1989 की गर्मियां थीं. बेला चाबा उन दिनों हंगरी के एक पुलिसकर्मी हुआ करते थे. पड़ोसी देश ऑस्ट्रिया के पास वाली सोम्बाथे सीमांत चौकी पर उनकी ड्यूटी लगी हुई थी. हर दिन उनका ऐसे अनेक जर्मनों से सामना होता था, जो तत्कालीन पूर्व जर्मनी से आते थे और सीमापार ऑस्ट्रिया पहुंच कर वहां से पश्चिम जर्मनी जाना चाहते थे.

हंगरी मई 1989 से ही ऑस्ट्रिया के साथ वाली सीमा पर लगी अपनी बाड़ धीरे-धीरे हटा रहा था. तब भी, नियम यही था कि सीमा को अवैध रूप से पार करने वाले पूर्वी जर्मन नगरिक सज़ा के अधिकारी बनेंगे. उन्हें गिरफ्तार कर पूर्वी जर्मन गुप्तचर सेवा ‘स्टासी’ को समर्पित कर दिया जायेगा. ‘स्टासी’ को हिटलर की ‘गेस्टापो’ जैसा ही अत्याचारी समझा जाता था.

पश्चिम जर्मनी जाने की ललक

जर्मनी उस समय तक एक विभाजित देश था. कम्युनिस्ट पूर्व जर्मनी के नागरिक पूर्वी यूरोप के हंगरी जैसे तथाकथित ‘समाजवादी बंधु देशों’ में घूमने-फिरने तो जा सकते थे, पर स्वजातीय पड़ोसी पश्चिम जर्मनी में बिल्कुल नहीं. तब भी नहीं, जब वहां उनके अपने नाते-रिश्तेदार भी हों. वैध ढंग से पश्चिम जर्मनी जा सकना संभव नहीं था, इसलिए बहुतेरे पूर्वी जर्मन नागरिक जोखिम उठाते हुए हंगरी जैसे ‘बंधु समाजवादी देशों’ के रास्ते से पश्चिम जर्मनी पहुंचने का प्रयास करते थे.

न चाहते हुए भी बेला चाबा को उन पूर्वी जर्मनों को सीमा पार करने से रोकना पड़ता था, जो ऑस्ट्रिया पहुंच कर वहां से पश्चिम जर्मनी पहुंचने का सपना संजोये होते थे. 68 साल के हो गये इस भूतपूर्व पुलिसकर्मी ने उन दिनों को याद करते हुए एक जर्मन संवाददाता को बताया, ‘बहुत दुखद स्थिति थी और मैं एकदम निढाल हो जाता था.’ लोगों को सीमा पार करने से रोकना उन्हें बिल्कुल पसंद नहीं था, पर यही काम उन्हें सौंपा गया था.

गोर्बाचोव पूर्व जर्मनी के लिए सिरदर्द बने

पूर्वी जर्मन सरकार के लिए पश्चिम जर्मनी एक ‘ग़ैर-कम्युनिस्ट’ पूंजीवादी देश होने के नाते अछूत के समान था. ऐसे पूर्वी जर्मन नागरिकों का, जो पेंशनभोगी वयोवृद्ध लोग नहीं हैं, वहां जाना सरासर वर्जित था. जो कोई इसका प्रयास करता था, वह सीधे जेल पहुंचता था. पेंशनभोगियों को भी पूर्व-अनुमति लेनी पड़ती थी.

1989 आने तक पूर्व जर्मनी की आर्थिक स्थिति बहुत ख़स्ता हो चली थी. ऊपर से मॉस्को में बैठे नये सोवियत नेता मिख़ाइल गोर्बाचोव के उदार विचार, ग्लासनोस्त (पारदर्शिता) और पेरेस्त्रोइका (आर्थिक, सामाजिक, राजनैतिक पुनर्गठन) जैसे उनके नये नारे पूर्वी जर्मन नेताओं के लिए नए सिरदर्द बन गये थे.

