1- मोदी सरकार द्वारा जम्मू-कश्मीर का विशेष दर्जा हटाए जाने के बाद भारत और पाकिस्तान के बीच तनाव एक नए स्तर पर पहुंच गया है. पाकिस्तान सरकार हमेशा की तरह आरोप लगा रही है कि भारत कश्मीरियों के साथ अत्याचार कर रहा है. उधर, अपने कब्जे वाले कश्मीर को वह आजाद कश्मीर बताती है. वह दावा करती है कि उसने यहां रहने वाले कश्मीरियों को पूरी आजादी दी है. लेकिन यह कितना सच है? बीबीसी पर वात्सल्य राय की यह रिपोर्ट इस सवाल का जवाब खंगालने की कोशिश करती है.

कितना ‘आज़ाद’ पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर?

2- रोटी, कपड़ा और मकान जैसी बुनियादी जरूरतों के सिलसिले में अब इंटरनेट डेटा को भी जोड़ा जा सकता है. दुनिया की एक बड़ी आबादी न सिर्फ इससे जुड़ी है पर बल्कि इस पर काफी निर्भर भी है. इंटरनेट के क्षेत्र में अब एक नई दौड़ धरती के चप्पे-चप्पे तक यह सुविधा पहुंचाने की भी है. गूगल, फेसबुक और स्पेसएक्स जैसे कई नाम इस होड़ में हैं. डॉयचे वेले हिंदी पर पाउल याएगर की यह रिपोर्ट इसके पीछे छिपे सामाजिक जिम्मेदारी के भाव और कारोबारी मंशाओं को टटोलती है.

आकाश से बेतार इंटरनेट देने के लिए इतनी होड़ क्यों?

3- संगीत की कोई सरहद नहीं होती. लेकिन यह भी सच है कि सरहदें संगीत को बदल देती हैं. सरहदों के इस पार या उस पार जिस राजनीतिक विचार की सत्ता होती है उससे संगीत की पसंद निर्धारित होने लगती है. वायर हिंदी में छपे इस लेख में ठुमरी गायिका विद्या राव का कहना है कि ऐसे में संगीत और संगीतकारों को अपना रास्ता बदलना पड़ता है या समाप्त हो जाना पड़ता है.

बंटवारे के बाद हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत हमेशा के लिए बदल गया

4- अर्थव्यवस्था की सुस्ती जारी है. मोदी सरकार और रिजर्व बैंक के तमाम उपायों के बावजूद ऑटोमोबाइल से लेकर रियल एस्टेट तक हर क्षेत्र से बुरी खबरें आ रही हैं. द क्विंट हिंदी पर छपे अपने इस लेख में टीसीए श्रीनिवास राघवन का मानना है कि नरेंद्र मोदी भी दो बार देश की कमान संभालने वाले उन प्रधानमंत्रियों की फेहरिस्त में शामिल होते दिख रहे हैं जिन्होंने राजनीति भले ही बेहतरीन की, लेकिन आर्थिक मोर्चे पर नाकाम रहे. उनका यह भी कहना है कि प्रधानमंत्री को अब इस मोर्चे पर वही करना चाहिए जो उन्होंने जम्मू-कश्मीर में धारा 370 के साथ किया.

PM मोदी को इकनॉमी पर चिंतन शिविर आयोजित करना चाहिए

5- बच्चा चोरी की अफवाह के चलते भीड़ की हिंसा में पिछले कुछ समय के दौरान काफी बढ़ोतरी हुई है. ये अफवाहें ‘जरूरी संदेश’ की शक्ल में सोशल मीडिया पर फैलती हैं. अक्सर इनका मजमून यही होता है कि बच्चों को अगवा करने वाला गिरोह इलाके में सक्रिय है और लोग सावधान रहें. कई बार इन संदेशों के साथ संदिग्धों की फर्जी तस्वीरें भी पोस्ट की जाती हैं. बीते दिनों तो भीड़ ने मध्य प्रदेश में ऐसी एक अफवाह के चलते तीन कांग्रेसी नेताओं को पीट डाला. ऑल्टन्यूज पर पूजा चौधरी ने सोशल मीडिया पर वायरल होने वाली इस तरह की अफवाहों का एक संकलन छापा है.

सोशल मीडिया में वायरल बच्चा चोरी की अफवाहों का संकलन