बीते साल अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और उत्तर कोरियाई शासक किम जोंग-उन के बीच हुई मुलाकात के बाद कई विश्लेषकों का कहना था कि इस मुलाकात में उत्तर कोरिया अमेरिका पर भारी पड़ा है. ऐसा इसलिए कहा गया था कि डोनाल्ड ट्रंप ने उत्तर कोरिया से परमाणु हथियारों के विकास पर कोई ठोस आश्वासन लिए बिना ही उसे रियायत दे दी थी. इस बैठक में अमेरिकी राष्ट्रपति अमेरिका-दक्षिण कोरिया के वार्षिक सैन्याभ्यास को स्थगित करने पर सहमत हुए थे और दक्षिण कोरिया से अपने 32,000 सैनिकों को वापस बुलाने पर विचार करने का आश्वासन दिया था. इसके बदले उत्तर कोरिया ने कोरियाई प्रायद्वीप को परमाणु हथियार मुक्त बनाने की बात कही थी. लेकिन यह एक रटी-रटाई बात है जो वह बीते कुछ समय में कई बार कह चुका है. वह कब तक और कैसे अपने परमाणु हथियार नष्ट करेगा, तब इसकी उसने कोई रूपरेखा स्पष्ट नहीं की थी.

उस समय अमेरिका के पूर्व उपराष्ट्रपति जो बिडेन ने सीएनएन से बातचीत में कहा था, ‘डोनाल्ड ट्रंप ने उत्तर कोरिया को बहुत कुछ दे दिया, लेकिन बदले में कुछ नहीं लिया. इस बैठक के बाद उत्तर कोरिया पर दबाव की रणनीति कमजोर हुई है, हमारे सहयोगी देशों की सुरक्षा चिंता बढ़ी है और बदले में अस्पष्ट वादे मिले हैं.’

इस बैठक के करीब सालभर बाद अगर देखें तो दो बातें साफ़ नजर आती हैं. पहली कि परिस्थितियां फिर वैसी ही हो गई हैं, जैसी इस बैठक से पहले थीं. पिछले डेढ़ महीने में उत्तर कोरिया छह मिसाइल परीक्षण कर चुका है, वहीं बीते हफ्ते ही उसने एक नए हथियार का भी परीक्षण किया है. उसने हाल ही में परमाणु हथियार और मिसाइल ले जाने में सक्षम अत्याधुनिक पनडुब्बी का निर्माण करने लेने का भी दावा किया है. उधर, अमेरिका ने भी दक्षिण कोरिया के साथ उत्तर कोरियाई सीमा के नजदीक सैन्य अभ्यास शुरू कर दिया है. उत्तर कोरिया ने इस पर प्रतिक्रिया देते हुए दक्षिण कोरिया को खरी-खरी सुनाई है और कहा है कि दोनों पड़ोसी देशों की वार्ता अब पटरी से उतर चुकी है.

इस पूरे मामले को देखकर जो पहली बात समझ में आती है वह है कि इस मसले को शांति से सुलझाने के लिए अमेरिका उत्तर कोरिया को जो भी अधिकतम रियायत दे सकता था, उसने दी और बदले में सामने वाले पक्ष से कुछ सकारात्मक कदमों का इंतजार भी किया, लेकिन कोई नतीजा नहीं निकला.

वहीं विदेश मामलों के जानकार कहते हैं कि सालभर से ज्यादा समय बीतने के बाद यह साफ़ हो चुका है कि शांति वार्ता पटरी पर नहीं है, उत्तर कोरिया अपने वादे से पलट चुका है, उसने परमाणु निरस्त्रीकरण को लेकर कोई बड़ा कदम नहीं उठाया है और अब लगातार मिसाइल परीक्षण करके अमेरिका को उकसा भी रहा है. इन लोगों के मुताबिक ऐसे में अब अमेरिका के पास एकमात्र विकल्प सैन्य कार्रवाई का ही बचता है.

