इस समय में हम जिस सामाजिक, राजनैतिक और सांस्कृतिक विपदा में फंसे हैं, उसमें कोई विकल्प नज़र नहीं आता. यह तंग या कम नज़री नहीं, हमारा यथार्थ है. हम अपने यथार्थ में इस क़दर धंस गये हैं कि उससे अलग किसी यथार्थ की कल्पना तक नहीं कर पा रहे हैं. ऐसे में महात्मा गांधी ही एक मात्र टिकाऊ और सशक्त प्रतिरोध, एक मात्र नैतिक और बौद्धिक विकल्प लगते हैं. सुखद अचरज की बात यह है कि उन पर जितना कीचड़, गंदगी, गालियां, लांछन आदि उड़ेले जा रहे हैं सुनियोजित ढंग से, गांधी उससे मैला होने के बजाय उज्ज्वल निर्मलता से दमकते दिखायी देते हैं. करोड़ों भारतीयों और ग़ैर भारतीयों के मानसिक आकाश में वे एक धीरोदात्त नायक की तरह शांत, अविचलित, अपनी लाठी के सहारे चलते रहते हैं, सत्य और अहिंसा पर अपने आग्रह के साथ, आस्था और आशा को सहज भाव से ओढ़े हुए. उनमें भारत का जो श्रेष्ठ पारंपरिक और आधुनिक, आध्यात्मिक और नैतिक एकत्र हुआ था वह मृत्युंजय की तरह अपराजेय और अदम्य बना हुआ है.

गांधी-150 के अवसर पर आक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेम ने गोपाल कृष्ण गांधी के संपादन में ‘दि आक्स्फ़ोर्ड इंडिया गांधी’ नाम से एक लगभग नौ सौ पृष्ठों का ग्रंथ प्रकाशित किया है. गांधी विचारों के धनी, निरन्तर परिवर्तनशील, कर्म में अग्रगामी, सामाजिक कर्म और नैतिकता के अनिवार्य संबंध के हामी, साध्य और साधन की पवित्रता के सत्याग्रही और एक सजग अन्तःकरण के स्वामी. इस संचयन में उनके भाषण, वक्तव्य, संपादकीय, टिप्पणियां, पत्रों के अंश, उनके संवाद के हिस्से आदि बहुत सूझ-बूझ से संकलित किये गये हैं.

एक जुलाई 1946 को अहमदाबाद में हुए झगड़ों में सेना बुलाने पर मोरारजी देसाई को एक पत्र में बापू ने लिखा, - ‘... पुलिस ने एहतियाती क़दम क्यों नहीं उठाये? क्या अब पुलिस जनता की नहीं हो गयी है? हमारा असली सुरक्षा बल लोग होने चाहिये. ... राज्य सेना के बल पर राज न करे. यह नहीं होना चाहिये.’ कलकत्ते में अपने उपवास को तोड़ते हुए उन्होंने कहा, ‘हम ही गुंडे बनाते हैं और हम ही उन्हें समाप्त कर सकते हैं. गुंडे अपने आप कोई कार्रवाई नहीं करते. बिना सहारे के वे चल नहीं सकते.’ उपवास के समापन पर उन्होंने यह भी कहा, ‘बत्तियां बुझा दो, घी की एक-एक बूंद निचोड़ लो और ग़रीबों में बांट दो.’ नम्बूदिरीपाद को उन्होंने लिखा, ‘... और तुम यह क्यों कहते हो कि तुम कांग्रेस मंत्रिमण्डलों के ख़राब काम की निन्दा नहीं कर सकते? मैं सोचता हूं यह सिर्फ़ अधिकार नहीं कर्तव्य है किसी भी कांग्रेसी के लिए कि वह खुलकर कांग्रेसी पदाधिकारियों की आलोचना करे चाहे वे कितने ही ऊंचे पदों पर क्यों न हों. आलोचना विनयशील और सही जानकारी पर आधारित हो.’

