कलाकार: जॉन अब्राहम, मृणाल ठाकुर, रवि किशन, राजेश शर्मा
निर्देशक: निखिल आडवाणी
रेटिंग: 2/5

19 सितंबर, 2008 को दिल्ली के जामिया नगर इलाके में पुलिस ने कुछ संदिग्ध आतंकियों का एनकाउंटर किया था. इस कार्रवाई में जहां दो संदिग्ध आतंकियों की मौत हो गई थी, वहीं दो को गिरफ्तार किया गया था और एक निकल भागने में कामयाब हुआ था. इस दौरान एक पुलिसकर्मी की भी गोली लगने से मौत हो गई थी. इसे बाटला हाउस एनकाउंटर केस के नाम से जाना जाता है. निखिल आडवाणी निर्देशित ‘बाटला हाउस’ इसी घटना पर आधारित है. फिल्म इस मामले में पुलिस की भूमिका के बारे में बताने का दावा करती है.

बाटला हाउस एनकाउंटर दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल के अधिकारी संजीव कुमार यादव की अगुवाई में हुआ था. ‘बाटला हाउस’ इन्हीं संजीव यादव को अपना नायक बनाती है और उन्हें संजय कुमार नाम देती है. फिल्म इस पुलिस अधिकारी की एक साफ-सुथरी और देशभक्त वाली छवि दर्शकों के सामने रखती है. हालांकि बाटला हाउस एनकाउंटर के बाद उस समय संजीव यादव की भूमिका और पुलिस के इरादों को लेकर सामाजिक कार्यकर्ताओं और राजनीतिक पार्टियों ने खूब हंगामा किया था. एनकाउंटर के असली या फर्जी होने पर भी सवाल उठाए गए थे. सवाल उठाने वालों का पूछना था कि मारे गए लोग सचमुच आतंकवादी थे या वे छात्र जो गलत वक्त पर गलत जगह पर थे. यहां तक कि तब इस कार्रवाई के दौरान मारे गए पुलिसकर्मी की मौत पर भी सवाल उठाए गए थे. बुरा यह है कि इन सवालों का जवाब देने के बजाय ‘बाटला हाउस’ केवल संजीव यादव का यशगान बनकर रह जाती है.

इस फिल्म में संजय कुमार का किरदार आपको सबसे ज्यादा भ्रमित करता है. कभी वह इतने ज्यादा अफसोस से भर जाता है कि उसे अपने हाथों पर खून लगा दिखने लगता है या डरावने सपने आने लगते हैं तो कभी एक योद्धा की तरह लड़ने के लिए तैयार होता दिखता है. इसके अलावा फिल्म में जो बात सबसे ज्यादा चिढ़न पैदा करती है, वह ये है कि विपक्षी पार्टियों को इस तरह से दिखाया गया है कि मानो वे आतंकवाद से भी बड़ी समस्या हैं.

अभिनय पर आएं तो इस फिल्म में जॉन अब्राहम शायद ही कहीं मुस्कुराए होंगे. फिल्म में ज्यादातर वक्त उनके इसी एक्सप्रेशन विहीन चेहरे को देखना पड़ता है. फिल्म में उनकी पत्रकार पत्नी की भूमिका मृणाल ठाकुर ने निभाई है. बबली से चेहरे वाली मृणाल अभिनय तो ठीक-ठाक करती हैं लेकिन उनके और जॉन के बीच दिखाई देने वाला उम्र का फासला आपको इस बात का यकीन नहीं होने देता कि ये पति-पत्नी हैं. इन दोनों के अलावा फिल्म में न तो किसी और पुलिसकर्मी को, न आतंकियों को और ना ही संजय कुमार का केस लड़ने वाले वकील के कैरेक्टर को किसी तरह की डिटेल दी गई है. परदे पर किरदार आते-जाते रहते हैं और आप अंदाजे लगाते रह जाते हैं.

बाटला हाउस कांड में जितने पेंच हैं, इसे अगर सचमुच गंभीरता और ईमानदारी बनाया गया होता तो एक बेहतरीन एक्शन थ्रिलर रची जा सकती थी. लेकिन फिल्म की सबसे बड़ी खामी ही यह है कि इसकी पटकथा सुनी-सुनाई बातों पर आधारित है. यानी न तो स्क्रीनप्ले, न ही संवाद और न अभिनय के मामले में कोई अतिरिक्त मेहनत की गई लगती है. फिल्म का मुख्य किरदार बार-बार चीखकर कहता है कि ‘मुझे ड्रामा नहीं चाहिए, मुझे मेरे सवालों का जवाब चाहिए’ ठीक उसी समय दर्शक भी मन ही मन यह बात उससे दोगुने जोर से चीख रहा होता है. लेकिन फिल्म किसी की नहीं सुनती!