छात्र नेता से लेकर सरकार के सबसे महत्वपूर्ण मंत्रालय संभालने तक अरुण जेटली का सियासी सफर लंबा और चमकदार रहा. प्रखर वक्ता के रूप में वे लंबे समय तक भाजपा की आवाज भी रहे और अपने व्यावहारिक कौशल के चलते कई बार पार्टी की सरकार के संकटमोचक भी. हर जटिल मसले पर सर्वसम्मति बनाने में महारत रखने वाले अरुण जेटली को कुछ लोग नरेंद्र मोदी का ‘ऑरिजनल चाणक्य’ भी मानते थे.

1952 में जन्मे अरुण जेटली छात्र दिनों में ही राजनीति से जुड़ गए थे. वे दिल्ली विश्वविद्यालय के छात्र संघ के अध्यक्ष रहे. उन दिनों वे भाजपा की छात्र इकाई अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद से जुड़े हुए थे. 1973 में उन्होंने दिल्ली के प्रतिष्ठित श्रीराम कॉलेज ऑफ कॉमर्स से लॉ की डिग्री ली.

अरुण जेटली की राजनीति ने आपातकाल के दौरान छलांग लगाई. उस दौर में उन्हें पहले अंबाला और फिर दिल्ली की तिहाड़ जेल में रखा गया था. तिहाड़ में अरुण जेटली उसी सेल में थे जिसमें अटल बिहारी वाजपेयी और लाल कृष्ण आडवाणी के अलावा 11 और राजनीतिक कैदी रह रहे थे. जानकार मानते हैं कि इसका उन्हें बाद में बहुत फायदा हुआ. 1977 में जब जनता पार्टी बनी तो अरुण जेटली को उसकी राष्ट्रीय कार्य समिति में रखा गया. बताया जाता है कि अटल बिहारी वाजपेयी उन्हें 1977 का लोकसभा चुनाव लड़ाना चाहते थे. लेकिन उनकी उम्र चुनाव लड़ने की न्यूनतम आयु सीमा से एक साल कम थी इसलिए ऐसा नहीं हो सका.

आपातकाल हटा तो अरुण जेटली ने वकालत की प्रैक्टिस शुरू कर दी और दिल्ली हाई कोर्ट से होते हुए सुप्रीम कोर्ट पहुंच गए. 1980 में उन्होंने भारतीय जनता पार्टी की सदस्यता ले ली. 1989 में भाजपा समर्थित वीपी सिंह सरकार ने उन्हें भारत का एडिशनल सॉलिसिटर जनरल बनाया. कम ही लोग जानते होंगे कि बोफोर्स से जुड़ा मामला उनके ही सुपुर्द था. इस मामले में उन्होंने ईडी और सीबीआई अधिकारियों के साथ कई बार स्विट्ज़रलैंड और स्वीडन के चक्कर भी लगाए थे.

1991 में अरुण जेटली भाजपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सदस्य बन गए. सरकार में उनका आना 1999 में हुआ जब अटल बिहारी वाजपेयी ने उन्हें सूचना और प्रसारण (राज्य) मंत्री बनाया. बाद में अरुण जेटली ने विनिवेश और वाणिज्य मंत्रालय भी संभाले. उसी साल जब चुनावों के बाद एक बार फिर वाजपेयी सरकार बनी तो अरुण जेटली ने सुषमा स्वराज और प्रमोद महाजन जैसे दिग्गजों के साथ भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता की जिम्मेदारी संभाली. 2003 में वे वापस सरकार में आ गए और कानून मंत्री बनाए गए.

वकील के रूप में भी अरुण जेटली ने खूब नाम कमाया. अपने जमाने में वे देश के चोटी के वकीलों में गिने जाते थे. पेप्सिको और कोका कोला जैसे कई नाम उनके मुवक्किलों की सूची में थे. बाबरी मस्जिद विध्वंस मामले में वे लालकृष्ण आडवाणी के वकील रहे. आडवाणी के लिए अरुण जेटली ने मशहूर जैन हवाला केस भी लड़ा और उन्हें बरी करवाया. 2009 में उन्होंने वकालत को अलविदा कह दिया था.

अरुण जेटली को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का विश्वस्त कहा जाता था. दोनों का साथ बहुत पुराना था. 1995 में गुजरात में जब भाजपा सत्ता में आई तो पार्टी की अंदरूनी गुटबाजी के चलते नरेंद्र मोदी को दिल्ली भेज दिया गया. बताया जाता है कि उस दौर में अक्सर नरेंद्र मोदी, अरुण जेटली के घर में देखे जाते थे. 90 के दशक के आखिर में नरेंद्र मोदी दिल्ली में नौ अशोक रोड पर स्थित अरुण जेटली के आधिकारिक बंगले के एक कमरे में रहते थे. उस वक्त अरुण जेटली अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार में मंत्री थे.