यहीं से यह सवाल उठता है कि क्या अब अमेरिका वास्तव में उत्तर कोरिया पर सैन्य कार्रवाई कर सकता है. विदेश मामलों के कुछ जानकारों की मानें तो ऐसे कई कारण हैं जिनके चलते अमेरिका लाख चाहने के बाद भी उत्तर कोरिया पर हमला नहीं कर सकता.

उत्तर कोरिया की सैन्य ताकत

जानकार अमेरिका द्वारा उत्तर कोरिया पर हमला न करने की पहली वजह उसकी सैन्य ताकत को बताते हैं. ये लोग कहते हैं कि अगर उत्तर कोरिया की सैन्य ताकत को देखें तो वह उन देशों से कहीं ज्यादा ताकतवर नजर आता है, जहां बीते सालों में अमेरिका ने सैन्य कार्रवाई की है. दक्षिण कोरियाई खुफिया एजेंसियों की रिपोर्ट के मुताबिक बीते दो दशकों में उत्तर कोरिया की ‘कोरियन पीपुल्स आर्मी’ ने तेजी से प्रगति की है. पहले जहां उसकी सेना में करीब साढ़े तीन लाख जवान ही थे. वहीं, अब यह आंकड़ा 12 लाख के पार है. इस लिहाज से उसकी सेना दुनिया की सबसे बड़ी सेनाओं की सूची में चीन, भारत और अमेरिका के बाद चौथे नंबर पर आती है. इसके अलावा विशेषज्ञ मानते हैं कि उत्तर कोरिया आधुनिक हथियारों के विकास में भी कोई पिछड़ा देश नहीं है. अपनी परमाणु संपन्नता को भी वह पांच बार परीक्षण करके साबित कर चुका है.

अगर, अमेरिका के नजरिये से देखें तो सीरिया, अफगानिस्तान या इराक पर हमला करने के बाद उसे उनसे कोई प्रत्यक्ष खतरा नजर नहीं आता था. लेकिन उत्तर कोरिया के मामले में ऐसा नहीं है. उत्तर कोरिया ने अंतरमहाद्वीपीय बैलिस्टिक मिसाइल (आईसीबीएम) बना ली है. अमेरिकी रक्षा विशेषज्ञों के मुताबिक उत्तर कोरिया के पास आईसीबीएम तकनीक आने का मतलब है कि अमेरिका उसके निशाने पर आ सकता है. उत्तर कोरिया कह भी चुका है कि अगर उसे उकसाया गया तो वह अमेरिका पर बिना बताए परमाणु हमला करने से नहीं हिचकेगा.

दक्षिण कोरिया और जापान की चिंता

विशेषज्ञों की मानें तो दक्षिण कोरिया और जापान दोनों यह तो चाहते हैं कि अमेरिका उनके साथ खड़ा दिखाई दे लेकिन किसी भी कीमत पर वे उत्तर कोरिया के कोप का भागी बनना नहीं चाहते. साल 2017 में जब ट्रंप प्रशासन ने अपने युद्ध पोत कार्ल विंसन को कोरियाई प्रायद्वीप में तैनात करने का आदेश दिया तो इसने सबसे ज्यादा दक्षिण कोरिया और जापान को चिंतित कर दिया था. कोरियाई मीडिया के अनुसार इन खबरों के तुरंत बाद ही दक्षिण कोरिया के विदेश विभाग ने अमेरिकी विदेश विभाग से सम्पर्क साधा था और उसे उत्तर कोरिया पर किसी भी तरह की सैन्य कार्रवाई का आदेश न देने को कहा था.

जानकारों की मानें तो दोनों देश उत्तर कोरिया की सैन्य क्षमताओं से अच्छे से वाकिफ हैं. वे जानते हैं कि उत्तर कोरिया सिर्फ गीदड़भभकी नहीं दे रहा और अगर युद्ध हुआ तो वह उन पर परमाणु हमले से भी नहीं हिचकेगा. पूरी दुनिया के लिए व्यापार के लिहाज से बेहद अहम मानी जानी वाली दक्षिण कोरिया की राजधानी सियोल उत्तर कोरियाई सीमा से महज 35 मील दूर है. उत्तर कोरिया कई बार कह चुका है कि युद्ध छिड़ने पर वह सबसे पहले सियोल को ही अपना निशाना बनाएगा.

