भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता अरुण जेटली का निधन हो गया है. 66 साल के जेटली पिछले कुछ महीनों से बीमार चल रहे थे. उन्हें कुछ दिन पहले नई दिल्ली के अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान में गंभीर हालत में भर्ती कराया गया था. आज भाजपा जिस स्थिति में है, उसमें पार्टी को लाने में दूसरी पीढ़ी के जिन नेताओं का अहम योगदान है, जेटली उनमें प्रमुख थे. भाजपा में कई स्तरों पर उन्होंने लंबे समय तक काम किया. आज भले ही पार्टी अपने इतिहास में सबसे मजबूत स्थिति में हो लेकिन यह तय है कि एक संकटमोचक के तौर पर उसे अरुण जेटली की कमी कई मोर्चों पर महसूस होने वाली है. जानकारों का मानना है कि जब-जब इन मोर्चों में से किसी पर भी पार्टी को संकट का सामना करना पड़ेगा तब-तब उसे सबसे पहले अरुण जेटली ही याद आएंगे.

अटल बिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी की भाजपा में कई वरिष्ठ और अनुभवी नेता थे. वाजपेयी सरकार का वक्त याद करें तो उस दौरान अरुण जेटली की गिनती पार्टी के वरिष्ठ नेताओं और मंत्रियों में नहीं होती थी. लेकिन नरेंद्र मोदी और अमित शाह की भाजपा में जेटली सबसे अनुभवी और वरिष्ठ नेताओं में से एक थे. नरेंद्र मोदी से उनका संबंध भी काफी पुराना रहा है. इसके बारे में पार्टी के ही एक नेता का कुछ समय पहले कहना था कि जब पार्टी में प्रमोद महाजन का बोलबाला था, तब उनके साथ वर्चस्व के संघर्ष में नरेंद्र मोदी, अरुण जेटली और वैंकैया नायडू एक-दूसरे के साथ रहा करते थे. इस नाते कहा जा सकता है कि पार्टी के एक वरिष्ठ नेता के तौर पर अरुण जेटली प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विश्वस्त लोगों में थे. जबकि यही बात भाजपा के दूसरे वरिष्ठ नेताओं के बारे में नहीं कही जा सकती है. इस नाते जब भी नरेंद्र मोदी को एक विश्वस्त अनुभवी नेता की सलाह की जरूरत पड़ेगी, तब उन्हें अरुण जेटली की कमी महसूस हो सकती है.

नरेंद्र मोदी और अरुण जेटली के आपसी संबंधों और कुछ अहम मसलों पर मोदी की उन पर निर्भरता की एक झलक प्रधानमंत्री के श्रद्धांजलि संदेश से भी मिलती है. अरुण जेटली को श्रद्धांजलि देते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कहते हैं, ‘अरुण जेटली जी असाधारण राजनीतिज्ञ, बुद्धिजीवी और कानून के जानकार थे. वह स्पष्टवादी नेता थे जिन्होंने भारत को मजबूत बनाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया. भाजपा और अरुण जेटली जी का अटूट बंधन था. वह हमारी पार्टी के चहेते थे, जो पार्टी के कार्यक्रमों और विचारधारा की समाज में विस्तृत पहुंच बना सकते थे. अरुण जेटली के निधन से मैंने एक बहुमूल्य मित्र खो दिया है. मुझे उन्हें कई दशकों से जानने का गौरव प्राप्त था. मुद्दों पर उनकी अंतरदृष्टि और उनकी बारीक समझ की तुलना नहीं की जा सकती. उन्होंने सम्मानित जीवन जिया, वे हमारे साथ अनेक अच्छी स्मृतियां छोड़ गए हैं. उनकी कमी हमें हमेशा खलेगी.’

नरेंद्र मोदी के पहले कार्यकाल में कैबिनेट में अरुण जेटली के होने से अनुभवी और नए चेहरों में एक संतुलन दिखता था. लेकिन इस बार के मोदी मंत्रिमंडल में जेटली का न होना उसमें अनुभव की कमी को साफ दिखाता है. लेकिन फिर भी वे सरकार से बाहर होकर भी प्रधानमंत्री के लिए काफी उपयोगी साबित हो सकते थे. लेकिन उनके जाने के बाद अब जब भी सरकार के सामने कोई बड़ा संकट होगा तो वह राजनीतिक नेतृत्व से अधिक अधिकारियों पर निर्भर दिख सकती है.

