में घूम रहे थे, और महादेव देसाई चाहते थे कि गांधी हमेशा उन्हें अपने साथ ही रखें. लेकिन उनका एक सबक अभी बाकी था. इस बारे में गांधी ने अपनी गया यात्रा के दौरान ही 13 अगस्त, 1921 को महादेव देसाई को पत्र में लिखा -

‘किसी के प्रति आत्मार्पण में मनुष्य की अपनी मौलिकता का लोप न होता है और न ही होना चाहिए. अर्जुन ने कृष्ण से सवाल पर सवाल पूछने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी. आत्मार्पण का अर्थ यह नहीं है कि मनुष्य स्वयं अपनी विचार-शक्ति ही गंवा बैठे. बल्कि शुद्ध आत्मार्पण से विचार-शक्ति कुंठित होने के बजाय और अधिक तीव्र हो जाती है. ऐसा मनुष्य यह समझकर कि उसका एक अंतिम अवलंब तो है ही, वह अपनी मर्यादा के भीतर रहता हुआ हजारों प्रयोग करता है. लेकिन उन सबके मूल में उसकी विनम्रता रहती है. उसका ज्ञान और विवेक रहता है.

मेरे प्रति मगनलाल की आत्मार्पण की भावना बहुत अधिक है, फिर भी उसने स्वयं विचार करना कभी नहीं छोड़ा, ऐसी मेरी मान्यता है. तुम्हारा आचरण उससे भिन्न है, तुममें साहस की कमी है. जब भी सहारा मिलता है, तुम साहस खो देते हो. बहुत ज्यादा पढ़-लिख लेने की वजह से तुम्हारी अपनी सृजन की शक्ति कुंठित हो गई है, इसी कारण तुम सहकारी होना चाहते हो. मनुष्य स्वतंत्र कार्य करने की इच्छा रखते हुए भी अति विनम्र हो सकता है.

...तुम जिस दृष्टि से मेरे साथ रहना चाह रहे हो, वह शुद्ध है, लेकिन वह भ्रमयुक्त है. तुम तो केवल पश्चिम का अनुकरण करना चाहते हो. यदि मैं किसी मनुष्य को केवल इसलिए हमेशा अपने साथ रखूं कि वह मेरे कार्य का लेखा-जोखा रखे, तो मेरा यह व्यवहार अस्वाभाविक हो जाएगा. कोई सामान्यतः मेरे साथ रहे और मेरे कार्य का लेखा अदृश्य रूप से रखे, यह एक बात है, और कोई इसी इरादे से मेरे साथ रहकर लेखा रखे यह बिल्कुल दूसरी बात है....लेकिन मैं यह तो चाहता ही हूं कि तुम मेरे साथ हर वक्त रहो. तुम्हारी ग्रहणशक्ति और तैयारी अच्छी है. इसलिए मैं चाहता हूं कि तुम मेरी सभी बातें जान लो. मेरे मस्तिष्क में विचार बहुत हैं, लेकिन वे प्रसंग आने पर ही व्यक्त होते हैं. उनमें कई सूक्ष्मताएं होती हैं जो किसी को दिखाई नहीं देतीं. ...यदि तुम जैसा कोई मनुष्य मेरे साथ में रहे, तो वह अंत में मेरे काम को हाथ में ले सकता है, यह लोभ मेरे मन में रहता है.

...अभी मेरी इच्छा तुम्हें किसी एक काम में लगा देने की नहीं होती. बल्कि मैं तुम्हें अनुभव कराना चाहता हूं. फिर जिन लोगों को मैं जानता हूं, उन सबसे तुम्हारा संपर्क हो जाए तो भविष्य में हमारा कामकाज बहुत आसानी से चल पाएगा.’

गांधी के इस पत्र ने महादेव की सारी बची-खुची दुविधाओं का भी अंत कर दिया. इसके बाद के 22 सालों के साथ की कहानी भी अलग से कहने की जरूरत होगी.

उस दौर में महादेव देसाई को ‘गांधी की छाया’ कहा जाता था और सचमुच शब्दों के सही अर्थों में अपनी अंतिम सांस तक वे गांधी की छाया ही बने रहे. गांधीजी की छाया के रूप में ही उन्होंने अपने प्राण भी त्यागे. उनका निधन 15 अगस्त 1942 को हुआ था. कहते हैं कि तब यह जानते हुए कि महादेव की सांसें रुक चुकी हैं, महात्मा गांधी ने बहुत उत्तेजना के साथ उन्हें आवाज़ दी - ‘महादेव! महादेव!’ यह पूछने पर कि उन्होंने ऐसा क्यों किया, गांधी ने कहा - ‘मुझे लगा कि यदि महादेव अपनी आंखें खोल दे और मेरी ओर देख ले, तो मैं उसे कहूंगा कि उठ जाओ. उसने अपने जीवन में कभी मेरी बात नही काटी. मुझे विश्वास था कि अगर उसने मेरे शब्द सुन लिए तो वह मौत को भी हराकर उठ खड़ा हो जाएगा.

महादेव देसाई के पार्थिव शरीर को गांधी ने अपने हाथों से स्नान कराया था और उसका अंतिम संस्कार किया था.