पंद्रह अगस्त को लाल किले से अपने संबोधन के ठीक बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण और वित्त विभाग के अधिकारियों के साथ अर्थव्यवस्था के हालत की समीक्षा की. सरकार की तरफ से इस बैठक को लेकर कोई बयान नहीं आया. लेकिन, इस तरह की समीक्षाओं का दौर लगातार जारी है. पीएमओ आर्थिक स्थिति की लगातार समीक्षा कर रहा है, ऐसी खबरें आती ही रही हैं. वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण भी उद्योग जगत, सार्वजनिक बैंकों के उच्चाधिकारियों और विदेशी निवेशकों के प्रतिनिधियों से मुलाकातें कर चुकी हैं.

इन मुलाकातों के बाद इस तरह की खबरें भी आईं कि वित्त मंत्री जल्द ही कुछ ऐसी घोषणायें कर सकती हैं, जो अलग-अलग सेक्टरों को प्रोत्साहित करने वाली होंगी. यह भी कि सुपर रिच टैक्स के दायरे में आने वाले विदेशी निवेशकों को कुछ राहत दी जा सकती है. इस टैक्स के कारण वे लगातार भारतीय पूंजी बाजार से पैसा निकाल रहे हैं.

देश फिलहाल मंदी जैसे हालात में फंस चुका है. यह बात आरबीआई गवर्नर शक्तिकांत दास भी मान चुके हैं और कॉरपोरेट जगत के भी कई दिग्गजों ने आर्थिक सुस्ती के मंदी जैसे होने की बात कही है. ऑटोमोबाइल सेक्टर की हालात दिनोंदिन खस्ता होती जा रही है और जानकार मान रहे हैं कि कुछ ही महीनों में लाखों लोग इस सेक्टर से नौकरी गंवा चुके हैं. शेयर बाजार लगातार डांवाडोल हैं और विदेशी निवेशकों का भरोसा अभी भी इस पर जम नहीं पा रहा है. ऐसे में समीक्षा दर समीक्षा के बाद भी वित्त मंत्रालय मौजूदा स्थिति को लेकर अपना नजरिया साफ क्यों नहीं कर रहा है? क्या दबे-छुपे स्वरों में कही जा रही यह बात सही है कि वित्त मंत्रालय में पीएमओ (प्रधानमंत्री कार्यालय) का दखल बढ़ता जा रहा है.

मोदी सरकार के दूसरे कार्यकाल में अरूण जेटली के अस्वस्थ होने के कारण जब निर्मला सीतारमण का चयन बतौर वित्त मंत्री किया गया तो यह एक चौंकाने वाला घटनाक्रम था. बाजार और राजनीति के जानकार मान रहे थे कि जेटली की अनुपस्थिति में वित्त मंत्रालय की कमान पीयूष गोयल को ही मिलेगी. क्योंकि पिछली सरकार में जेटली की नामौजूदगी में वे ही वित्त मंत्रालय का कामकाज संभल रहे थे और चुनाव से पहले का अंतरिम बजट भी उन्होंने ही पेश किया था.

उद्योग जगत निर्मला सीतारमण के चयन पर चौंका जरूर, लेकिन भारत के राजनीतिक इतिहास में पहली महिला पूर्णकालिक महिला वित्त मंत्री के रूप में निर्मला सीतारमण के हिस्से में शुभेच्छा से भरी सुर्खियां ही आईं. उस समय बाजार ने भी एक नए चेहरे का स्वागत किया और उम्मीद जताई कि नई वित्त मंत्री नए आर्थिक सुधारों का आगाज करेंगी. विश्लेषणों में वित्त मंत्री के रूप में सीतारमण के चयन को उचित ठहराया गया और रक्षा मंत्री के रूप में सदन में उनकी बहसों की ताऱीफ की गई. लेकिन, मोदी सरकार के दूसरे कार्यकाल में आर्थिक हालात जैसे-जैसे गंभीर हो रहे हैं यह सवाल भी उठ रहा है कि क्या इस कठिन आर्थिक हालात से निपटने में अपेक्षाकृत अनुभवहीन वित्त मंत्री सक्षम होंगी? या फिर आर्थिक नीति से जुड़े सारे बड़े फैसले पीएमओ की देखरेख में ही होंगे.

