शुक्रवार को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद ने जम्मू-कश्मीर से जुड़े भारत सरकार के फैसलों और वहां की स्थिति पर बंद कमरे में चर्चा की थी. इस बैठक के बाद जम्मू-कश्मीर को लेकर कोई साझा बयान जारी नहीं हो पाया और इसे भारत सरकार की कूटनीतिक सफलता माना जा रहा है. लेकिन इस बीच यहीं से एक ऐसी खबर भी आई है जो भारत के लिए चिंता की वजह बनती दिख रही है. दरअसल इस बैठक के बाद रूस ने संयुक्त राष्ट्र के चार्टर और संयुक्त राष्ट्र के प्रस्तावों का हवाला देते हुए कहा था कि कश्मीर विवाद भारत और पाकिस्तान मिलकर सुलझाएंगे.

संयुक्त राष्ट्र में रूस के उप स्थायी प्रतिनिधि दिमित्री पोलियान्सकी ने शुक्रवार को एक ट्वीट में लिखा है, ‘रूस भारत और पाकिस्तान के बीच संबंधों के सामान्य होने का समर्थन करता है. हम उम्मीद करते हैं कि कश्मीर को लेकर इस समय जो विवाद हुआ है, उसे संयुक्त राष्ट्र के चार्टर और संबंधित प्रस्तावों के साथ भारत-पाकिस्तान के बीच द्विपक्षीय समझौतों के तहत 1972 के शिमला समझौते और लाहौर घोषणापत्र की बुनियाद पर सिर्फ राजनीतिक और कूटनीतिक जरियों से सुलझाया जाएगा.’

पोलियान्सकी ने सुरक्षा परिषद की इस बैठक में रूस का प्रतिनिधित्व किया था. भारत सरकार के लिए चौंकाने वाली सबसे अहम बात यही है कि रूस ने कश्मीर मामले पर ‘संयुक्त राष्ट्र चार्टर’ और ‘संयुक्त राष्ट्र प्रस्तावों’ का जिक्र किया है जबकि भारत इसे पाकिस्तान के साथ द्विपक्षीय मामला बताता रहा है.

भारत का बीते करीब चार दशक से कश्मीर विवाद पर एक स्थाई रुख रहा है. इसके मुताबिक भारत और पाकिस्तान के बीच 1972 में शिमला समझौता होने के बाद इस विवाद पर संयुक्त राष्ट्र के प्रस्ताव बेमानी हो चुके हैं और इस पर कोई तीसरा पक्ष भी दखल नहीं दे सकता. वहीं 1999 में भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ की मुलाकात के बाद जारी हुए लाहौर घोषणापत्र में भी शिमला समझौते की पुष्टि की गई थी.

बीते सालों में पाकिस्तान कश्मीर मामले का अंतरराष्ट्रीयकरण करने के लिए बार-बार संयुक्त राष्ट्र प्रस्तावों का हवाला देता रहा है. जबकि भारत ने हर बार शिमला समझौते और लाहौर घोषणापत्र के हवाले से इसे द्विपक्षीय मामला बताया है. जाहिर है कि भारत के इस रुख से रूस भी कभी अनजान नहीं रहा.

जम्मू-कश्मीर पर पाकिस्तान के कबायलियों के हमले और उसके भारत में विलय के बाद भारत ही इस मसले को 1948 में संयुक्त राष्ट्र में ले गया था. तब यहां इस मसले पर चार प्रस्ताव आए थे और इनमें से एक में कहा गया था कि जम्मू-कश्मीर पर नियंत्रण का मुद्दा जनमत संग्रह से तय किया जाएगा. लेकिन इसके साथ शर्त रखी गई थी कि इससे पहले राज्य से भारत और पाकिस्तान को अपनी-अपनी फौजें हटानी होंगीं. हालांकि यह प्रस्ताव कभी लागू नहीं हो पाया.

डेक्कन हेराल्ड की एक खबर के मुताबिक शुक्रवार को जब संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में इस मामले पर बैठक हुई तो इससे पहले भारत ने सभी पांचों स्थाई सदस्यों (अमेरिका, रूस, फ्रांस, इंग्लैंड और चीन) के साथ सभी दस अस्थाई सदस्यों को भी अपने रुख से अवगत कराया था. चूंकि यह बैठक चीन के प्रस्ताव पर ही हो रही थी तो ऐसे में उससे समर्थन की उम्मीद तो बेमानी ही थी. लेकिन भारत को अपने ‘सदाबहार दोस्त’ रूस से ऐसी किसी प्रतिक्रिया की उम्मीद नहीं थी जो उसके सालों पुराने रुख से अलग हो. यही वजह है कि पोलियान्सकी की प्रतिक्रिया से इस समय भारतीय पक्ष चौंका हुआ है.