एक विशाल उल्कापिंड पृथ्वी की तरफ बढ़ रहा है. नासा ने इसका नाम 1998 ओआर2 रखा है. अमेरिकी स्पेस एजेंसी फिलहाल इस पर करीब से निगाह रखे हुए है. नासा के मुताबिक करीब 13500 फीस व्यास वाला यह उल्कापिंड अगले साल अप्रैल में धरती के सबसे पास होगा. जिस रास्ते पर यह चल रहा है उसके हिसाब से हमें कोई खतरा नहीं होना चाहिए. लेकिन वैज्ञानिकों का कहना है कि ऐसा 100 फीसदी निश्चित होकर नहीं कहा जा सकता.

उल्कापिंड अंतरिक्ष में तैरते विशाल चट्टानों के टुकड़े होते हैं. अतीत में उनके धरती से टकराने की घटनाएं हो चुकी हैं. माना जाता है कि एक ऐसी ही घटना में धरती से डायनासोरों सहित जीवन के एक बड़े हिस्से का सफाया हो गया था. 29 अप्रैल 2010 को 1998 ओआर2 जब धऱती के सबसे पास होगा तब भी इसकी दूसरी करीब 39 लाख मील होगी. लेकिन वैज्ञानिक मानते हैं कि यह एक ऐसी गणना है जो किसी दुर्लभ मौके पर गलत भी साबित हो सकती है.

असल में कोई जरूरी नहीं कि उल्कापिंड हमेशा अपने तय रास्ते पर ही चले. कई कारण होते हैं जिनके चलते उनका रास्ता बदल जाता है. उदाहरण के तौर पर यारकोव्स्की इफेक्ट. यह एक तरह का बल होता है जो किसी उल्कापिंड पर तब लगता है जब किसी भीतरी या बाहरी विकिरण के चलते उसके तापमान में बदलाव हो जाता है. इसके चलते उल्कापिंड के घूमने का तरीका (स्पिन) बदल सकता है जिसके नतीजे में उसके रास्ते में भी बदलाव आ सकता है. इसके अलावा किसी ग्रह के गुरुत्वाकर्षण बल के चलते भी उल्कापिंड का रास्ता बदल सकता है.