हंगरी भी एक कम्युनिस्ट देश था. लेकिन, गोर्बाचोव के कारण पूर्व जर्मनी के रूढ़िवादी कम्युनिस्ट नेताओं का यही सिरदर्द हंगरी के तत्कालीन सुधार और उदारवादी प्रधानमंत्री मीक्लोस नेमेत का सौभाग्य सिद्ध हुआ. वे ऑस्ट्रिया के साथ वाली सीमा पर बनी बाड़ को हटाना चाहते थे. देश की जनता और विपक्ष भी उनके साथ था. पर सबसे निर्णायक प्रश्न यह था कि मॉस्को से उन्हें हरी झंडी मिलने के बदले कहीं डंडे तो नहीं बरसने लगेंगे. 1956 में ऐसा हो चुका था.

जब सोवियत संघ ने हंगरी को कुचला

23 अक्टूबर 1956 को बुडापेस्ट विश्वविद्यालय के छात्रों ने वहां की सोवियत समर्थक कम्युनिस्ट सरकार के विरोध में एक ज़ोरदार प्रदर्शन किया. वे देश में लोकतंत्र की मांग कर रहे थे. सरकार ने उनकी का मांग का उत्तर बंदूक की गोलियों से दिया. इसके बाद देश में विद्रोह की एक ऐसी लहर उठी, जिसने सरकार को उखाड़ फेंका. लोकप्रिय नेता इम्रे नाज के नेतृत्व में कई पार्टियों की एक साझी सरकार बनी. लेकिन मॉस्को ने अपने टैंक भेज कर इस सरकार को रौंद दिया. चार नवंबर 1957 को वहां मॉस्को-भक्त कम्युनिस्टों की एक नयी सरकार बैठाई गई. इम्रे नाज सहित कई नेताओं को फांसी दे कर मार डाला गया. हज़ारों लोगों को जेलों में ठूंस दिया गया. लाखों लोगों ने भाग कर पश्चिमी देशों में शरण ली. पूर्वी यूरोप के किसी कम्युनिस्ट देश में सोवियत सैनिक हस्तक्षेप की यह पहली बड़ी कहानी थी.

लेकिन 1989 के हंगरी में ऐसा कुछ भी नहीं हुआ, क्योंकि तब मॉस्को के क्रेमलिन में मिख़ाइल गोर्बाचोव बैठे हुए थे. हंगरी के तत्कालीन प्रधानमंत्री मीक्लोस नेमेत ने जब गोर्बाचोव से कहा कि वे ऑस्ट्रिया के साथ वाली सीमा पर बनी अपनी बाड़ को हटाना चाहते हैं, तो उनके ही मुताबिक गोर्बाचोव का उत्तर था, ‘जब तक मैं हूं, 1956 दुहराया नहीं जायेगा.’

‘पैनयूरोपियन पिकनिक’

19 अगस्त 1989 के दिन हंगरी के लोगों ने देश के धुर पश्चिम में ऑस्ट्रिया के साथ वाली सीमा के पास के शोप्रोन नाम के स्थान पर ‘पैनयूरोपियन पिकनिक’ नाम का एक आयोजन किया. ढेर सारी पर्चियां बांट कर प्रचारित किया गया कि उस दिन ऑस्ट्रिया के साथ वाली सीमा कुछ समय के लिए खोल दी जायेगी.

तीसरे पहर तीन बजे तक वहां 20 से 25 हज़ार लोग पिकनिक मनाने और सीमा पार करने के लिए जमा हो गये. तीन घंटे के लिए सीमा सबके लिए खोल दी गई. हंगरी के सीमारक्षक सैनिकों ने किसी को नहीं रोका. इस दौरान क़रीब 600 पूर्वी जर्मन नागरिक भी सीमा पार कर ऑस्ट्रिया पहुंच गये. ऑस्ट्रिया भी एक जर्मन-जातीय और भाषीय देश है. वहां उन्हें किसी रोकटोक का सामना नहीं करना पड़ा. पूर्वी जर्मन वहां से जल्द ही पश्चिम जर्मनी पहुंच गये.

हंगरी का साहसिक निर्णय

इस अनपेक्षित घटना की 30वीं जयंती मनाने के लिए जर्मन चांसलर अंगेला मेर्कल भी सोमवार 19 अगस्त के दिन हंगरी के शोप्रोन में थीं. हंगरी के प्रधानमंत्री विक्तोर ओर्बान भी वहां थे. उनकी उपस्थिति में चांसलर मेर्कल ने 30 वर्ष पूर्व के हंगरी के साहसिक निर्णय के प्रति आभार प्रकट करते हुए कहा, ‘शोप्रोन उदाहरण है कि हम यूरोपीय यदि अपने अविभाज्य मूल्यों के प्रति निष्ठावान बने रहें, तो क्या कुछ पा सकते हैं.’

