जब उन्हें पहली बार देखा तो उनके चेहरे पर समय से पिटे होने की छायाएं थीं पर एक मोहक जीवट की कौंध भी. उन्हें 1970 के दशक के उत्तरार्द्ध में हमने खोजा था तब, जब वे टीकमगढ़ में पिपरमिंट और अचार की एक छोटी सी दुकान चला रही थीं. उनकी जिजीविषा कई दशकों तक ध्रुपद में चरितार्थ होने के बाद दैव दुर्योग से अब दुकान चलाकर प्रगट हो रही थी. वे ध्रुपद में वापस आ गयीं. यह उस अथक और कई बार अभिशप्त प्रयत्न का एक सुपरिणाम था जो मध्य प्रदेश की सांस्कृतिक पहचान गढ़ने की कोशिश में उसकी भूली-बिसरी उपलब्धियों की खोज में हम कर रहे थे. इस खोज ने रायगढ़ के कथक कलाकार और गुरु कार्तिक राम को खेती-किसानी में जीवन बिताने की विवशता से मुक्त कर कथक में वापस स्थापित किया. अब्दुल लतीफ़ खां को एक श्रेष्ठ सारंगीवादक के रूप में स्थापित कराया और लोकनाट्य पण्डवान की अप्रतिम कलाकार तीजन बाई को अन्तरराष्ट्रीय मंचों पर गर्व के साथ प्रस्तुत किया.

असगरी बाई सुपारी को सरौते से बहुत बारीक काटती थीं. यह छालिया ही वे दूसरों को उपहार में देती थीं. क़द में लहीम-शहीम और आवाज़ में ख़ासी मर्दाना असगरी बाई का ध्रुपद रवायत से अलग था क्योंकि उसमें उन्होंने बुन्देली लोकतत्व को जगह दी थी. शुद्धतावादी इसको पचा नहीं पाते थे. उन्हें मुंह चिढ़ाने के लिए पर अपनी ही रौ में वे बुन्देली का एक लोकछन्द लेद भी गाती थीं. इस छन्द में कभी मैथिलिशरण गुप्त ने कुछ कविताएं भी लिखी थीं और इलाहाबाद से प्रकाशित पुस्तक-पत्रिका ‘निकष’ में एक ऐसा छंद प्रकाशित भी हुआ था.

पिछली सदी के चालीस-पचास के दशक में ध्रुपद पूरी तरह से पुरुष प्रधान संगीत था. उसका अपना पौरुष भी इस प्रधानता की अभिव्यक्ति था. उस समय एक मुसलमान गायिका का ध्रुपद सीखना और फिर एक रियासत की राजगायिका बन जाना बहुत अनूठी बात थी. ध्रुपद के सख़्त परिसर में एक दबंग स्त्री-आवाज़ का प्रवेश- यह रोमांचक घटना थी, जिसे मध्य प्रदेश भूल गया था. पर असगरी बाई के पुनरागमन ने इस भूल को सिरे से दुरुस्त कर दिया. वे भोपाल के ध्रुपद समारोह में सबसे पहले आयीं. फिर भोपाल में ही आयोजित स्त्री केन्द्रित ‘उत्सव’ का उन्होंने उदघाटन किया। उन्हें म.प्र. शासन ने अपने ‘शिखर सम्मान’ और ‘तानसेन सम्मान’ से अलंकृत किया. उन्हें संगीत नाटक अकादेमी पुरस्कार और पद्मश्री से भी विभूषित किया गया. यह, एक तरह से, उनको भुला देने की भरपाई थी. कहते हैं कि अब टीकमगढ़ शहर की जिस सड़क पर वे दूकान चलाती थीं वह सड़क उनके नाम पर है.

उनकी जन्मशती तो पिछले वर्ष हो गयी. तब मध्यप्रदेश में किसी को यह याद भी नहीं आया. अब, देर आयद दुरुस्त आयद के न्याय से, म.प्र. शासन के संस्कृति संचालनालय के भोपाल में उनकी शती के उपलक्ष्य में दो दिनों का एक समारोह ध्रुपद और लेद पर केन्द्रित किया है. असगरी बाई ने शायद अपना जीवन और उसकी वेदना भी सरोते से सुपारी छीलने की तरह छीली. बची है स्मृति: पर ऐसी स्मृति जो आपका जीवट उद्दीप्त करती है.

