रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने कुछ दिन पहले भारत-पाकिस्तान के बीच चल रही तनातनी को लेकर दो बड़े बयान दिए. उन्होंने कहा कि अब अगर पाकिस्तान से बात होगी तो सिर्फ़ उसके क़ब्जे वाले कश्मीर (पीओके) पर होगी. इसके साथ राजनाथ सिंह ने भारत की परमाणु शक्ति के संबंध में ऐसी बात कही जिसने एक पुरानी को बहस फिर छेड़ दिया. रक्षा मंत्री ने कहा कि अभी तक भारत की परमाणु नीति ‘पहले हमला नहीं’ (एनएफ़यू) करने के सिद्धांत की रही है, लेकिन भविष्य में यह नीति परिस्थितियों पर निर्भर करेगी.

राजनाथ सिंह के इस बयान को कई लोगों ने भारत की परमाणु नीति में जल्दी ही होने जा रहे परिवर्तन के संकेत के रूप में देखा है. उनकी पार्टी भाजपा विपक्ष में रहते हुए एनएफ़यू की समीक्षा की बात कहती रही है. वहीं, सरकार में आने बाद भी वह इसकी समीक्षा की ज़रूरत पर बल दे चुकी है. इस सिलसिले में पूर्व रक्षा मंत्री दिवंगत मनोहर पर्रिकर का साल 2016 में दिया वह बयान याद किया जा सकता है जिसमें उन्होंने कहा था कि भारत अनंतकाल के लिए एनएफ़यू पर क़ायम नहीं रह सकता. अब जम्मू-कश्मीर से धारा 370 हटने के बाद पाकिस्तान के साथ जिस तरह की तनातनी चल रही है, उसे देखते हुए रक्षा मंत्री का बयान हैरान नहीं करता.

न्यूक्लियर डॉक्ट्रिन और भारत की एनएफ़यू नीति

द्वितीय विश्व युद्ध में अमेरिका द्वारा जापान के ख़िलाफ़ परमाणु हथियार इस्तेमाल किए जाने के बाद इस बेहद विनाशकारी शक्ति का फिर कभी किसी युद्ध में उपयोग नहीं किया गया. लेकिन ख़ुद को परमाणु संपन्न बनाने की होड़ दुनिया के सभी कथित शांतिप्रिय देशों के बीच चलती रही है. इस फ़ेहरिस्त में अमेरिका और रूस के नाम सबसे आगे हैं. ज़्यादा से ज़्यादा परमाणु हथियार बनाने और उनका परीक्षण करने की इन दोनों देशों की सनक ने शीत युद्ध को काफी खतरनाक बना दिया था. उस दौरान रूस की तरफ़ से किसी भी संभावित परमाणु हमले के मद्देनज़र अमेरिका ने धमकी के रूप में ‘न्यूक्लियर डेटरेंस’ (या डॉक्ट्रिन) की नीति अपनाई थी.

न्यूक्लियर डेटरेंस का मतलब है किसी परमाणु शक्ति वाले देश के ख़िलाफ़ सैन्य कार्रवाई करने के बदले परमाणु हमले का ख़तरा मोल लेना. परमाणु हथियारों से लैस देशों की यह दलील रही है कि परमाणु शक्ति युद्ध टालने वाली सुरक्षा (आत्मरक्षा) है. अमेरिका, ब्रिटेन, फ़्रांस और भारत जैसे लोकतांत्रिक राष्ट्र हों या पाकिस्तान और उत्तर कोरिया जैसे ग़ैर-ज़िम्मेदार समझे जाने वाले देश, ये सभी परमाणु हथियार रखने का आधार आत्मरक्षा और शांति को बताते हैं. हालांकि न्यूक्लियर डेटरेंस का सीधा मतलब है कि अगर किसी देश के पास परमाणु हथियार हैं, तो कोई और देश उस पर हमला करने से घबराएगा, क्योंकि हमला होने की सूरत में बदले की कार्रवाई के तहत वह देश अपने परमाणु हथियारों का इस्तेमाल कर सकता है.

भारत के संदर्भ में न्यूक्लियर डेटरेंस का यह सिद्धांत बिलकुल सीधा नहीं है. यहां 2003 से परमाणु हथियारों को लेकर ‘नो फ़र्स्ट यूज़’ (एनएफ़यू) की नीति चल रही है. इसके मुताबिक़ भारत तब तक किसी देश पर परमाणु हमला नहीं करेगा, जब तक उसके ख़िलाफ़ परमाणु हमला नहीं किया जाता. परमाणु हथियारों को लेकर भारत की यह नीति पूरी दुनिया में उसके शांति के प्रति जिम्मेदार राष्ट्र होने के सबूत के तौर पर देखी जाती है.

