अजब विरोधाभास है कि जिस श्रीदेवी को अलग-अलग भाषाओं को समझने और उनमें बात करने में परेशानी होती थी, उसी श्रीदेवी ने कई भाषाओं - हिंदी, तमिल, तेलुगु, कन्नड़ और मलयालम - में काम किया. भारतीय सिनेमा की वे पहली क्रॉसओवर स्टार थीं और सम्भवत: सबसे सफल बहुभाषी एक्टरों में से एक भी. 23 आधिकारिक भाषाओं, कई फ़िल्म इंडस्ट्रियों और क्षेत्रीय संस्कृतियों वाले इस देश में पूरे देश के दर्शकों का प्यार हासिल करना मामूली बात नहीं है. श्रीदेवी जहां-जहां गईं, उनके नाम का सिक्का वहां-वहां चमका. उन्होंने भाषा को अपनी राह का रोड़ा नहीं बनने दिया, और न अलग-अलग संस्कृतियों से घबराईं. न ही फ़िल्मों की क्वालिटी का मातम मनाया.

अगर हम श्रीदेवी के काम की गुणवत्ता यानी क्वालिटी और मात्रा यानी वॉल्यूम के लिहाज के विश्‍लेषण करें तो यह अच्छी तरह समझ पायेंगे कि श्रीदेवी ने वो मुकाम हासिल किया जो तकरीबन नामुमकिन था. अगर दक्षिण की उनकी बहुभाषी पारी को भी गिनें तो श्रीदेवी 15 सालों तक टॉप की अभिनेत्री बनी रहीं. पुरुषप्रधान फ़िल्म इंडस्ट्री में, चाहे भाषा कोई भी रही हो, श्रीदेवी ने अपनी पहचान बनाई. उनके साथ के किसी अभिनेता या अभिनेत्री का न इस तरह का प्रभाव रहा, और न उनके काम का दायरा इतना बड़ा रहा. अपने कैरियर में श्रीदेवी ने तेलुगु में 83, हिन्दी में 72, तमिल में 71, मलयालम में 23, और कन्नड में छह फ़िल्में कीं.

श्रीदेवी की विरासत को सिर्फ़ एक बॉलीवुड/कॉलीवुड/टॉलीवुड/मॉलीवुड के अधीन डाल देना बेमानी होगा. हर इंडस्ट्री को लगता था कि श्रीदेवी ‘उनकी’ है. लेकिन असली श्रीदेवी थी कौन? फ़ैन्स के लिए कई श्रीदेवियां थीं. एक श्रीदेवी ‘मून्द्रम पिरई’ और ‘16 वयथिनिले’ वाली तमिलनाडु में थी. तमिल सिनेप्रेमियों के लिए ही एक श्रीदेवी ‘जॉनी’, ‘प्रिया’ और ‘गुरु’ वाली थी. विकल्प ‘वरुमायिन नीरम’ या ‘सिगप्पु रोजक्कल’ और ‘मीन्दम कोकिला’ के बीच अपनी पसंद की श्रीदेवी चुनने के भी थे. या फिर ‘कार्तिका दीपमा’ और ‘क्षण क्षणम’ वाली श्रीदेवी थी. या ‘मिस्टर इंडिया’ और ‘चालबाज़’ वाली एक श्रीदेवी थी. ‘लम्हे’ और ‘चांदनी’ वाली श्रीदेवी तो थी ही. यहां तक कि ‘रूप की रानी और चोरों का राजा’ के भी फ़ैन्स थे.

तमिल सिनेमा की श्रीदेवी

तमिल सिनेमा में श्रीदेवी एक प्यारी-सी मासूम बच्ची हुआ करती थीं, जिसकी अदायगी की अपनी बारीकियां थीं. श्रीदेवी ने कई महान निर्देशकों के साथ काम किया, जो बहुत ख़ूबसूरत कहानियां सुनहरे परदे पर उतारा करते थे. इस तरह श्रीदेवी का नाम उस दौर के तमाम बड़े लोगों के साथ जुड़ गया. श्रीदेवी तमिल सिनेमा के उस सुनहरे दौर का हिस्सा थीं जब वहां की फ़िल्म इंडस्ट्री ने तीन उभरते सितारे देखे - श्रीदेवी, कमल हासन और रजनीकांत. बाल कलाकार से नवयुवती के किरदारों को निभाते हुए भी उनकी अदाकारी हमेशा कई परतों में और बारीक हुआ करती थी. ज़ाहिर है, श्रीदेवी अपने उम्र से बड़ी भूमिकाएं निभा रही थी. ‘मून्द्रू मुड़िची’, ‘16 वयनथिनिल’, ‘सिगप्पु रोजकल्ल’, ‘जॉनी’, ‘मींदम कोकिला’, ‘मून्द्रम पिराई’, ‘वरुमायीन नीरम सिगप्पु’ ऐसी कई फ़िल्मों में श्रीदेवी ने पेचीदा और जटिल भूमिकाएं निभाईं. उस वक़्त श्रीदेवी की उम्र बीस साल भी नहीं थी!