चांसलर मेर्कल भी उसी पूर्व जर्मनी की निवासी हैं, जिसकी कम्युनिस्ट सरकार ने दो हिस्सों में विभाजित बर्लिन शहर के पश्चिमी हिस्से को घेरने वाली, साढ़े तीन मीटर ऊंची और कुल मिलाकर 160 किलोमीटर लंबी ‘बर्लिन दीवार’ का निर्माण 13 अगस्त 1961 को शुरू किया था. इस लेख का लेखक भी, 1970 वाले देशक में, आठ वर्षों तक पूर्व जर्मनी की राजधानी पूर्वी बर्लिन में रहने का भुक्तभोगी है. मैं 1980 वाले दशक की शुरुआत में कुछ वर्ष चारों ओर दीवार से घिरे पश्चिम बर्लिन में भी रह चुका हूं. कह सकता हूं कि बर्लिन दीवार के दोनों ओर के जीवन से सुपरिचित हूं.

दीवार जीवित फांद लेना लगभग असंभव था

दीवार के अस्तित्व के 28 वर्षों में कम से कम 140 पूर्वी जर्मन उसे फांदने के प्रयास में गोलियों या बारूदी सुरंगों की भेंट चढ़ गये. साढ़े तीन मीटर ऊंची सीमेंट-कंक्रीट की प्रायः दोहरी दीवार के बीच के हिस्से में बारूदी सुरंगें बिछी होती थीं. सीमारक्षक सैनिक खूंखार अलशेसियन कुत्ते लेकर गश्त लगाते थे. थोड़ी-थोड़ी दूर बने ऊंचे अवलोकन यानी वॉच टावरों में बैठे सैनिक दूरबीनों से सब कुछ देख रहे होते थे. दीवार जीवित फांद लेना लगभग असंभव था.

पूर्व जर्मनी की सरकार द्वारा बर्लिन दीवार के निर्माण का उद्देश्य था, अपने नागरिकों को पश्चिम बर्लिन और पश्चिम जर्मनी जाने से रोकना. बर्लिन दीवार बनने के बाद से, 19 अगस्त 1989 को हंगरी के रास्ते से हुआ पूर्वी जर्मन नागरिकों का पलायन तब तक का सबसे बड़ा निरापद पलायन था. इससे पहले जहां कहीं से जो भी छिटपुट पलायन हुए थे, वे सब जोखिम भरे पलायन थे.

हंगरी का निर्णय बर्लिन दीवार गिरने की भूमिका बना

यही नहीं, तीन ही सप्ताह बाद 11 सितंबर 1989 के दिन हंगरी ने ऑस्ट्रिया के साथ वाली अपनी सीमा पूर्वी जर्मन नागरिकों के लिए पूरी तरह खोल दी. उनके लिए हंगरी के रास्ते से पलायन करना हंगरी के नियमों के अनुसार अवैध नहीं रहा. यह निर्णय नौ नवंबर 1989 की शाम बर्लिन दीवार गिरने की भूमिका बन गया.

जर्मनी के विभाजन के बाद पूरा बर्लिन शहर, तत्कालीन पश्चिम जर्मनी की सीमा से क़रीब 200 किलोमीटर दूर, पूरी तरह पूर्व जर्मनी के भूभाग से घिरा हुआ था. जर्मनी ही नहीं, बर्लिन शहर भी, पूर्वी और पश्चिमी बर्लिन के रूप में, दो टुकड़ों में बंटा हुआ था. पूर्वी बर्लिन पूर्व जर्मनी की राजधानी था, जबकि पूर्व जर्मनी के भूभाग से घिरे हुए पश्चिम बर्लिन का प्रशासन पश्चिम जर्मनी के हाथों में था.