हालांकि, वित्त मंत्री की अनुभवहीनता की बात को खारिज करने के लिए ठोस तर्क हैं. निर्मला सीतारमण पिछली मोदी सरकार के पूरे कार्यकाल के दौरान मंत्री रहीं और उन्होंने वाणिज्य और उद्योग जैसे मंत्रालय का कार्यभार स्वतंत्र प्रभार वाले मंत्री के तौर पर संभाला. बाद में उन्हें प्रोन्नत कर रक्षा जैसा महत्वपूर्ण मंत्रालय दिया गया. इसके अलावा उनके पास अर्थशास्त्र की अकादमिक शिक्षा भी है. वे जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय से अर्थशास्त्र में एमफिल हैं. ये सारे चीजें इस बात का समर्थन करती हैं कि वित्त मंत्री के रूप में उनके चयन का पर्याप्त आधार है.

लेकिन, कई आर्थिक विश्लेषक ऐसे भी हैं जो पिछली नरेंद्र मोदी सरकार की मंत्री के रूप में सीतारमण के कार्यकाल के आलोचक हैं. इन विश्लेषकों का मानना है कि बतौर वाणिज्य मंत्री सीतारमण ने ‘मेक इन इंडिया’ जैसे कार्यक्रमों के तहत सुर्खियां तो बटोरीं, लेकिन उसमें कुछ ठोस काम नहीं हुआ. जानकार मानते हैं कि वाणिज्य मंत्रालय में उनकी एक सफलता यह मानी जा सकती है कि उनके कार्यकाल में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश बढ़ा, लेकिन इसकी वजह कोई नीतिगत बदलाव नहीं था, बल्कि यह सरकार के प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की सीमा बढ़ा देने की वजह से हुआ.

रक्षा मंत्री के तौर पर सीतारमण के कार्यकाल के बारे में इसमें काम कर चुके एक अधिकारी का कहना है कि रक्षा मंत्रालय और वित्त मंत्रालय के कामकाज के स्वरूप में काफी फर्क है. रक्षा मंत्री के अपने कार्यकाल के दौरान निर्मला सीतारमण ऱफाल मामले में राहुल गांधी के आरोपों पर दिए गए जवाबों के लिए जानी जाती हैं. रफाल सौदे पर निर्मला ने संसद में जोरदार तरीके से जवाब दिए थे, लेकिन उस दौरान वे रक्षा मंत्री से ज्यादा पार्टी की प्रवक्ता नजर आ रहीं थीं. हालांकि, किसी मुद्दे के चुनावी राजनीति से जुड़ जाने पर कोई भी मंत्री ऐसा ही रवैया अख्तियार करता, लेकिन फिर भी इससे एक मंत्री के तौर पर उनकी सही क्षमताओं का पता नहीं चलता.

विश्लेषण और आलोचनाओं की इन बातों को छोड़ दिया जाए और वित्त मंत्री बनने के बाद निर्मला सीतारमण के कामकाज का मूल्यांकन किया जाए तो उसे मिला-जुला ही कहा जा सकता है. निर्मला सीतारमण के सामने पहली चुनौती बजट पेश करना था. उन्हें बजट के अपने आर्थिक दस्तावेज में मोदी सरकार का राजनीतिक संदेश भी देना था. निर्मला सीतारमण ऐसा बजट लाईं, जिसका राजनीतिक संदेश गरीब समर्थक सरकार होना था. चमड़े के बैग के बजाय उन्होंने लाल कपड़े में बजट के दस्तावेज रख मोदी सरकार की प्रतीकात्मक राजनीति को ही बढ़ाया.