सत्तर का दशक तमिल सिनेमा में लिखने और स्टोरीटेलिंग के लिहाज से भी एक ख़ास दौर था. पिछले दशक की अतिनाटकीय कहानियों से जुदा इस दौर में के बालाचन्दर, जे महेन्द्रन, पी भारतीराजा और बालू महेन्द्रू जैसे फ़िल्मकार अलग-अलग तबियत और मिज़ाजों की कहानियां गढ़ रहे थे. इन सभी फ़िल्मकारों के साथ श्रीदेवी ने काम किया. श्रीदेवी और कमल हासन की ऑनस्क्रीन रोमांटिक जोड़ी के बारे में बहुत कुछ लिखा जा चुका है. उनके बीच एक हल्की-फुल्की सहज केमिस्ट्री थी. जैसे कि दोनों एक दूसरे के अभिनय अंदाज़ को अपने आप ही समझ जाते थे. उन्हें एक-दूसरे की आंखों की हरकतों, शरीर की जुम्बिश और हरकतों का अन्दाज़ा था. शायद इसलिए क्योंकि दोनों बाल कलाकार से स्टार बने थे और तब तक एक्टिंग उनकी नैसर्गिक आदत में शुमार हो चुकी थी. रजनी-श्रीदेवी की जोड़ी में भी अलग किस्म का जादू था, तब भी जब दोनों एक-दूसरे के साथ एक जोड़ी में नहीं रहे. और जिन फ़िल्मों में उनकी जोड़ी बनी, मिसाल के तौर पर ‘धर्म युद्धम’, ‘जॉनी’, ‘रनुआ वीरन’, ‘पोक्किरी राजा’, ‘थनिकट्टू राजा’, ‘अदुथा वारिसु’ और ‘गायत्री’ वगैरह में उनके बीच एक अलग संतुलन नजर आया.

यहां तक आते-आते श्रीदेवी ने तमिल सिनेमा में अपना मुकाम हासिल कर लिया था, या यूं कहें कि तमिल सिनेमा ने उन्हें अपना बेहतरीन देते हुए उनकी प्रतिभा को वो सारा सम्मान दे दिया था जिसकी वे हक़दार थीं. अस्सी का दशक तक आते-आते हीरोईनों के किरदारों को लेकर भारी बदलाव दिखाई देने लगा था. धीरे-धीरे फ़िल्में पुरुषप्रधान और सुपरस्टार के इर्द-गिर्द घूमने वाली बनने लगी थीं. और ऐसे में उस वक़्त की सभी बेहतरीन अभिनेत्रियों के सामने हीरो की परछाई में बने रहने के अलावा कोई विकल्प बचा नहीं रह गया था. दक्षिण की फ़िल्मों, और ख़ासकर तमिल सिनेमा से श्रीदेवी के निकलने का दौर भी ठीक वही दौर था जब फ़िल्ममेकिंग के एक शानदार युग का अंत होने लगा था. फ़िल्में या तो एक्शनप्रधान होती थीं, या घटिया कॉमेडी होती थीं. हीरोईनों के लिए शायद ही कोई रोल लिखे जा रहे थे. एक दो अपवाद ज़रूर थे, लेकिन चुनिन्दा ही, जिसमें के बालाचन्दर की ‘सिन्धु भैरवी’ या मणि रत्नम की यादगार फ़िल्म ‘मौन रागम’ थी.

