दिल्ली विश्वविद्यालय (डीयू) में छात्र संघ चुनाव से एक महीने पहले छात्र संगठनों की हलचलें बढ़नी शुरू हो गई हैं. इस सिलसिले में आज राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) का छात्र संगठन अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) काफी चर्चा में है. एबीवीपी ने डीयू के नॉर्थ कैंपस में एक स्थान पर बिना किसी पूर्व अनुमति के नेताजी सुभाष चंद्र बोस और भगत सिंह के साथ विनायक दामोदर सावरकर की प्रतिमा लगा दी है और इसका बाकी छात्र संगठनों ने विरोध किया है.

एबीवीपी के इस कदम की कांग्रेस से संबद्ध भारतीय राष्ट्रीय छात्र संगठन (एनएसयूआई) और वामदल समर्थित ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन (आईसा) ने आलोचना की है. इन संगठनों ने कहा है कि सुभाष चंद्र बोस और भगत सिंह के साथ सावरकर को नहीं रखा जा सकता.

इस बीच एबीवीपी के नेतृत्व वाले विश्वविद्यालय छात्रसंघ के अध्यक्ष शक्ति सिंह का कहना है कि उन्होंने कई बार डीयू प्रशासन से प्रतिमा स्थापित करने की अनुमति मांगने के लिए संपर्क किया लेकिन उसका कोई जवाब नहीं आया. इसके चलते संगठन यह कदम उठाने को ‘मजबूर’ हुआ. डीयू छात्र संघ अध्यक्ष का यह भी कहना है कि अगर विश्वविद्यालय प्रशासन प्रतिमा हटाने की कोशिश करता है तो एबीवीपी इसका विरोध करेगा.

वहीं एनएसयूआई की दिल्ली इकाई के अध्यक्ष अक्षय लाकरा ने एबीवीपी के इस कदम की आलोचना करते हुए कहा है, ‘आप सावरकर को भगत सिंह और सुभाष चंद्र बोस के साथ नहीं रख सकते. अगर प्रतिमाएं 24 घटें के भीतर नहीं हटाई गईं तो हम विरोध प्रदर्शन शुरू करेंगे.’ आईसा की दिल्ली इकाई की अध्यक्ष कवलप्रीत कौर ने भी लाकरा के बयान का समर्थन किया है. कौर ने कहा है, ‘भगत सिंह और सुभाष चंद्र बोस की आड़ में ये लोग सावरकर के विचारों को वैधता देने का प्रयास कर रहे हैं. यह स्वीकार्य नहीं है.’ जिस स्थान पर प्रतिमा लगाई गई है वह उत्तर दिल्ली नगर निगम के अधिकार क्षेत्र में आता है. इस पूरे मामले में फिलहाल डीयू की ओर से कोई प्रतिक्रिया नहीं आई है.

1883 में जन्मे सावरकर 1948 में हुई महात्मा गांधी की हत्या के आठ आरोपितों में से एक थे. हालांकि उन्हें बरी कर दिया गया क्योंकि उन्हें दोषी साबित करने के लिए जरूरी सबूत नहीं थे. राजनीतिक हिंदुत्ववादी विचारधारा के जनक कहे जाने वाले सावरकर ने आजादी के आंदोलन में भी हिस्सा लिया था.