निर्देशक : सुमन मुखोपाध्याय

लेखक : निमिषा मिश्रा

कलाकार : माही गिल, सयानी गुप्ता, रागिनी खन्ना, शिवानी रघुवंशी, इमाद शाह

रेटिंग : 2.5/5

जी-5 पर ऑनलाइन रिलीज हुई ‘पोशम पा’ बच्चों के एक खेल को अपना शीर्षक बनाती है. इस खेल के दौरान बोली जाने वाली कविता में चोरों के पकड़े जाने और जेल की सजा पाने का जिक्र आता है और यही वजह है कि दो सीरियल किलर बहनों की कहानी कहने के लिए यह टाइटल एकदम मुफीद साबित होता है.

दरअसल ‘पोशम पा’ की पटकथा महाराष्ट्र की दो सीरियल किलर बहनों रेणुका शिंदे और सीमा गावित की असली कहानी से प्रेरित हैं. इन दोनों बहनों ने अपनी मां अंजना गावित के साथ मिलकर 1990 से 1996 के बीच महाराष्ट्र के कई जिलों से बच्चों का अगवा करने, उनसे भीख मंगवाने और जब वे इनके लिए परेशानी बन गए तो उन्हें जान से मारने के अपराध को अंजाम दिया था. बताया जाता है कि मां-बेटियों की इस तिकड़ी ने करीब पचास से ज्यादा हत्याएं की थीं लेकिन इनमें से केवल पांच बच्चों की हत्या का अपराध ही सिद्ध हो सका था.

गिरफ्तारी के कुछ ही समय बाद सन 1997 अंजना गावित की मौत हो गई जबकि रेणुका शिंदे और सीमा गावित पर लंबा मुकदमा चला और उन्हें मौत की सजा सुनाई गई. इनके अपराध इतने संगीन थे कि 2014 में इनकी दया याचिका भी तत्कालीन राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने खारिज कर दी थी. इसके बाद से ये अपनी सजा का इंतजार कर रहीं हैं. इस मामले में खास यह है कि अगर आने वाले वक्त में यह फैसला बदला नहीं जाता तो रेणुका शिंदे और सीमा गावित आजाद भारत की पहली ऐसी महिलाएं होंगी जिन्हें फांसी की सजा दी जाएगी.

फिल्म पर आएं तो इसकी प्रमुख किरदार रेगा साठे और शिखा देशपांडे, दो ऐसी महिलाएं हैं जो जेल में अपनी मौत की सजा का इंतजार कर रही हैं. लेकिन इस पर उनका कहना है कि उनकी सजा को उम्रकैद में बदला जाना चाहिए क्योंकि उन्होंने जो भी किया वह बुरी परिस्थितियों के चलते और अपनी मां के बहकावे में आकर किया. फिल्म इन दोनों पर बन रही डॉक्युमेंट्री के बहाने फ्लैशबैक में ले जाकर इनकी कहानी बताने-समझाने की कोशिश करती है. ऐसा करते हुए वह इन हत्याओं की वजह बताने से ज्यादा दिलचस्पी, हत्या के तरीके बताने में लेती है. कहने का मतलब है कि फिल्म क्यों हुआ के बजाय कैसे हुआ तक ही खुद को सीमित रखती है.

इसके अलावा पटकथा की दूसरी बड़ी खामी यह है कि यह मीडिया रिपोर्ट्स और सुनी-सुनाई बातों को ही अपना आधार बनाती है. साथ ही, इन किरदारों के बारे में कोई निजी जानकारी भी खुद में शामिल नहीं करती. मसलन, रेणुका शिंदे, जो असल जिंदगी में शादीशुदा है और उसके चार बच्चे हैं, से प्रेरित किरदार रेगा को फिल्म केवल एक मानसिक रूप से असंतुलित महिला के रूप में पेश करती है. यहां पर अगर यह मान भी लिया जाए फिल्म में ऐसा रेगा की बुरी परवरिश का असर दिखाने के लिए किया गया है तो भी इसके जरिए वह इस किरदार की दूसरी जरूरी बात यानी उसके साथ हुए दुर्व्यवहार की वजह बताने से चूक जाती है.

फिल्म में अंजना गावित से प्रेरित किरदार प्राजक्ता देशपांडे को माही गिल ने निभाया है. ज्यादातर वक्त फ्लैशबैक में नज़र आने वाली माही ने एक सिरफिरी मां को बखूबी चेहरा दिया है. एक सनकी महिला के इस किरदार में माही के चेहरे को देखकर कोई भी सटीक अंदाजा नहीं लगाया जा सकता और यही ‘पोशम पा’ में उनके अभिनय की सबसे अच्छी बात है. रेणुका शिंदे पर आधारित रेगा साठे का किरदार सयानी गुप्ता ने निभाया है और वे इसमें इस कदर रच-बस गई हैं कि अगर पहले से ना पता हो कि वे कौन हैं तो यह जानने के लिए आपको गूगल की मदद लेनी पड़ती है. स्किट्जोफ्रीनिया की शिकार सयानी जब सिर के बाल उखाड़ती हुई दिखती हैं तो वीभत्स रस अपने चरम पर पहुंचता लगता है. इस कहानी का तीसरा मुख्य किरदार शिखा देशपांडे, सीमा गावित से प्रेरित है और इसे रागिनी खन्ना ने निभाया है. हालांकि अभिनय के आधार पर देखें तो वे इसकी सबसे जरूरी लेकिन कमजोर कड़ी हैं. इसके बाद भी ज्यादातर वक्त फ्लैट फेस रखने वाली रागिनी, दर्शकों को जरूरी चकमा देने में सफल कही जा सकती हैं.

बंगाली फिल्म निर्देशक सुमन मुखोपाध्याय के निर्देशन में बनी ‘पोशम पा’ की पटकथा नवोदित लेखिका निमिषा मिश्रा ने लिखी है. इस फिल्म के जरिए बॉलीवुड में डेब्यू कर रहे लेखक और निर्देशक की यह फिल्म अपने सीमित खांचे में ठीक-ठाक मनोरंजन करती है. साथ ही, माही गिल और सयानी गुप्ता की शानदार परफॉर्मेंस के चलते एक देखी जा सकने वाली फिल्म बन जाती है. फिर भी, इसके खत्म होते-होते रोमांच की कसर रह जाना आपको खटकता है और मुंह से यह जरूर निकलता है कि थोड़ा और होता तो मजा आ जाता!

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