महाराष्ट्र की राजनीति में फिलहाल जो दो ध्रुव हैं उनमें कांग्रेस और शरद पवार की राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी एक गठबंधन में हैं और दूसरी तरफ भारतीय जनता पार्टी और शिव सेना का गठबंधन है. दोनों गठबंधनों से कुछ छोटी पार्टियां भी जुड़ी रही हैं. बीते कुछ समय से महाराष्ट्र के इन दोनों प्रमुख गठबंधनों में सीनियर पार्टनर बनने को लेकर संघर्ष चल रहा है.

लंबे समय तक महाराष्ट्र की राजनीति में भाजपा की सीनियर पार्टनर रही शिव सेना 2014 से गठबंधन में जूनियर पार्टनर की हैसियत से काम कर रही है. लेकिन 2019 के महाराष्ट्र विधानसभा चुनावों में भाजपा से अच्छा प्रदर्शन करके मुख्यमंत्री की कुर्सी पर दावेदारी की बात अब वह सार्वजनिक तौर पर कर रही है. इसे गठबंधन में अपनी हैसियत बढ़ाने की शिव सेना की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है.

महाराष्ट्र की राजनीति को जो लोग करीब से देखते हैं, उनको लगता है कि यही खेल कांग्रेस और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के गठबंधन में भी चल रहा है. सोनिया गांधी के विदेशी मूल के मुद्दे पर शरद पवार ने कांग्रेस छोड़ने के बाद एनसीपी का गठन किया था. लेकिन अब तक के अपने सियासी सफर में एनसीपी हमेशा कांग्रेस के साथ ही रही है. महाराष्ट्र में दोनों पार्टियों ने मिलकर जितनी बार भी सरकार चलाई उसमें कांग्रेस का मुख्यमंत्री रहा. इस नाते महाराष्ट्र के इस गठबंधन में हमेशा से कांग्रेस ही सीनियर पार्टनर रही है. लेकिन इस बार एनसीपी की ओर से इस गठबंधन में सीनियर पार्टनर बनने की कोशिश हो रही है.

एनसीपी नेताओं से बातचीत करें तो पता चलता है कि पार्टी इस बार 2004 वाली गलती नहीं दोहराएगी. 2004 के विधानसभा चुनावों में एनसीपी को कांग्रेस से अधिक सीटें मिली थीं. इसके बावजूद मुख्यमंत्री कांग्रेस का बना था. इस बारे में एनसीपी के एक नेता कहते हैं, ‘2004 में हमारे पास अपना मुख्यमंत्री बनाने का अवसर था. लेकिन ये हो नहीं पाया था. उस वक्त शरद पवार केंद्र की मनमोहन सिंह सरकार के एक प्रमुख मंत्री थे और दोनों पार्टियों में यह सहमति बनी थी कि एनसीपी को जो नुकसान महाराष्ट्र में हो रहा है, उसकी भरपाई केंद्र में कर दी जाएगी. लेकिन इस बार अगर हमारी सीटें कांग्रेस से अधिक आती हैं तो निश्चित तौर पर महाराष्ट्र में हमारा मुख्यमंत्री होगा.’

पिछले कुछ समय में एनसीपी अध्यक्ष शरद पवार कुछ बातों को लेकर कांग्रेस की आलोचना कर चुके हैं. इस आधार पर माना जा रहा है कि अगले विधानसभा चुनावों को लेकर सीटों के बंटवारे के संदर्भ में वे कांग्रेस पर दबाव बनाना चाहते हैं. इस बारे में कांग्रेस के एक नेता कहते हैं, ‘हमें जो जानकारी मिल रही है, उसके मुताबिक विधानसभा चुनावों के लिए सीटों के बंटवारे के संदर्भ में शरद पवार कांग्रेस पर दो तरह का दबाव बनाने की कोशिश में हैं.’

