बिहार विधानसभा की सबसे बड़ी पार्टी राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) का संकट गहराता जा रहा है. उसके राष्ट्रीय अध्यक्ष लालू प्रसाद यादव जेल की सजा काट रहे हैं. अभी वे अस्पताल में भर्ती हैं और उनकी सेहत लगातार खराब हो रही है. उनके उत्तराधिकारी के तौर पर उभरे उनके छोटे बेटे तेजस्वी यादव रविवार को पार्टी की एक अहम बैठक में नहीं पहुंचे.

लोकसभा चुनावों में आरजेडी तेजस्वी यादव के नेतृत्व में उतरी थी और उसका खाता तक नहीं खुला. इसके बाद से तेजस्वी राजनीतिक तौर पर बेहद कम सक्रिय हैं. उनकी कम सक्रियता को लेकर पार्टी के कुछ वरिष्ठ नेता भी सवाल उठा चुके हैं. ​हाल ही में संपन्न हुए विधानसभा के सत्र में भी तेजस्वी यादव कम ही दिखे. आरजेडी नेताओं का कहना है कि तेजस्वी यादव बिहार में नहीं हैं और इसलिए पटना में इस महत्वपूर्ण बैठक का समय उनकी सहमति लेने के बाद तय हुआ था. उनके स्वागत के लिए पार्टी नेता और कार्यकर्ता हवाईअड्डा भी पहुंच गए. लेकिन तेजस्वी नहीं पहुंचे.

हालांकि, आरजेडी के प्रवक्ता मृत्युंजय तिवारी यह नहीं मानते कि तेजस्वी यादव किसी आंतरिक कलह की वजह से बैठक में नहीं आए. वे कहते हैं, ‘कुछ अपरिहार्य वजहों से इस बैठक को टालना पड़ा. इससे अधिक इसमें कुछ नहीं है. इस आधार पर कोई मतलब नहीं निकाला जाना चाहिए.’

लेकिन जिस तरह की चर्चाएं चल रही हैं उनसे ऐसा नहीं लगता. बताया जा रहा है कि लालू प्रसाद यादव के परिवार में सियासी वर्चस्व के लिए कलह जारी है. तेजस्वी के बड़े भाई तेजप्रताप यादव लोकसभा चुनावों के दौरान भी खुलकर तेजस्वी की आलोचना कर रहे थे. तेजप्रताप यादव ने लालू-राबड़ी मोर्चा भी बनाया और कुछ सीटों पर उम्मीदवार भी उतारे. इससे पार्टी को नुकसान भी हुआ.

कहा जा रहा है कि अब तेजस्वी यादव ने परिवार पर इस बात के लिए दबाव बढ़ा दिया है कि अगर आरजेडी उन्हें चलानी है तो फिर अंतिम निर्णय लेने का अधिकार भी उनके पास होना चाहिए. कुछ लोग तो ये भी कह रहे हैं कि तेजस्वी अपने पिता लालू यादव की जगह राष्ट्रीय अध्यक्ष बनना चाहते हैं. उधर, एक दूसरे वर्ग का कहना है कि तेजस्वी राष्ट्रीय अध्यक्ष नहीं बल्कि कार्यकारी अध्यक्ष का पद चाहते हैं.

लालू यादव और राबड़ी देवी के परिवार के साथ-साथ आरजेडी में चल रहे सियासी कलह में तेजप्रताप यादव के अलावा लालू यादव की सबसे बड़ी बेटी और राज्यसभा सांसद मीसा भारती भी एक पक्ष हैं. कहा जा रहा है कि वे भी नहीं चाह रही हैं कि किसी एक व्यक्ति का पार्टी पर पूरा दबदबा कायम हो जाए.

आरजेडी में प्रवक्ता रहे एक नेता इस बारे में कहते हैं, ‘तेजप्रताप यादव और मीसा भारती के साथ-साथ पार्टी के पुराने नेताओं को तेजस्वी यादव से अधिक उनकी मंडली से​ शिकायत है. तेजस्वी दिल्ली में सक्रिय रहने वाले कुछ लोगों से घिरे हुए हैं. इनमें कुछ लोग पार्टी के नेता भी हो गए हैं. तेजप्रताप और मीसा के साथ-साथ पार्टी के नेताओं को भी लग रहा है कि तेजस्वी यादव की मंडली उन्हें लगातार भ्रमित रखती है और यह न सिर्फ उन्हें अपने परिवार बल्कि पार्टी के पुराने स्थापित नेताओं से भी दूर कर रही है.’