जाहिर है कि भारत को परमाणु हमले का खतरा पाकिस्तान से है. ऐसे में कई विशेषज्ञ हमले से पूर्व बचाव की रणनीति के रूप में भारत की एनएफ़यू नीति को उसके लिए जोखिम भरा मानते हैं. वे इसकी वजह इस नीति के आधार को बताते हैं. उनके मुताबिक़ भारत की एनएफ़यू नीति रक्षा नहीं, बल्कि प्रतिरोध के सिद्धांत पर आधारित है. यानी अगर कभी पाकिस्तान ने भारत पर परमाणु हमला किया, तो उसके जवाब में भारत का परमाणु हमला बचाव की नहीं, बल्कि बदले की कार्रवाई होगी. और यह बदला ख़ुद पर हुए हमले से कई गुना बड़े हमले के रूप में होगा. भारत पहले हमला नहीं करेगा लेकिन उस पर हुए हमले का जवाब बहुत भीषण होगा. अब सवाल यह बनता है कि अगर भारत ऐसा करता है तो इसमें दिक़्क़त क्या है.

सामरिक परमाणु हथियारों की दुविधा

कई जानकार कहते हैं कि परमाणु हथियार के इस्तेमाल के मामले में भारत की नो फ़र्स्ट यूज़ की नीति पाकिस्तान को पहला और ज्यादा घातक हमला करने का मौक़ा देती है, जबकि भारत के विकल्पों को यह सीमित कर सकती है. इस संबंध में जाने-माने रक्षा विशेषज्ञ आर्का बिस्वास बताते हैं कि परमाणु हथियार के इस्तेमाल में पहल करने के विपरीत बदले की व्यापक कार्रवाई की रणनीति को कड़ी आलोचना का सामना करना पड़ा है. उनके तर्क को मानें तो परंपरागत युद्ध में पाकिस्तान के भारत के ख़िलाफ़ सामरिक परमाणु हथियारों के इस्तेमाल पर भारत दुविधा में फंस सकता है.

सामरिक परमाणु हथियार मुख्यतः नज़दीकी सीमा वाले शत्रु देश के ख़िलाफ़ युद्ध के हालात में इस्तेमाल करने के लिए तैयार किए जाते हैं. इनकी रेंज और मारक क्षमता बड़े पैमाने पर विनाश करने वाले परमाणु हथियारों जैसी नहीं होती. ये छोटे हथियार होते हैं और इन्हें अमूमन सैन्य ठिकानों को निशाना बनाने के लिए ही विकसित किया जाता है. बताया जाता है कि हाल के समय में हमारे पड़ोसी देश ने ऐसे हथियारों का काफ़ी ज्यादा उत्पादन-परीक्षण किया है. जानकारों का मानना है कि युद्ध की स्थिति में भारत पर बड़ा परमाणु हमला करने के बजाय पाकिस्तान अपने सामरिक हथियारों का इस्तेमाल करेगा.

इस हवाले से आर्का बिस्वास का कहना है, ‘युद्ध में पाकिस्तान के परमाणु हथियारों का इस्तेमाल करने पर भारत द्वारा जवाब में बड़े पैमाने पर परमाणु कार्रवाई किया जाना बेहद अमानवीय होगा, क्योंकि भारतीय संदर्भ में इसका मतलब शहरोंं पर छापामारी करते हुए आबादी और औद्योगिक केंद्रों को निशाना बनाना होगा. पाकिस्तान द्वारा इसी तरह की बदले की कार्रवाई होने की आशंका को देखते हुए इसे अविवेकपूर्ण भी कहा जाएगा.’ बिस्वास आगे कहते हैं, ‘दूसरी ओर, अगर भारत अपने परमाणु हथियारों से बिलकुल भी जवाबी कार्रवाई नहीं करता तो इससे विरोधी का प्रतिरोध करने संबंधी उसके शांतिकालीन परमाणु सिद्धांत की विश्वसनीयता बुरी तरह घट जाएगी.’

क्या भारत को दो तरह की परमाणु नीति बनानी होगी?

बिस्वास जो आशंका जाहिर करते हैं शायद वही वजह है कि देश के पूर्व राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार शिवशंकर मेनन भी एनएफ़यू का कोई विकल्प खोजने की वकालत करते हैं. मेनन का मानना रहा है कि अगर भारत को पता हो कि पाकिस्तान परमाणु हमला करने वाला है तो ऐसी स्थिति से निपटने के लिए एनएफ़यू की कोई काट निकालनी होगी. पूर्व राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार की इस बात में परमाणु हथियारों को लेकर दो तरह की नीति अपनाए जाने का संकेत मिलता है. मौजूदा परमाणु नीति शांतिकालीन सिद्धांत के तहत अपनाई गई नीति है, जो पहला हमला नहीं करने की गारंटी देती है. लेकिन पाकिस्तान के लिए भारत को युद्धकालीन सिद्धांत के आधार पर एक और परमाणु नीति अपनानी चाहिए. आर्का बिस्वास के मुताबिक़ इसका मतलब यह नहीं कि भारत एनएफ़यू से हट जाए, बल्कि उसकी समीक्षा कर उन लक्ष्यों की पहचान की जाए जिनको हासिल करने के लिए भारत ने अपनी परमाणु नीति को विकसित किया था.