पार्टी के आंतरिक मामलों में भी अरुण जेटली के अनुभव और वरिष्ठता की कमी भाजपा को महसूस हो सकती है. भाजपा के अंदर जेटली को पसंद करने वाले और उनसे नफरत करने वाले, दोनों की संख्या ठीक-ठाक रही है. लेकिन पार्टी में मोदी और शाह के उदय से पहले भी जेटली कई बार उसके विभिन्न धड़ों के बीच पुल का काम करते रहे हैं. चूंकि अभी की भाजपा में कोई खेमेबंदी नहीं दिखती है इसलिए पार्टी के आंतरिक मामलों से अधिक दूसरे दलों से भाजपा के संबंधों में जेटली की कमी पार्टी सबसे अधिक महसूस कर सकती है.

इस मोर्चे पर अरुण जेटली दो तरह से उपयोगी रहे हैं. पहला यह कि एनडीए के विभिन्न घटकों से भाजपा के संबंधों को सहज बनाने के लिए उनका इन सभी से लगातार संवाद बना रहता था. चाहे जनता दल यूनाइटेड के नीतीश कुमार हों या लोक जनशक्ति पार्टी के रामविलास पासवान या फिर पहले एनडीए में रहे बीजू जनता दल के नवीन पटनायक, इन सभी नेताओं से अरुण जेटली के निजी स्तर पर संबंध थे. यही वजह थी कि अगर किसी घटक दल से भाजपा के संबंध खराब हो रहे हों या कोई ऐसी संभावना बन रही हो तो जेटली उस घड़ी में संकटमोचक के तौर पर काम किया करते थे.

दूसरे दलों के साथ समयोग के मामले में अरुण जेटली इसलिए भी उपयोगी थे कि अक्सर विपक्षी दलों के साथ संवाद का काम भी अक्सर वे ही संभाला करते थे. मसलन कई बार संसद में महत्वपूर्ण कानूनों को पारित कराने के लिए सरकार को विपक्षी दलों के साथ की जरूरत पड़ती है. वहीं कुछ जरूरी राजनीतिक मुद्दों पर भी कई बार उसे दूसरे दलों को अपने साथ लेना होता है. ऐसे मौकों पर जेटली भाजपा के लिए बेहद उपयोगी साबित होते थे. भाजपा के अलावा दूसरे दलों के नेता जिन शब्दों में उन्हें अपनी श्रद्धांजलि अर्पित कर रहे हैं, उससे भी संकेत मिलता है कि इन सभी से उनके कैसे संबंध थे.

नरेंद्र मोदी और ​अमित शाह की राजनीतिक ​छवि कट्टर हिंदुत्व वाली रही है. लेकिन पिछली मोदी सरकार और भाजपा में अरुण जेटली की गिनती एक उदार चेहरे के तौर पर होती थी. इसी वजह से वे न सिर्फ भाजपा और एनडीए के बाहर दूसरे दलों के नेताओं से संवाद रखने में सक्षम रहते थे बल्कि उदारवादी सोच रखने वाले बौद्धिक वर्ग से भी उनका संवाद बना रहता था. कई बार सरकार को इस वर्ग से भी परोक्ष समर्थन की जरूरत होती है. आगे ऐसी किसी जरूरत की स्थिति में भी भाजपा को जेटली की कमी महसूस हो सकती है.

भाजपा सत्ता में रही हो या विपक्ष में, पार्टी के कानूनी मसलों को निपटाने में जेटली बेहद अहम भूमिका​ निभाते रहे हैं. जब नरेंद्र मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री थे और ऐसा लग रहा था कि वे कई मुकदमों में फंस जाएंगे तो उस वक्त जेटली ने ही उनकी कानूनी चुनौतियों को दूर करने में अहम भूमिका निभाई थी. यही काम उन्होंने अमित शाह के लिए भी किया था. आने वाले समय में इस मोर्चे पर भी जेटली, मोदी सरकार और भाजपा को बहुत याद आ सकते हैं.

आज यह माना जाता है कि मुख्यधारा की मीडिया पूरी तरह से भाजपा के अनुकूल है. लेकिन कई लोगों का मानना है कि अभी भाजपा और मीडिया के बीच की मधुरता संसाधनों पर अधिक आधारित हैं. जबकि जेटली के मीडिया से संबंध तब भी अच्छे थे जब भाजपा सत्ता से बाहर थी. उनका मीडिया से अच्छा रिश्ता संसाधनों से अधिक संबंधों पर आधारित था. ऐसे में जरूरत पड़ने पर वे इस मामले में भी अपनी पार्टी और सरकार के लिए किसी संकटमोचक की भूमिका निभाने में सक्षम थे.