उनका बजट गांव-गरीब की चिंताओं से भरा रहा और लोक-कल्याणकारी योजनाओं के साथ पांच ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था की बात भी करता रहा. लेकिन, निवेश और राजस्व की चिंता में उन्होंने बजट में कुछ ऐसे प्रावधान किए गए, जिनका असर बाजार पर फौरन दिखने लगा. बजट के गरीब समर्थक होने का संदेश कितना पहुंचा, यह तो पता नहीं, लेकिन सुपर रिच टैक्स पर सरचार्ज बढ़ा देने और कंपनियों की पब्लिक होल्डिंग तत्काल 25 से 35 फीसद करने ( इस नियम के तहत किसी भी कंपनी का प्रमोटर 65 फीसद से ज्यादा शेयर अपने पास नहीं रख सकता) के प्रावधान ने शेयर बाजार में तहलका मचा दिया.

इसके बाद विदेशी निवेशकों ने जुलाई और अगस्त के महीने में ही मोटी रकम बाजार से निकाल ली क्योंकि सुपर रिच टैक्स के दायरे में वे भी आ रहे थे. बजट में यह कोशिश की गई कि लोक कल्याणकारी योजनाओं के साथ, धन उगाहने का भी मोर्चा संभाल लिया जाए. लेकिन, फिलहाल तो ऐसा लग रहा है कि सब साधने के चक्कर में कुछ भी नहीं साधा जा सका.

बजट के बाद वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने बड़ी सख्ती से सुपर रिच टैक्स जैसे प्रावधानों को हटाने से इनकार कर दिया. लेकिन, कुछ ही दिनों बाद विदेशी निवशकों का एक प्रतिनिधि मंडल जब उनसे मिला तो उन्होंने इसमें नरमी के संकेत दिए. महज, चंद दिनों में वित्त मंत्रालय ने सुपर रिच टैक्स को लेकर दो तरह का रवैया जाहिर किया और उसके बाद भी किसी नतीजे पर नहीं पहुंचा जा सका. विश्लेषक मानते हैं कि इससे यह लगता है कि वित्त मंत्रालय अपने ही निर्णयों को लेकर दुविधा में है और निर्णय लेने की प्रक्रिया कई स्तरों से गुजर रही है.

बजट आने के बाद वित्त मंत्रालय की नौकरशाही में भी बड़ा फेरबदल हुआ और जेटली के समय वित्त मंत्रालय के बेहद ताकतवर अधिकारी रहे सुभाष चंद्र गर्ग को वित्त सचिव के पद से हटाकर बिजली सचिव बना दिया गया. माना जा रहा है कि सुभाष चंद्र गर्ग को हटाने के पीछे की वजह सॉवरिन बॉन्ड योजना रही. इस योजना के तहत सरकार विदेशी बाजारों में बॉन्ड जारी कर पैसे जुटाती. लेकिन, अर्थशास्त्रियों ने इसकी आलोचना करते हुए कहा कि यह ऋण डॉलर में लिए जाएंगे और भुगतान भी डॉलर में किया जाएगा. डॉलर के मुकाबले रुपये में उतार-चढ़ाव आते रहते हैं और इस योजना से देश कर्ज के दुष्चक्र में फंस सकता है. इसके बाद पीएमओ ने भी इस पर आपत्ति जताई और आखिरकार सुभाष चंद्र गर्ग को उनके पद से हटा दिया गया.

लेकिन, इस पूरे प्रकरण को लेकर सुभाष चंद्र गर्ग ने कहा कि सरकार में पहले किसी ने भी उनसे सॉवरिन बॉन्ड योजना को लेकर न कुछ पूछा और न ही कोई आपत्ति जताई. लेकिन, बाद में जब आरबीआई के कई पूर्व गवर्नरों और अर्थशास्त्रियों ने इस पर सवाल उठाए तो इस पर हर ओर से आपत्ति आने लगी. सॉवरिन बॉन्ड का प्रावधान बजट में किया गया था, ऐसे में सवाल उठता है कि वित्त मंत्री ने या तो इस बारे में अधिकारियों से कुछ नहीं पूछा या इस योजना पर उनकी सहमति थी. वित्त मंत्री ने इस योजना के बारे में अपने बजट भाषण में तो बोला, लेकिन इसके बाद हुए विवाद पर उन्होंने अभी तक अपना रूख साफ नहीं किया है. अब इस योजना का क्या होना है, इस बारे में पीएमओ विचार कर रहा है. वित्त मंत्री की इस योजना को लेकर क्या सोच थी, इस बारे में भी कुछ साफ नहीं है. इस योजना के तहत जो धन जुटाया जाना था, उसकी भरपाई अब कैसे होगी? इन सारी चीजों पर वित्त मंत्रालय मौन है.