दीवार न होती, तो पूर्व जर्मनी खाली हो जाता

पश्चिम जर्मनी और पश्चिमी बर्लिन के बीच आना-जाना केवल रेल, सड़क या हवाई मार्ग से ही संभव था. रेल और सड़क मार्ग निरापद नहीं थे, क्योंकि वे पूर्व जर्मनी की भूमि पर से होकर जाते थे. पूर्व जर्मनी की पुलिस या गुप्तचर सेवा किसी को भी किसी बहाने से गिरफ्तार कर सकती थी, और किया भी करती थी. पूर्व जर्मनी की कम्युनिस्ट सरकार ने बर्लिन दीवार इसलिए बनायी थी, ताकि उसके नागरिक बेहतर जीवन के लिए भाग कर पश्चिम बर्लिन या वहां से पश्चिम जर्मनी न जा सकें. समय के साथ पलायन इतना बढ़ता जा रहा था कि दीवार न होने पर पूर्व जर्मनी एक दिन शायद पूरी तरह ख़ाली हो जाता. तब जनता को मार्क्सवादी समता-समानता का सब्ज़बाग दिखाने वाली सरकार भला किस पर राज करती?

यहां यह बताना अप्रासंगिक न होगा कि 1945 में जर्मनी और उसकी राजधानी बर्लिन का विभाजन आख़िर क्यों और कैसे हुआ.

जर्मनी का विभाजन क्यों और कैसे

जर्मन तानाशाह हिटलर द्वारा छेड़े गये द्वितीय विश्वयुद्ध का अंत यूरोप में आठ मई 1945 को जर्मन सेना के बिना शर्त आत्मसमर्पण के साथ हुआ था. आत्मसमर्पण की औपचारिकता राजधानी बर्लिन में संपन्न हुई थी. महीने भर बाद पांच जून को बर्लिन में ही चारों विजेता शक्तियों अमेरिका, तत्कालीन सोवियत संघ, ब्रिटेन और फ्रांस ने घोषित किया कि नाज़ीवादी जर्मन सरकार के, उसकी सर्वोच्च सैन्यकमान के और हर प्रकार के प्रशासनिक अधिकार अब उनके हाथों में हैं. पूरे जर्मनी को उन्होंने अपने-अपने क़ब्ज़े वाले चार अलग-अलग अधिकृत क्षेत्रों (ज़ोनों) में तथा राजधानी बर्लिन को चार अधिकृत सेक्टरों में बांट लिया. हर देश के हिस्से वाले अधिकृत क्षेत्र का सर्वोच्च कमांडर ही उस क्षेत्र का सर्वोच्च प्रशासक भी था. उनके बीच आपसी तालमेल बैठाने के लिए बर्लिन में एक साझी ‘नियंत्रण परिषद’ बनी.

बर्लिन के पड़ोसी शहर पोट्सडाम में अगस्त 1945 में हुए इन विजेता देशों के बहुचर्चित शिखर सम्मेलन में भी जर्मनी के चार टुकड़े किये जाने पर मुहर लगी. पर यह भी कहा गया कि विजेता देश जर्मनी का अस्तित्व नहीं मिटाना चाहते.

नये जर्मन राज्य की नींव

इसी आश्वासन के आधार पर अमेरिका, ब्रिटेन और फ्रांस के क़ब्जों वाले जर्मनी के तीनों पश्चिमी ज़ोनों को मिलाकर एक नया संघात्मक लोकतांत्रिक राज्य बनाने के प्रयास होने लगे. एक नया अंतरिम संविधान बना. पश्चिमी विजेता शक्तियों के आशीर्वाद के साथ वह 23 मई 1949 को उनके नियंत्रण वाले तीनों पश्चिमी ज़ोनों में लागू हुआ. इसी के साथ जर्मनी के पश्चिमी भाग में ‘फ़ेडरल रिपब्लिक ऑफ़ जर्मनी’ (संघीय जर्मन गणराज्य) नाम से एक नया देश बना. बोलचाल की भाषा में उसे ‘पश्चिम जर्मनी’ कहा जाता था. बर्लिन से क़रीब छह सौ किलोमीटर पश्चिम में स्थित छोटे-से बॉन को उसकी अंतरिम राजधानी बनाया गया.