राम राज्य को परिभाषित करते हुए गांधी जी ने लिखा, ‘... राजनीति में अमल में आने पर वह ऐसा परिपूर्ण लोकतंत्र है जिसमें दौलत और ग़रीबी, वर्ण, जाति, धर्म, लिंग पर आधारित असमानताएं समाप्त हो जाती हैं, उसमें भूमि और राज्य की मिल्कियत जनता की होती है, न्याय सस्ता और तेज़ी से मिलता है, और, इसलिए, उपासना, अभिव्यक्ति और प्रेस की स्वतंत्रता होती है- यह सब नैतिक संयम के क़ानून का स्वेच्छा से वरण होने के कारण.’ अपने जीवन के अंतिम चरण में गांधी जी को लगा था कि ‘मैं अपने को अतिवाद और झूठ के बीच पाता हूं. मैं सच को खोज पाने में असमर्थ हूं. भयानक परस्पर अविश्वास है.’ क्या आज हम भी इसी स्थिति में नहीं है?

नेमि शती

कवि, आलोचक, रंगकर्मी और संस्कृति चिंतक नेमिचन्द्र जैन की जन्मशती नटरंग प्रतिष्ठान इफ़को और अन्य कई संस्थाओं के सहयोग से मना रहा है. पूरी योजना इस तरह बनायी गयी है कि उसमें नेमिजी पर एकाग्रता के स्थान पर उनके बुनियादी सरोकारों को ध्यान में रखकर आज की स्थिति का कविता, उपन्यास, नाटक, संस्कृति, विचार आदि के क्षेत्रों में विश्लेषण और आकलन होगा. शुरूआत हो रही है डॉ. रोमिला थापर के ‘अन्यता की उपस्थिति: आदिकालीन उत्तर भारत में समाज और धर्म’ पर स्मृति-व्याख्यान से. फिर नेमिजी के जीवन और कविताओं पर एक वृत्तनाट्य जिसे बंसी कौल की संस्था रंगविदूषक ने तैयार किया है और मधुप मुदगल के साथ राग संध्या. 16 से 18 अगस्त को. बाद में, हर महीने की 16 तारीख़ को वैचारिक संवाद. इस अवसर पर नंदकिशोर आचार्य और ज्योतिष जोशी द्वारा संपादित और वाणी प्रकाशन द्वारा प्रकाशित नेमिचन्द्र जैन रचनावली के पहले खण्ड और ‘नटरंग’ पत्रिका के नेमि शती विशेषांक का लोकार्पण डॉ. थापर करेंगी. नेमिजी के जीवन और कृतित्व पर आधारित एक प्रदर्शनी भी आयोजित है.

संवादों की कड़ी में उपन्यास में ‘औपन्यासिक कल्पना और यथार्थ’ और ‘उपन्यास की वैचारिक सत्ता’, कविता पर ‘फैलता भूगोल, सिकुड़ता इतिहास’ और ‘अवांगार्द की अनुपस्थिति में परिवर्तन’, रंगमंच पर ‘नाटकहीन रंगमंच’ और ‘आलोचना की बढ़ती अनुपस्थिति’ तथा संस्कृति पर ‘संस्कृति, विस्मृति और दुर्व्याख्या’ विषयों पर विचार-विमर्श होगा. कुछ नये उपन्यासों, नयी कविताओं और नाटकांश का पाठ भी हर गोष्ठी में शामिल है. भारत के अन्य नगरों में भोपाल, उज्जैन-इन्दौर, इलाहाबाद, पटना, बनारस, कलकत्ता, जयपुर, बीकानेर आदि में भी इस सिलसिले में आयोजन होने की सम्भावना है.

नेमिजी का जन्म आगरा में हुआ और वहीं से उन्होंने अंग्रेज़ी साहित्य में एम.ए. किया. कुछ समय उन्होंने मध्यप्रदेश के शुजालपुर में अपने मित्र गजानन माधव मुक्तिबोध के साथ एक स्कूल में अध्यापन किया. फिर वे कलकत्ता गये जहां की एक बिरला मिल में नौकरी की. जल्दी ही वे बम्बई चले गये जहां इप्टा में शामिल हुए और वहां शम्भु मित्र, रविशंकर, शान्ति बर्धन आदि के साथ काम किया. फिर इलाहाबाद आये जहां आधुनिक पुस्तक भण्डार की स्थापना की और अखिल भारतीय इप्टा अधिवेशन आयोजित किया. बाद में दिल्ली आ गये और संगीत नाटक अकादेमी और राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय की परिकल्पना में भाग लिया और विद्यालय में आधुनिक भारतीय नाटक के अध्यापक रहे. बाद में जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में फ़ेलो. फिर नटरंग प्रतिष्ठान स्थापित किया. नेमिजी कविता में नयी राह के अन्वेषी, उपन्यास की आलोचना के नये प्रतिमानों के संस्थापक, कविता के संवेदनशील आलोचक, हिंदी में रंगालोचना के स्थापक और चिन्तक, संस्कृति और नयी संचारव्यवस्था के विश्लेषक रहे.