तेजस्वी और तेजप्रताप के बीच सियासी विवाद नया नहीं है. लेकिन जब लालू यादव की सेहत ठीक थी तो वे दोनों भाइयों के बीच सुलह कराने की कोशिश करते थे. उनका कहा हुआ अंतिम निर्णय होता था. अब खराब सेहत की वजह से लालू प्रसाद यादव हस्तक्षेप की स्थिति में नहीं हैं.

ऐसे में माना जा रहा है कि जिस तरह से कांग्रेस में राहुल गांधी की जगह फिर से सोनिया गांधी अंतरिम अध्यक्ष बन गईं कुछ वैसा ही आरजेडी में भी हो सकता है. यानी परिवार की सियासी कलह शांत करने के लिए पूर्व मुख्यमंत्री और तेजस्वी यादव की मां राबड़ी देवी कुछ समय के लिए पार्टी की कमान अपने हाथ में ले सकती हैं और इस विवाद को सुलझाने की कोशिश कर सकती हैं.

राबड़ी देवी के नेतृत्व संभालने के बारे में लालू यादव के पुराने सहयोगी और आरजेडी के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष शिवानंद तिवारी कहते हैं, ‘यह कोई नई बात नहीं है. तेजस्वी जब बच्चे थे, तब भी राबड़ी देवी के पास कमान थी. आज भी है और कल भी रहेगी. आरजेडी और लालू-राबड़ी एक दूसरे के पर्याय हैं.’

आरजेडी के कुछ नेता इसके कई फायदे गिना रहे हैं. पार्टी के एक पूर्व सांसद इस बारे में बताते हैं, ‘लालू यादव और राबड़ी देवी के बच्चों में तीन ध्रुव बन गए हैं. इनमें सबसे ताकतवर ध्रुव अभी तेजस्वी यादव हैं. लेकिन कुछ लोग तेजप्रताप यादव के साथ भी हैं और कुछ मीसा भारती के साथ भी हैं. ऐसे में कोई अगर पूरा नियंत्रण अपने हाथ में लेता है तो दिक्कतें स्वाभाविक तौर पर आएंगी. मौजूदा परिस्थितियों में तीनों एक होकर चलें, इसकी संभावना भी कम ही दिखती है.’

वे आगे कहते हैं, ‘ऐसे में अगर राबड़ी देवी कमान अपने हाथ में लेती हैं तो तीनों उनकी टीम के हिस्से के तौर पर काम कर सकते हैं. तेजस्वी तब भी सबसे प्रभावी रहेंगे, लेकिन तेजप्रताप और मीसा भारती इस बात को लेकर आश्वस्त रहेंगे कि अगर तेजस्वी के किसी निर्णय से उन्हें बहुत अधिक दिक्कत हुई तो उस बारे में अंतिम निर्णय राबड़ी देवी का होगा और इसे तीनों लोग स्वीकार करेंगे.’

हालांकि भारतीय जनता पार्टी और जनता दल यूनाइटेड के कुछ नेताओं के साथ-साथ बहुत सारे लोगों को राबड़ी देवी की राजनीतिक क्षमताओं पर संदेह है. जब राबड़ी देवी मुख्यमंत्री के तौर पर काम कर रही थीं तो लालू यादव सक्रिय तौर पर उनका साथ देने के लिए उपलब्ध थे. अब खराब सेहत की वजह से वे सक्रिय नहीं हैं. इन शंकाओं पर राबड़ी देवी की सरकार में मंत्री रहे एक नेता अपनी पहचान उजागर नहीं करने की शर्त पर कहते हैं, ‘तब राबड़ी देवी राजनीति में बिल्कुल नई थीं. हर निर्णय उन्हें लालू यादव से पूछकर लेना होता था. लेकिन समय के साथ उनमें भी राजनीतिक सूझबूझ आई है. रही बात विचार-विमर्श की तो इसके लिए उनके पास सियासत में सक्रिय अपने बच्चों के अलावा लालू यादव के विश्वस्त रहे नेता भी उपलब्ध हैं. इसलिए पार्टी चलाने में उन्हें कोई खास दिक्कत नहीं होनी चाहिए.’

पार्टी के लोगों का कहना है कि आरजेडी को नेतृत्व देने के मामले में अंतिम निर्णय राबड़ी देवी को ही करना है. यह भी कहा जा रहा है कि इस बारे में कोई निर्णय लेने से पहले अगले कुछ दिनों में राबड़ी देवी अस्पताल में भर्ती लालू यादव से मिलने झारखंड की राजधानी रांची जा सकती हैं. इसकी वजह यह है कि आरजेडी में इस तरह के किसी भी बड़े बदलाव का निर्णय अब भी लालू यादव को ही लेना है.