2002 दंगों के बाद जब गुजरात के मुख्यमंत्री के तौर पर नरेंद्र मोदी पर संकट के बादल मंडरा रहे थे तो उनका साथ देने वालों में अरुण जेटली भी थे. यही नहीं, 2014 में नरेंद्र मोदी को भाजपा के प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाए जाने की औपचारिक घोषणा से पहले अरुण जेटली ने राजनाथ सिंह, शिवराज सिंह चौहान और नितिन गडकरी को एक साथ लाने के लिए पर्दे के पीछे बहुत चौकस रह कर काम किया.

नरेंद्र मोदी के गुजरात से ही अरुण जेटली पहली बार राज्यसभा आए थे. यह साल 2000 की बात है. यह वह दौर था जब टीवी न्यूज चैनल राजनीति का स्वरूप बदल रहे थे. हिंदी और अंग्रेजी पर समान अधिकार रखने वाले अरुण जेटली के लिए यह वक्त जैसे वरदान बनकर आया. जैसे-जैसे टीवी न्यूज का दायरा बढ़ा, भारतीय राजनीति में अरुण जेटली के कद ने भी छलांग लगाई.

हालांकि बहुत से लोग मानते हैं कि उनको वह न मिल सका जिसके वे असल में हकदार थे. एक दौर में अरुण जेटली को भावी प्रधानमंत्री के रूप में देखा जाता था. 2004 में मनमोहन सिंह की सरकार आने के बाद अरुण जेटली को राज्य सभा में नेता प्रतिपक्ष बनाया गया. लेकिन तगड़े राजनीतिक वजन के बावजूद माना जाता है कि दो सच्चाइयां उनके रास्ते की बाधा बन गईं. एक तो अरुण जेटली का कोई जनाधार नहीं था और दूसरी उनकी छवि ‘इलीट’ की थी. कई जानकारों के मुताबिक इसका उन्हें सियासी नुकसान यह हुआ कि वे कभी भाजपा के अध्यक्ष नहीं बन पाए. इन लोगों के मुताबिक अरुण जेटली की आधुनिक और संयत छवि पार्टी के परंपरागत खांचे में फिट नहीं होती थी. हालांकि वरिष्ठ पत्रकार स्वपन दास गुप्ता जैसे लोगों का एक दूसरा वर्ग भी है जो मानता है कि अरुण जेटली ने ही ‘इमेज’ की समस्या से जूझ रही भाजपा को देश में तेजी से उभरते हुए मध्य वर्ग में स्वीकार्यता दिलवाई.

निचले सदन के रास्ते वे संसद कभी नहीं पहुंच सके. 2014 में उन्होंने अमृतसर से लोकसभा चुनाव लड़ा था. लेकिन वे हार गए. हालांकि इससे उनकी अहमियत में कोई कमी नहीं आई. वे राज्य सभा के रास्ते एक बार फिर से संसद और सरकार का हिस्सा बन गया. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी उन्हें कितना महत्वपूर्ण समझते थे, यह इस बात से भी समझा जा सकता है कि एक समय वे वित्त के साथ रक्षा मंत्रालय भी संभाल रहे थे. यही नहीं, 2017 में गुजरात विधानसभा चुनावों के प्रभारी की जिम्मेदारी भी उन्हें ही मिली थी. उनके वित्त मंत्री रहते ही नरेंद्र मोदी ने नोटबंदी और जीएसटी जैसे अहम फैसले लिए थे.

अपने बहुआयामी व्यक्तित्व, अनुभव और कुशाग्रता के चलते मोदी सरकार के पहले कार्यकाल में अरुण जेटली लगभग हर जगह छाए रहे. सरकार की उपलब्धियां गिनाने का मामला हो या सरकार के विवादित फैसलों के बचाव का या फिर विपक्ष पर आक्रामक हमला बोलने की बात हो अरुण जेटली की भूमिका हर मामले में महत्वपूर्ण थी. अगर पदानुक्रम के हिसाब से देखा जाए तो वे पहली मोदी सरकार में बेशक नंबर दो पर थे. कई नियुक्तियां उनके कहने पर हुईं. पार्टी के सभी प्रवक्ता सलाह के लिए उनके पास जाते थे. यूं ही नहीं, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उन्हें अपना अनमोल हीरा कहा था.