मलयालम फिल्मों की श्रीदेवी

श्रीदेवी ने 23 मलयालम फ़िल्मों में काम किया. उनकी पहली फ़िल्म 1969 की ‘कुमार सम्भवम’ थी जिसमें वे शिव-पार्वती के पुत्र त्रिशुलधारी बाल कार्तिकेय के रूप में दिखाई दीं. 1971 में वे ‘पूमपट्टा’ यानी तितली नाम की एक फ़िल्म में नज़र आईं जिसमें उन्होंने ऐसी प्यारी बच्ची का किरदार निभाया जो स्कूल पढ़ने जाना चाहती है, लेकिन घरेलू कामों के बोझ से दबी हुई है. इस फ़िल्म में उनकी अदाकारी के लिए केरल राज्य फ़िल्म अवॉर्ड का सर्वश्रेष्ठ बाल कलाकार सम्मान दिया गया.

1976 में 13 साल की श्रीदेवी सही मायने में तितली बन चुकी थी और मलयालम की फ़िल्म ‘तुलावर्षम’ में उन्होंने एक नवयुवती की भूमिका निभाई, जहां वे अपने दोमंज़िला मकान से एक पेड़ के सहारे कूदकर भागती हैं और अपने प्रेमी के साथ एक झील किनारे गाना गाती हैं. इसके बाद ‘ऊनजल’ (1977) आई जिसका निर्देशन आईवी शशि ने किया था. इस फ़िल्म में श्रीदेवी सही मायने में एक नादान लड़की की भूमिका में थी. गांव की ये लड़की मुंडु-वेष्टि पहनती है, बालों में फूल लगाती है, नारियल के बगीचों में लड़कियों के साथ झूला झूलती है और उनके के साथ खुले तालाब में नहाती है. जब वहां का एक बदमाश ये कहता है कि वो सिर्फ़ और सिर्फ़ इसी लड़की से शादी करेगा, श्रीदेवी शर्माती हैं, और अपना सिर झुकाकर ठीक वैसे ही पेश आती हैं जैसे किसी भी पुरुष के सामने आतीं.

श्रीदेवी आम लड़की की भूमिका में थी और केरल के दर्शकों को ये यकीन हो गया था कि वे दरअसल मलयाली ही हैं. मलयालम बोलना न आना कोई समस्या ही नहीं थी क्योंकि फ़िल्मों में डबिंग आम बात थी. तकरीबन इसी वक़्त हिन्दी सिनेमा में वे केएस सेतुमाधवन की फ़िल्म जूली में नज़र आईं. इस फ़िल्म में लक्ष्मी नाम की दक्षिण भारतीय हीरोईन जूली नाम की एक एंग्लो-इंडियन युवती की भूमिका में हैं जिसे एक हिन्दू लड़के शशि (विक्रम) से प्यार हो जाता है. श्रीदेवी ने लक्ष्मी की बिंदास छोटी बहन ईरीन की भूमिका निभाई.

श्रीदेवी अस्सी के दशक में भी एक-दो मलयालम फ़िल्मों में नज़र आईं, लेकिन बस कहानी यहीं ख़त्म हो गई. 1996 में वे अरविन्द स्वामी के साथ भारतन की ‘देवरागम’ में दिखाई दीं. इस फ़िल्म में उन्होंने एक ऐसी औरत का किरदार निभाया जिसके सामने एक अजीब सी दुविधा है. उसकी शादी उसकी मर्ज़ी के ख़िलाफ़ एक ऐसे पुरुष से हो जाती है जो नपुंसक है और उस पुरुष की ज़िद है कि उसकी पत्नी उस बच्चे को जन्म दे जो उसके प्रेमी की सन्तान है, ताकि दुनिया को यही लगे कि ये उसका बच्चा है. इस शानदार अभिनय में श्रीदेवी एक नटखट युवती से एक हैरान-परेशान थकी-मांदी मां की भूमिका में नज़र आई हैं. ये फ़िल्म बुरी तरह पिट गई थी. शायद इसलिए क्योंकि मलयाली दर्शकों के लिए भी श्रीदेवी तब तक ‘हिन्दी हीरोईन’ हो चुकी थी.

तेलुगु फिल्मों की श्रीदेवी

अगर तमिल फ़िल्मों ने श्रीदेवी को उनके अभिनय की रेंज और शानदार सहअभिनेता दिए तो मलयालम फ़िल्मों के ज़रिए उन्हें करियर के शुरुआत में ही आलोचकों की वाहवाहियां मिली. इस लिहाज से उनकी तेलुगु फ़िल्में ग्लैमर का जश्‍न थीं. तेलुगु श्रीदेवी की मातृभाषा थी और इसी भाषा में उन्होंने सबसे ज़्यादा फ़िल्में कीं. जिस दौरान श्रीदेवी तमिल और मलयालम फ़िल्मों में अपनी एक्टिंग से शोहरत कमा रही थीं. उसी दौरान वे बहुत सफल सुपरस्टारों मिसाल के तौर पर एनटी रामाराव (एनटीआर) या अक्किनेनी नागेश्‍वर राव (एएनआर) जैसे अपनी उम्र से बहुत बड़े हीरो की बांहों में नाच-गा भी रही थीं. ये दोनों ऐसे एक्टर थे जो विग लगाते थे. बहुत ख़राब कॉस्ट्यूम और मेकअप करते थे. बहुत ख़राब डांस करते थे और श्रीदेवी के दादा बनने की उम्र में थे.