लेकिन, 1949 आते-आते हिटलर-विरोधी ‘मित्र राष्ट्र गठबंधन’ टूट चुका था. अमेरिका के नेतृत्व वाले पश्चिमी देशों और सोवियत संघ के बीच तथाकथित ‘शीत युद्ध’ की बर्फीली हवाएं चलने लगी थीं. पराजय के बाद जर्मनी की बंदरबांट में उसका पूर्वी हिस्सा, और बर्लिन शहर का पूर्वी भाग, सोवियत संघ को मिला था. उसने जर्मन कम्युनिस्टों की सहायता से, सात अक्टूबर 1949 को, वहां ‘जर्मन डेमोक्रैटिक रिपब्लिक’ (जर्मन जनवादी गणतंत्र) नाम से एक कम्युनिस्ट जर्मनी की स्थापना की. बोलचाल की भाषा में उसे ‘जीडीआर’ या ‘पूर्व जर्मनी कहा’ जाता था. विभाजित बर्लिन शहर का पूर्वी हिस्सा इस पूर्व जर्मनी की राजधानी बना.

जर्मनी का विभाजन जनता ने नहीं, विजेताओं ने किया

इस प्रकार जर्मन जनता द्वितीय विश्वयुद्ध में जर्मनी की पराजय के बाद स्वेच्छा से नहीं, बल्कि विजेता शक्तियों की इच्छानुसार, परस्पर विरोधी राजनैतिक विचारधारओं वाले दो देशों में बंट गयी. दोनों के बीच एक-दूसरे को नीचा दिखाने और अपनी श्रेष्ठता का सिक्का जमाने की वैसी ही तनातनी चलती थी, जो भारत- पाकिस्तान के बीच आज भी बनी हुई है.

इस तनातनी का अंत हुआ नौ नवंबर 1989 को पूर्व जर्मनी की कम्युनिस्ट पार्टी के एक पोलितब्यूरो सदस्य ग्युंटर शाबोव्स्की द्वारा एक पत्रकार सम्मेलन कहे एक वाक्य से. उस वक्य का अर्थ यह निकलता था कि पूर्व जर्मनी के लोग भी अब विदेशयात्रा कर सकते हैं. टेलीविज़न पर यह देखते-सुनते ही हज़ारों लोग दीवार के पश्चिम बर्लिन जाने के गेट पर टूट पड़े. वहां तैनात पुलिस और सुरक्षाकर्मी उन्हें रोक नहीं पा रहे थे. सोवियत नेता गोर्बाचोव ने भी हस्तक्षेप करने से मना कर दिया. तब भीड़ के हाथ जो कुछ लगा, उससे लोगों ने दीवार को तोड़ना शुरू कर दिया. अंततः सारे गेट खोल देने पड़े. 11 महीने बाद, तीन अक्टूबर 1990 को पूर्व जर्मनी का अस्तित्व मिट गया. जर्मनी का औपचारिक एकीकरण हो गया.

भारत के साथ तुलना

जर्मनी के बंटवारे की यदि भारत के साथ तुलना करें, तो मुख्य अंतर यही था कि भारत का बंटवारा अंग्रेज़ों ने धार्मिक विद्वेष उकसा कर किया था. युद्ध में पराजित जर्मनी के बंटवारे में धार्मिक विद्वेष के बीज नहीं थे. जर्मनी का विभाजन उस पर विजय पाने वाले देशों ने अपनी पूंजीवादी या साम्यवादी विचारधारा को पोषित करने के लिए किया था. धर्म की कोई भूमिका नहीं थी. धर्म की जो जन्मजात घुट्टी पिलाई जाती है, उसका रंग आजीवन उतरता नहीं. जबकि विचारधाराएं समय के साथ अपने रंग बदलती भी हैं.

विचारधाराओं से ऊपर उठ कर एकात्म होना कहीं सरल होता है. धर्मों से ऊपर उठना हर धर्म में अधर्म है. यही मुख्य कारण है कि मॉस्को में गोर्बाचोव का उदय होते ही, 30 साल पूर्व, नौ नवंबर 1989 को, बर्लिन दीवार गिरा कर एक ही ईसाई धर्म वाली तब तक विभाजित जर्मन जनता 40 वर्ष बाद एकात्म हो गयी. जबकि दो बड़े धर्मो वाले अखंड भारत की जनता भारत के विभाजन के बाद के हर वर्ष के साथ और अधिक दूर हटती और विभाजित होती गयी है. फ़िलहाल तो यदि विभाजित कश्मीर का ही एकीकरण हो जाये और वहां भारतीय तिरंगा फहराता रहे, तो यही भारत के लिए एक बहुत बड़ी उपलब्धि होगी.