‘तीरों का चंदोबा, आग-भरा पहाड़’

कला-इतिहासकार, जो इस कलासमृद्ध देश में बहुत कम हैं, हमें किसी अतीत प्रवृत्ति या कलाकृति या कलाकार के सजग सम्पर्क में लाते हैं. वे हमारी कला-स्मृति को पुनर्नवा करते हैं. हमें अतीत को नये आलोक में देखने के लिए प्रेरित करते हैं. कई बार अनाम रहे कलाकारों के नाम खोज निकालते हैं और उन्हें सच्ची पहचान देते हैं. जिस एक कला-इतिहासकार ने ये सारे काम उत्साह और जतन से, खोज और जिज्ञासा से लगातार किये हैं वे हैं चंडीगढ़ के डॉ. बृजेन्दनाथ गोस्वामी. उनकी नयी पुस्तक ‘दि ग्रेट मैसूर भागवत’ नियोगी बुक्स से आयी है. उसमें मैसूर के राजा कृष्णराज वाड़ियार के संरक्षण में तैयार की गयी भागवत के दसवें स्कन्ध के उत्तरार्द्ध को अंकित करनेवाली चित्रावली प्रकाशित हुई है. इस राजा का दरबार ऐसा था कि उसमें कला सिर्फ़ सरोकार का नहीं आवेग का भी विषय थी.

डॉ. गोस्वामी ने पुस्तक के लोकार्पण के अवसर पर एक व्याख्यान ‘तीरों का चंदोबा: आग भरा पहाड़’ में यह बताया कि मिनिएचर कला के सिलसिले में दक्षिण का उल्लेख बहुत कम होता है. उसे सिर्फ़ उत्तर भारत तक महदूद मानना ग़लत और भ्रामक है. उन्होंने बताया कि भागवत तो कई बार चित्रित हुई है पर उसके दशम स्कन्ध का यह चित्रण अनूठा है. लगभग दो सौ चित्र हैं पर सभी अनाम हैं: उनमें से किसी कलाकार का नाम पता नहीं चलता जबकि ज़ाहिरा तौर पर कई चित्रकार रहे होंगे. यह भी दिलचस्प है कि तब तक भारत में कंपनी स्कूल के बहुत सारे चित्र बन-फैल रहे थे, उस शैली का इस चित्रावली पर बिल्कुल भी प्रभाव नहीं है. यही नहीं यूरोपीय परम्परा की भी पूरी तरह से यहां उपेक्षा है, विशेषकर कलाकार जैसे काल और देश को बरतते हैं इन चित्रों मेंं जहां-तहां बहुत अभिजात या परिष्कृत क़िस्म का अमूर्तन भी है- वह मूर्तन से ऐसे घुला-मिला है कि कहीं भी अलग या असंगत प्रतीत नहीं होता.

इस चित्रावली में कृष्ण द्वारिकाधीश हैं याने कि राजा. उनका पहले का रूमानी रूप पूरी तरह से ओझल है- न बांसुरी है, न मोर-मुकुट, न ही गोपियां. यह उत्तरकालीन कृष्ण हैं- योद्धा, शासक, दरबार लगानेवाले। यह दिलचस्प और दुखद दोनों है कि यह चित्रावली एक विदेशी संग्रहालय में है. आज तो हमारी कला-परम्परा का एक बड़ा हिस्सा बाहर है और सुरक्षित है और जो यहां बचा हुआ उसकी देख-रेख में कोताही, लापरवाही और असंवेदनशीलता बरती जाती है. जो समाज अपनी परम्परा का ऐसा दुर्लक्ष्य करे उसे परम्परावादी समाज कहना-मानना असंगत है. विडम्बना यह है कि हमारी परम्परा दूसरे बाहर के लोग और संस्थाएं बचा रहे हैं जिनमें प्रवासी भारतीयों की भूमिका निन्दनीय रूप से नगण्य है.