मौजूदा एनएफ़यू को लेकर विशेषज्ञों के असंतोष की एक और वजह चीन है. यह अधिकतर लोगों की राय है कि सैन्य शक्ति के मामले में भारत अपने इस बड़े पड़ोसी देश से पीछे रहा है और व्यावहारिक रूप से उसे भयभीत रखने में विफल भी रहा है. साल 1995 से 2014 के बीच चीन ने अपनी नौसेना पंडुब्बियों और अन्य विध्वंसक हथियारों में 80 प्रतिशत से भी ज़्यादा की वृद्धि के साथ विस्तार किया है. उसने अपना रक्षा बजट लगातार बढ़ाया है जिसका प्रभाव उसकी सैन्य शक्ति पर साफ़ दिखाई देता है. भारत से अपनी सीमा सटी होने के चलते चीन ने वहां बड़े पैमाने सैन्य सुविधाएं बढ़ाई हैं. ऐसे में चीन को उसकी हद में रखने के लिए भी भारत को एनएफ़यू में बदलाव करना चाहिए.

लेकिन एनएफयू में बदलाव इतना आसान नहीं है

एनएफ़यू को लेकर रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह का बयान भले ही इसमें संभावित बदलाव के संकेतक रूप में देखा जा रहा हो लेकिन ऐसे किसी भी बदलाव के लिए पहले काफी तैयारी करनी पड़ती है. और यह तैयारी एक बड़ा काम है. रक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि एनएफ़यू की नीति को प्रतिरोधक से रक्षात्मक सिद्धांत के तहत बदलना आर्थिक रूप से काफ़ी महंगा सौदा हो सकता है. उनके मुताबिक़ जवाबी कार्रवाई के तहत परमाणु हमला करना ज़्यादा किफ़ायती सौदा होता है, जबकि पहले हमला करने की नीति पर चलने के लिए हथियारों और उनके वितरण के लिए भारी निवेश की ज़रूरत पड़ती है. चूंकि एनएफ़यू के चलते भारत की परमाणु शक्ति का नियंत्रण वैज्ञानिकों के हाथ में रहा है, इसलिए इसमें ज़रूरी बदलाव कर यह नियंत्रण सेना के हाथ में देना पड़ सकता है. साथ ही, इसके लिए बड़े पैमाने पर परमाणु हथियारों की तैनाती की ज़रूरत होगी जिसके लिए सैन्य स्तर पर भी काफ़ी निवेश करना होगा.

इसके अलावा देश की आईएसआर प्रणाली - यानी ख़ुफ़िया व्यवस्था, निगरानी और सैनिक सर्वेक्षण - भी पुख़्ता होनी चाहिए. अंतरराष्ट्रीय ग़ैर-लाभकारी संगठन ‘बुलेटिन ऑफ़ द एटॉमिक साइंटिस्ट्स’ के ताज़ा आकलन की मानें तो भारत के पास इस समय कुल 130-150 परमाणु हथियार हैं. जानकारों के मुताबिक़ रक्षात्मक न्यूक्लियर डेटरेंस के लिहाज़ से यह संख्या काफ़ी कम है. वहीं, यह भारत की परमाणु हथियार बनाने की मौजूदा क्षमता से भी कम है, जबकि देश के पास 200 परमाणु हथियार बनाने के लिए पर्याप्त प्लूटोनियम है. युद्धकालीन सिद्धांत के तहत परमाणु हथियार बढ़ाने के लिए भारत को और मिसाइलों का उत्पादन करने की भी ज़रूरत है. लेकिन हाल के समय में ऐसी कोई जानकारी सामने नहीं आई है, जिसमें देश के मिसाइल निर्माण में नाटकीय बढ़ोतरी होने की बात कही गई हो.

निवेश के अलावा भारत की छवि भी उसके लिए चुनौती बन सकती है. दुनिया में उसकी पहचान एक ज़िम्मेदार और विश्वसनीय शांतिप्रिय देश की रही है. लगभग सभी देशों की सरकारों और अंतरराष्ट्रीय संगठनों में यह बात स्वीकार की जाती है कि भारत से किसी देश को ख़तरा नहीं है. कई अंतरराष्ट्रीय शांति अभियानों में भारतीय सैनिक महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं. हथियारों में कमी करने से जुड़ी कई संधियों-समझौतों (जैसे मिसाइल टेक्नॉलजी कंट्रोल रेजीम और वासेनार अरेंजमेंट) का भारत हिस्सा है. लंबे समय से वह परमाणु हथियारों में निवेश करने से भी इनकार करता रहा है. एनएफ़यू के ज़रिये उसने अपनी यह छवि और मज़बूत की है. इसी भूमिका के बल पर वह परमाणु आपूर्तिकर्ता समूह यानी एनएसजी का सदस्य बनने का मज़बूत दावेदार है. जानकारों के मुताबिक़ अगर भारत अपनी एनएफ़यू नीति में बदलाव करता है तो उसका असर उसकी छवि के साथ इस तरह के प्रयासों पर पड़ सकता है.