जानकार कहते हैं कि मौजूदा समय में ऐसा लग रहा है कि वित्त मंत्रालय के नीतिगत फैसलों में पीएमओ एक अहम कड़ी होता जा रहा है. यह स्थिति पिछली सरकार में अरुण जेटली के कार्यकाल की उल्टी मानी जा रही है. जेटली के समय में प्रधानमंत्री उनके आर्थिक फैसलों पर आंख मूंदकर भरोसा करते थे और पीएमओ तेजी से उन फैसलों को अमल में लाने में मददगार होता था. लेकिन, अब वित्त मंत्रालय के फैसलों को पीएमओ के अधिकारी जांच-परख रहे हैं. भाजपा में मध्य स्तर के एक नेता बताते हैं कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की कार्यशैली में पीएमओ हर मंत्रालय के कामकाज पर नजर रखता है, लेकिन पिछले कार्यकाल तक वित्त मंत्रालय पर यह निगरानी नहीं थी. और थी भी तो इस तरह की नहीं थी.

कुछ आर्थिक जानकारों का मानना है कि वित्त मंत्री बने निर्मला सीतारमण को अभी बहुत कम वक्त हुआ है, इसलिए उनके मूल्यांकन की जल्दबाजी नहीं की जानी चाहिए. इसके अलावा निर्मला सीतारमण ने ऐसे समय में अपना पद संभाला है जब देश मंदी की ओर बढ़ रहा है और पूरा आर्थिक जगत उनसे बड़े फैसलों की उम्मीद लगाए बैठा है. यह भी एक वजह है कि वित्त मंत्री के कामकाज के लिए बाजार के जानकार और विश्लेषक कुछ ज्यादा सख्त पैमाना अपना रहे हैं.

आर्थिक उदारीकरण के लागू होने के बाद से ही भारत का वित्त मंत्रालय काफी हाई प्रोफाइल रहा है और बेहद अनुभवी और कद्दावर शख्सियत इस पद पर रही हैं. पीवी नरसिम्हा राव के समय जब देश में उदार आर्थिक नीतियां आईं तो उस समय वित्त मंत्री मनमोहन सिंह जैसे बड़े अर्थशास्त्री रहे. इसके बाद भी यह पद यशवंत सिन्हा, जसवंत सिंह, पी चिदंबरम और प्रणव मुखर्जी जैसे ऐसे लोगों के पास रहा, जिनके पास राजनीतिक, प्रशासनिक अनुभव के साथ अर्थ जगत की बेहतर समझ थी. मोदी सरकार के पिछले कार्यकाल में वित्त मंत्री रहे जेटली को भी जीएसटी जैसा कर सुधार लागू करने का श्रेय है. वित्त मंत्रियों की यह फेहरिस्त किसी भी नए वित्त मंत्री का पीछा करती ही रहेगी. इस सूची के नामों से निर्मला सीतारमण की भी तुलना होगी. इसमें भी मुश्किल इस बात की है कि इस समय आर्थिक मोर्चे पर निर्मला सीतारमण के सामने इन बड़े नामों से भी ज्यादा बड़ी मुश्किल है. और मोदी सरकार से पहले के मुकाबले आज का वित्त मंत्रालय ज्यादा शक्तिशाली और ज्यादा बड़ी जिम्मेदारियों वाला बन चुका है.