अरुण जेटली नहीं रहे. उनके निधन पर आम लोग जहां श्रद्धांजलि दे रहे हैं, वहीं राजनीतिक विशेषज्ञ उनके सार्वजनिक जीवन का मूल्यांकन कर रहे हैं. कोई बतौर नेता नरेंद्र मोदी के मौजूदा मुक़ाम तक पहुंचने के पीछे अरुण जेटली की भूमिका का ज़िक्र कर रहा है तो किसी ने वकील के रूप में उनकी क़ानूनी क्षमताओं का उल्लेख किया है. वहीं, तमाम तरह की टिप्पणियों के बीच एक बात ऐसी है जो अरुण जेटली को लेकर विशेष रूप से ध्यान खींचती है. कई राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि बतौर राजनेता अरुण जेटली के जाने से भाजपा को बहुत बड़ा बौद्धिक नुक़सान हुआ है. इसे कुछ क़िस्सों से समझने की कोशिश करते हैं.

साल 2011 में संसद के इतिहास में पहला और अब तक का एकमात्र मौक़ा आया जब एक न्यायाधीश पर महाभियोग चलाया गया. यह महाभियोग कलकत्ता हाई कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश सौमित्र सेन के ख़िलाफ़ चलाया गया था. वरिष्ठ पत्रकार सौभद्र चटर्जी के मुताबिक उस मामले को लेकर हो रही बहस के बीच अरुण जेटली काफ़ी सारी नई और भारी किताबें लेकर राज्यसभा पहुंचे थे. बाद में उत्सुक पत्रकारों ने जेटली से पूछा तो उन्होंने बताया कि उन्होंने बहस की तैयारी के लिए 35,000 रुपये की नई किताबें ख़रीदी थीं.

यह बताता है कि अरुण जेटली संसदीय बहसों को कितनी गंभीरता से लेते थे. वे भाजपा के कई मौजूदा नेताओं की तरह बग़ैर सोचे-समझे और बिना तैयारी के नहीं बोलते थे. इसी कारण कई पत्रकारों का मानना है कि 2004 से 2014 तक यूपीए सरकार के कार्यकाल के दौरान संसद के निचले सदन (लोकसभा) में सुषमा स्वराज और ऊपरी सदन (राज्यसभा) में अरुण जेटली की जोड़ी ने भाजपा को मज़बूत विपक्षी दल बनाने में अहम भूमिका निभाई थी.

अरुण जेटली की इसी विशेषता के चलते जनाधार न होने के बावजूद उनका राजनीतिक जीवन इतना सफल रहा. जेटली को वैचारिक रूप से भाजपा से अलग पांत वाला राजनेता माना जाता था, फिर भी पार्टी में उन्हें तमाम बड़ी संगठनात्मक और सरकारी ज़िम्मेदारियां मिलती ही रहीं. उनकी खासियत थी कि बतौर विपक्षी नेता वे किसी मुद्दे पर सरकार को बुरी तरह घेर सकते थे और सत्ता में रहते हुए उसी पर अपनी पार्टी का बख़ूबी बचाव भी कर सकते थे. इसीलिए भाजपा सत्ता में हो या विपक्ष में, अरुण जेटली ने दोनों ही परिस्थितियों में अनेक बार अलग-अलग मुद्दों पर पार्टी के रुख़ का नेतृत्व किया.

अरुण जेटली अपनी बौद्धिक क्षमता का उपयोग संसद में अपनी बात सिद्ध करने के लिए किस तरह किया करते थे इसका एक उदाहरण कोयला घोटाले से जुड़ा हुआ है. यूपीए सरकार के समय सामने आए इस घोटाले को लेकर जब भाजपा ने सदन की कार्रवाई को बाधित किया तो कांग्रेस ने अरुण जेटली पर आरोप लगाया कि वे अपने सियासी पॉइंट को सही साबित करने के लिए संसद में हंगामा करने को वैध बना रहे हैं. इस पर उनका कहना था, ‘कभी-कभी ऐसे मौक़े आते हैं जब संसद के गतिरोध देश को बेहतर परिणाम देते हैं.’

वरिष्ठ पत्रकार सौभद्र चटर्जी बताते हैं कि इसके दो दिन बाद ही अरुण जेटली ने अपना बयान बदल दिया था. उन्होंने कहा था कि संसद में हंगामा करने से बचना चाहिए, यह वह हथियार है जिसका इस्तेमाल कभी-कभी ही होना चाहिए. जेटली ने भले ही अपने पहले रुख़ में बदलाव किया था. लेकिन, 2014 के आम चुनावों के बाद जब भाजपा केंद्र की सत्ता में आई तो कांग्रेस समेत अन्य विपक्षी दलों ने अपने हंगामों को जस्टिफ़ाई करने के लिए उनकी उसी दलील का इस्तेमाल किया.

एक बातचीत में हिंदुस्तान टाइम्स के राजनीतिक संपादक विनोद शर्मा कहते हैं, ‘जहां कोई बचाव नहीं कर सकता था वहां यह काम अरुण जेटली कर सकते थे.’ उनके मुताबिक जेटली की इस खूबी ने भाजपा को कई मौकों पर राहत दी. विनोद शर्मा मानते हैं कि पूर्व वित्त मंत्री उन चुनिंदा हस्तियों में शामिल थे जिनकी वाणी किसी भी विषय को समृद्ध करती थी.

वरिष्ठ पत्रकार जावेद अंसारी याद करते हैं कि कैसे एक बार अरुण जेटली ने पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का बिगड़ा मूड ठीक कर दिया था. वे कहते हैं, ‘एक अदालत ने मनमोहन सिंह के खिलाफ कड़ी टिप्पणी कर दी थी. पूर्व प्रधानमंत्री इससे काफी आहत हुए थे. उन दिनों संसद का सत्र चल रहा था. अरुण जेटली ने देखा कि मनमोहन सिंह उदास हैं. हर तरह की खबरों से वे वाकिफ रहते थे सो वे इसका कारण भी समझ गए. इसके बाद राज्य सभा में उन्होंने विशेष रूप से इसका जिक्र किया और कहा कि कोई कुछ भी कहे, भविष्य हमेशा मनमोहन सिंह को कृतज्ञता के साथ याद करेगा. उनकी इस बात का कांग्रेस के नेताओं ने भी समर्थन किया.’ जावेद अंसारी के मुताबिक यह बात उन्हें खुद मनमोहन सिंह ने बताई थी और कहा था कि अरुण जेटली की इस बात ने उन्हें गहरे छू लिया था.