वे आगे कहते हैं, ‘पहला दबाव तो सीटों की संख्या को लेकर है. लोकसभा चुनावों में एनसीपी कांग्रेस से कम सीटों पर चुनाव लड़ी थी. विधानसभा चुनावों में शरद पवार की कोशिश होगी कि सीटों का बंटवारा बराबर-बराबर हो और उनकी पार्टी अधिक सीटें जीत कर आए ताकि सरकार बनने की स्थिति में मुख्यमंत्री पद पर उनकी पार्टी की दावेदारी रहे. इससे ही दूसरा दबाव संबंधित है. सीटों के बंटवारे में पवार चाहेंगे कि उन्हें उनकी पसंद की सीटें मिलें ताकि उनके अधिक उम्मीदवार जीत सकें.’

सीटों के बंटवारे को लेकर पिछले दिनों शरद पवार ने कहा था कि महाराष्ट्र विधानसभा की 288 सीटों में से सीटों के बंटवारे को लेकर 240 सीटों पर सहमति बन गई है. उनका कहना था, ‘बाकी की सीटों पर अगले कुछ दिनों में निर्णय हो जाएगा. बची हुई सीटों के लिए हम स्वाभिमानी पक्ष जैसी विपक्षी पार्टियों से भी बात कर रहे हैं ताकि उन्हें इस गठबंधन में लाया जा सके.’

2014 का विधानसभा चुनाव कांग्रेस और एनसीपी अलग-अलग लड़े थे. उन चुनावों में भाजपा और शिव सेना भी अलग-अलग लड़े थे. भाजपा और शिव सेना में सरकार बनाने को लेकर सहमति बनने में देरी होने की वजह से कयास लगाए जा रहे थे कि एनसीपी भाजपा के साथ जा सकती है. लेकिन इस बार के चुनावों में एनसीपी के भाजपा के साथ जाने की संभावनाओं को खुद भाजपा के नेता खारिज कर रहे हैं.

महाराष्ट्र में भाजपा का काम देखने वाले एक नेता कहते हैं, ‘जिस तरह से पिछले कुछ दिनों में एनसीपी के कुछ बड़े नेता शरद पवार का साथ छोड़कर भाजपा में शामिल हुए हैं, उससे नहीं लगता कि निकट भविष्य में शरद पवार भाजपा से किसी गठबंधन के लिए तैयार होंगे. एनसीपी नेताओं के भाजपा में शामिल होने को लेकर शरद पवार अक्सर तीखी प्रतिक्रिया देते हैं और इसके लिए वे पार्टी छोड़ने वाले नेताओं की आलोचना के साथ-साथ भाजपा की भी आलोचना करते हैं. लेकिन इससे भी बड़ी बात यह है कि शिव सेना और भाजपा के संबंध सहज हैं और दोनों दल ये बात समझते हैं कि थोड़ी-बहुत तकरार के बावजूद महाराष्ट्र की राजनीति में दोनों एक-दूसरे के लिए जरूरी हैं. इसलिए भी एनसीपी के भाजपा के साथ आने की कोई संभावना नहीं बचती.’

राजनीतिक जानकारों का मानना है कि कांग्रेस अभी कई तरह के आंतरिक और बाहरी संकटों का सामना कर रही है और शरद पवार इस परिस्थिति का फायदा उठाने की कोशिश करेंगे. भले ही राहुल गांधी के इस्तीफे के बाद सोनिया गांधी अंतरिम अध्यक्ष बन गई हों लेकिन कांग्रेस में नेतृत्व को लेकर अब भी स्थिति स्पष्ट नहीं है. कई नेता पार्टी छोड़ रहे हैं. न तो चुनावों में कांग्रेस अच्छा प्रदर्शन कर पा रही है और न ही विपक्ष के तौर पर वह मजबूत स्थिति में है. ऐसे में माना जा रहा है कि उसके पास एनसीपी को शरद पवार की शर्तों पर भी अपने साथ बनाए रखने के अलावा कोई और विकल्प नहीं है.