तेलुगु इंडस्ट्री में उन्हें अपना बड़ा ब्रेक 1978 में ‘पधहरेल्ला वायसु’ से मिला, जो उनकी तमिल फ़िल्म ‘16 वयनथीनिल’ का रीमेक थी. इस फ़िल्म को के रघुवेन्द्र राव ने निर्देशित किया. फ़िल्म में चन्द्र मोहन और मोहन बाबू थे. बड़ी पंथुली (1972) में श्रीदेवी ने एनटीआर की पोती की भूमिका निभाई और वेतगुडु (1979), आतगडु (1980), सरदार पापा रायुडु (1980), कोंडवीति सिंहम (1981), बॉब्बिली पुली (1982), अनुराग देवता (1982) और जस्टिस चौधरी (1982) जैसी फ़िल्मों में उनकी रोमांटिक लीड बनीं. दरअसल ये एनटीआर की जवानी पर नहीं, बल्कि उस दौर की तेलुगु फ़िल्म इंडस्ट्री की हालत पर टिप्पणी है. श्रीदेवी की अन्य अहम तेलुगु फ़िल्मों में कार्तिक दीपम (1979) है जिसमें वे शोभन बाबू के साथ आईं. इसके अलावा कमल हासन के साथ 1981 की अकाली राज्यम और त्रिशूलम (1983) और 1986 में आई ओका राधा इड्डरु कृष्णलु है.

श्रीदेवी ने तेलुगु एक्टरों की तीन पीढ़ियों के साथ काम किया: इसमें एनटीआर और एएनआर के बाद कृष्णा के बाद नागार्जुन, वेंकटेश और चिरंजीवी की पीढ़ी थी. एएनआर के साथ उन्होंने एक भव्य फ़िल्म की जिसका नाम था ‘प्रेमाभिषेकम’. फिर एएनआर के बेटे अक्किनेनी नागार्जुन के साथ उन्होंने ‘गोविन्दा गोविन्दा’ की. ये श्रीदेवी के लिए आम बात हो चुकी थी. कृष्णा के साथ श्रीदेवी ने बाल कलाकार के रूप में काम किया, और बाद में उनकी हीरोईन बनीं. ‘जगदेका वीरुड़ु सुन्दरी’ एक सुपरनैचुरल फन्तासी फ़िल्म है, जिसमें श्रीदेवी स्वर्ग से उतरी अप्सरा की भूमिका में है, जो चाहती है कि लोग उसे उसके असली रूप में देख पाएं और इस बीच उनके को-स्टार चिरंजीवी अक्सर उन्हें थप्पड़ मार देते हैं. के राघवेन्द्र राव की ये फ़िल्म ब्लॉकबस्टर रही और बाद में तमिल में ‘काधल देवताई’, हिन्दी में ‘आदमी और अप्सरा’ और मलयालम में ‘हाय सुन्दरी’ के नाम से डब हुई. ‘धक धक’ गर्ल माधुरी दीक्षित का ‘बेटा’ फ़िल्म का ये मशहूर गीत इसी फ़िल्म के ‘अब्बानी तिय्यानी’ गीत से लिया गया था, जिसमें संगीत इलैय्याराजा का था जिसमें स्क्रीन पर एक बगीचे में श्रीदेवी और चिरंजीवी सीने और कमर को लचकाते हुए नाचते दिखाई देते हैं.