अमेरिकी सेना के रिटायर कर्नल सैम गार्डनर अटलांटिक पत्रिका को दिए एक साक्षात्कार में कहते हैं, ‘युद्ध छिड़ने पर पहले 24 से 48 घंटों में ही उत्तर कोरिया सियोल का नक्शा बदलकर रख देगा और लाख कोशिशों के बाद भी अमेरिका सियोल की रक्षा नहीं कर सकता.’ गार्डनर यह भी बताते हैं, ‘एक समय अमेरिकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन ने उत्तर कोरिया के योंगबायोन रिएक्टर पर बमबारी करने की योजना बना ली थी. लेकिन, दो कारणों के चलते बिल्कुल अंतिम समय में उन्हें अपना इरादा बदलना पड़ा था. पहला कारण रेडियोएक्टिव पदार्थ के लीक होने से पड़ोसी देशों को होने वाला नुकसान था. जबकि, दूसरा उत्तर कोरिया की प्रतिक्रिया से सियोल के तबाह होने का डर था.’

कुछ संधियां भी बड़ा कारण

इतिहास की जानकारी रखने वाले कुछ जानकार अमेरिका के उत्तर कोरिया पर हमला न करने की एक और वजह कुछ संधियों को भी बताते हैं. इनके मुताबिक 1950 से लेकर 1953 तक उत्तर और दक्षिण करिया के बीच चले युद्ध में चीन और रूस ने उत्तर कोरिया का साथ दिया था. इस युद्ध का अंत संयुक्त राष्ट्र की मध्यस्थता में हुई एक युद्धविराम संधि के साथ हुआ था. इस संधि के दौरान ही वाशिंगटन और बीजिंग के बीच एक समझौता यह भी हुआ था कि अगर अमेरिका भविष्य में उत्तर कोरिया पर हमला करता है तो यह युद्धविराम संधि टूट जाएगी.

इसके अलावा 1961 में चीन और उत्तर कोरिया की वामपंथी सरकारों के बीच भी एक महत्वपूर्ण संधि हुई थी जिसका नाम ‘चीन-उत्तर कोरिया पारस्परिक सहायता और सहयोग मित्रता संधि’ है. इस संधि में कहा गया है कि यदि चीन और उत्तर कोरिया में से किसी भी देश पर अगर कोई अन्य देश हमला करता है तो दोनों देशों को तुरंत एक-दूसरे का सहयोग करना पड़ेगा. अब ऐसे में जाहिर है कि अगर अमेरिका उत्तर कोरिया पर हमला करता है तो उसे उत्तर कोरिया के साथ-साथ चीन का भी मुकाबला करना पड़ेगा और तब उसे लेने के देने पड़ सकते हैं.

हालांकि चीन युद्ध नहीं चाहता

चीनी विशेषज्ञों की मानें तो चीन उत्तर कोरिया की समस्या को शांति से हल करना चाहता है क्योंकि युद्ध की स्थिति में उसे भी कई तरह की समस्याओं का सामना करना पड़ेगा. उसके लिए सबसे बड़ी समस्या उत्तर कोरियाई शरणार्थी होंगे जो युद्ध छिड़ने पर शत्रु देश जापान और दक्षिण कोरिया न जाकर केवल चीन में आने का प्रयास करेंगे.

व्यापारिक दृष्टि से भी चीन के लिए उत्तर कोरिया बहुत ज्यादा महत्वपूर्ण है. पिछले चार दशकों से उत्तर कोरियाई बाजार में चीन का एकछत्र राज कायम है. इसके अलावा अमेरिकी सेनाओं की इस क्षेत्र में उपस्थिति ने भी चीन को परेशान कर रखा है और इसीलिए वह जल्द इस समस्या को हल करना चाहता है. चीन लगातार यही कोशिश कर रहा है कि किसी तरह युद्ध की स्थिति को खत्म किया जा सके.