सुप्रीम कोर्ट ने बलात्कार के संबंध में एक महत्वपूर्ण टिप्पणी की है. उसने कहा है कि अगर कोई महिला यह जानते हुए भी किसी अन्य पुरुष से यौन संबंध जारी रखती है कि यह एक औपचारिक रिश्ता नहीं बन पाएगा, तो बाद में वह यह आरोप नहीं लगा सकती कि उस व्यक्ति ने शादी का झूठा वादा कर उससे संबंध बनाए. सुप्रीम कोर्ट के जज डीवाई चंद्रचूड़ और इंदिरा बनर्जी ने एक महिला बिक्री कर उपायुक्त द्वारा सीआरपीएफ के एक अधिकारी के खिलाफ दायर किए गए बलात्कार के मामले को खारिज करते हुए यह बात कही.

टाइम्स ऑफ इंडिया में प्रकाशित खबर के मुताबिक सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि दोनों महिला-पुरुष पिछले आठ सालों तक रिलेशनशिप में रहे. इस दौरान वे कई बार एक-दूसरे के घर में रुके. कोर्ट ने कहा कि यह बताता है कि दोनों के बीच का संबंध आपसी सहमति से था. खबर के मुताबिक शिकायतकर्ता महिला ने सीआरपीएफ के अधिकारी पर आरोप लगाया था कि 2008 में उसने शादी का वादा करके जबरन उसके साथ शारीरिक संबंध बनाए थे. रिलेशनशिप के दौरान वे कई बार एक साथ रहे. लेकिन 2014 में पुरुष ने शादी को लेकर संदेह जताना शुरू कर दिया. इसके बावजूद अगले दो साल तक उनका रिश्ता चलता रहा. बाद में जब पुरुष ने किसी और महिला से सगाई कर ली तो महिला ने उसके खिलाफ एफआईआर दर्ज करा दी.

लेकिन जब मामला अदालत पहुंचा तो उसने कहा कि झूठा वादा करने और वादा तोड़ने में अंतर है. उसने महिला द्वारा दर्ज कराई गई एफआईआर पर गौर करने के बाद कहा कि इसमें लगाए गए आरोपों से यह संकेत नहीं मिलता कि अपीलकर्ता वादा नहीं निभाना चाहता था या दोनों के बीच यौन संबंध उस वादे के आधार पर बनाए गए. कोर्ट ने कहा, ‘अपीलकर्ता 2008 में किया वादा 2016 में नहीं निभा पाया, इसका यह मतलब नहीं निकाला जा सकता उसका वादा झूठा था. शिकायतकर्ता की एफआईआर से संकेत मिलता है कि उनके रिश्ते में 2008 से ही बाधाएं थीं और शादी को लेकर दोनों के बीच विवाद होने के बाद भी दोनों शारीरिक संबंध बनाते रहे.’