हर तेलुगु सिनेप्रेमी को रामगोपाल वर्मा की फ़िल्म ‘क्षण क्षणम’ (1991) में श्रीदेवी का शानदार अभिनय भुलाए नहीं भूलता. ये फ़िल्म मसाला फ़िल्म थी, जिसमें सड़क पर सफ़र करते हुए एक बेवकूफ़-सी लड़की (जो आपको मिस्टर इंडिया की सीमा की याद दिलायेगी) इत्तिफ़ाक से वेंकटेश और परेश राव अभिनीत गैंगस्टरों के बीच फंस जाती है. यहां तक कि मुसीबत में फंसी लड़की की भूमिका में भी श्रीदेवी ने वैसा ही बेहतरीन अभिनय किया, बावजूद इसके कि हीरो-हीरोइन का गुंडों के बीच फंस जाने का ये फॉर्मूला बेहद घिसा-पिटा है. इस फ़िल्म के लिए श्रीदेवी को सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का फ़िल्मफ़ेयर अवॉर्ड मिला, और तेलुगु सिनेमा में ये फ़िल्म उनके सबसे शानदार प्रदर्शनों में से एक है. इस फ़िल्म को देखते हुए यूं लगता है कि जैसे श्रीदेवी हर फ्रेम में छाई हुई हैं, और वाकई फ़िल्म देखने में बहुत मज़ा आता है. राम गोपाल वर्मा ने तो यहां तक कह दिया कि ये फ़िल्म उन्होंने श्रीदेवी के लिए ही इस उम्मीद में लिखी थी कि एक न एक दिन श्रीदेवी को ये स्क्रिप्ट पसन्द आयेगी और वे इस फ़िल्म में अभिनय करने के लिए राज़ी हो जायेंगी. श्रीदेवी के कट्टर फ़ैन वर्मा ने वाकई में श्रीदेवी के साथ यह एक यादगार फ़िल्म बना डाली. हालांकि श्रीदेवी उस वक़्त तक पूरी तरह बॉलीवुड में घुस चुकी थीं.

तेलुगु फ़िल्म ‘ऊरुकी मोनागड़ु’ के हिन्दी रीमेक ‘हिम्मतवाला’ की शानदार सफलता के बाद तेलुगु प्रोड्युसरों को श्रीदेवी की फ़िल्मों के बॉलीवुड रीमेक में बहुत क्षमता (और बहुत सारा पैसा) दिखाई देने लगी. और श्रीदेवी ने उन्हें निराश नहीं किया. इसके बाद ‘त्रिशूलम’ से ‘नया कदम’ बनी, ‘देवता’ से ‘तोहफ़ा’ बनी, ‘चुट्टलुन्नरू जगराता’ से ‘मवाली’ बनी, ‘अड़वी सिंहलु’ से ‘जानी दोस्त’ बनी, ‘बलिदानम’ से ‘बलिदान’ बनी, ‘जस्टिस चौधरी’ का नाम वही का वही रहा (और शुक्र है कि एनटीआर की जगह जीतेन्द्र ने ली). उधर तेलुगु प्रोड्यूसर श्रीदेवी की हिन्दी फ़िल्मों - ‘चांदनी’, ‘चालबाज़’, ‘इंक़लाब’, ‘औलाद’ और ‘लम्हे’ में भी पैसा लगाते रहे.

सच तो ये है कि बॉलीवुड ने श्रीदेवी को दक्षिण से चुराया नहीं बल्कि तेलुगु प्रोड्युसरों ने उन्हें बॉलीवुड को बेच दिया. जीतेंद्र और श्रीदेवी की तकरीबन सभी फ़िल्में तेलुगु फ़िल्मों का हिन्दी रीमेक थीं. हालांकि श्रीदेवी ने बॉलीवुड पहुंचकर देशभर की सुपरस्टार बनीं ज़रूर, लेकिन उन्होंने अपने कई इंटरव्यू में कहा कि उन्हें तेलुगु और तमिल इंडस्ट्री में होने की कमी खलती है, जहां उन्हें घर जैसा महसूस होता है. दक्षिण छोड़ने के बहुत बाद भी उनकी जगह खाली रही. कोई उनकी जगह ले पाने के करीब भी नहीं आ सका, क्योंकि एक श्रीदेवी में सबकुछ था-नाचने का हुनर, कॉमेडी, और एक्टिंग. या फिर अदाकारी को लेकर उनका जुनून, और उसमें मिलनेवाली बेइंतिहा ख़ुशी. ये सारे तत्व किसी एक एक्टर में हों, ऐसा विरले ही होता है.

(‘रूप की रानी-श्रीदेवी’ का प्रकाशन हिंद युग्म और वेस्टलैंड प्रकाशन से हुआ है. मूलरूप से अंग्रेजी में लिखी गई इस किताब का हिंदी अनुवाद पत्रकार और लेखिका अनु सिंह चौधरी ने किया है.