सीवर सफाईकर्मियों की मौतों से जुड़े मामलों में आज तक किसी को सजा नहीं हुई. सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता सचिव नीलम साहनी ने सोमवार को यह जानकारी दी. उन्होंने माना कि कानून होने के बावजूद सफाईकर्मियों को सुरक्षा प्रदान नहीं की जाती, जिसके चलते वे हादसे का शिकार होकर मारे जाते हैं. केंद्रीय मंत्रालय की सचिव ने यह भी माना कि सभी मृतक सफाईकर्मियों के परिवारों को मुआवजा तक नहीं मिलता.

नीलम साहनी ने राष्ट्रीय सफाई कर्मचारी आयोग के आंकड़ों के हवाले से बताया कि सीवरों या सेप्टिक टैंकों की सफाई करते हुए 776 सफाईकर्मियों की मौत हुई है, लेकिन अभी तक एक भी मामले में किसी व्यक्ति को दोषी नहीं ठहराया गया है. यह हाल तब है जब सफाईकर्मियों को मैन्युअल स्कैवेंजिंग से बचाने वाला कानून लागू है. ‘मैनुअल स्कैवेंजर्स और उनके पुनर्वास अधिनियम, 2013’ के तहत सीवर की सफाई का ठेका लेने वाले व्यक्ति को सफाईकर्मियों की सुरक्षा सुनिश्चित करनी होती है. लेकिन इस कानूनी प्रावधान का शायद ही कहीं पालन किया जाता हो.

टाइम्स ऑफ इंडिया में प्रकाशित खबर के मुताबिक अब हाथ से सीवर की सफाई करने के काम पर रोक लगाने के लिए सरकार नई योजना लेकर आई है. वह 15 अगस्त, 2022 तक मैन्युअल स्कैवेंजिंग को खत्म करना चाहती है. इसके लिए सामाजिक न्याय मंत्रालय और शहरी मामलों के मंत्रालय मिल कर काम करेंगे. सरकार यह काम कैसे करेगी इसके लिए शहरी मामलों के मंत्री हरदीप पुरी और सामाजिक न्याय मंत्री थावर चंद गहलोत ने एक पुस्तिका भी जारी की. इसमें बताया गया है कि कैसे 2022 तक शहरों और नगरों में सीवरों की सफाई के लिए इमरजेंसी रेस्पॉन्स सैनिटेशन यूनिट की शुरुआत की जाएगी.