धर्मों के बीच संवाद

भारतीय परिदृश्य पर धर्मों की स्थिति के बारे में कुछ बातें साफ़ नज़र आती हैं. सभी धर्मों में समावेशिता घट रही है और वे दिनोंदिन अधिक कट्टर, अधिक आक्रामक, अधिक दिखाऊ और ख़ासे बाज़ारू होते जा रहे हैं. उनमें दूसरे धर्मों के साथ संवाद लगभग नहीं के बराबर बचा है और सभी एक-दूसरे को शक की निगाह से देखते हैं. सभी धर्मों में अपने ही बुनियादी अध्यात्म की समझ कम हो रही है और सभी का आचरण और अधिक अनुष्ठानपरक होता जा रहा है. सभी धर्म अपनी स्वायत्तता और स्वतंत्रता बचाने के बजाय राजनीति और बाज़ार से गठजोड़ करने में संकोच नहीं कर रहे हैं. धर्म अब निजी आस्था का मामला कम, सार्वजनिक इज़हार का माध्यम अधिक हो रहे हैं. प्रायः सभी धार्मिक त्यौहार व्यापक हिंसा, दंगा-फ़साद की आशंका की छाया में सम्पन्न होते हैं. हर त्यौहार क़ानून और व्यवस्था के लिए एक चुनौती होता है.

धर्म खुलकर या गोपनीय ढंग से कुछ आत्मचिन्तन करते हैं इसका भी कोई आभास नहीं मिलता. बदली परिस्थिति में, नयी चुनौतियों के सन्दर्भ में उनकी भूमिका क्या हो सकती है, इस पर कोई आत्मालोचक विमर्श भी वे करते नहीं लगते. प्रायः हर धर्म ने, कम से कम भारत में, अपने को बन्द कर लिया है. उनमें खुलापन सिरे से कम होता गया है. उनमें से शायद ही किसी में, शायद सिख धर्म को छोड़कर, किसी तरह की लोकतांत्रिक व्यवस्था है. धर्मों के नाम पर किये जा रहे अपराध हमारे यहां पिछले कुछ वर्षों से तेज़ी से बढ़े-फैले हैं, उनकी खुलकर भर्त्सना और उन्हें धर्मविरोधी बताने की हिम्मत भी किसी धर्म ने नहीं दिखायी है. यह कहना अनुचित नहीं है कि धर्म अब राजनीति का अनुसरण कर रहे हैं. वे रणनीति बनाते हैं पर नीति की उनको, राजनीति की ही तरह, कोई परवाह नहीं रह गयी है. विडम्बना यह भी है कि धर्म अब मुक्ति, मोक्ष, निर्वाण आदि को अपना लक्ष्य नहीं मानते हैं. वे भी सत्ता और शक्ति के आकांक्षी हैं. हमारे मित्र रामचन्द्र गांधी ने, जो एक श्रेष्ठ दार्शनिक और बहुत निर्मल उज्ज्वल आध्यात्मिक चिन्तक थे, बरसों पहले सुझाव दिया था कि लोकसभा और राज्यसभा के साथ-साथ एक धर्मसभा भी होना चाहिये, तीसरा सदन. जिस तरह से धर्म अपनी शक्ति और सत्ता, सम्पत्ति और प्रभाव आदि अनियंत्रित ढंग से बढ़ा रहे हैं उससे उनका एक सार्वजनिक मंच पर ज़िम्मेदारी और जवाबदेही के साथ नियमित रूप से होना ज़रूरी हो गया है.

धर्मों के बीच संवाद की पहल होना चाहिये. उनके बीच विसंवादिता और परस्पर संदेह और नासमझी को दूर करना ज़रूरी है. भारत में समरसता, समता, न्याय आदि बिना धर्मों के इनके लिए संघर्ष में शामिल हुए संभव नहीं होंगे. अभी जो हालत है उसमें हमारे धर्म न्याय, समता, स्वतंत्रता के पक्ष में सक्रिय या मुखर क़तई नहीं रहे हैं. उन्हें इसके लिए राज़ी करने के लिए, धर्मों में कुछ बुनियादी संवैधानिक मूल्यों को लेकर सहमति विकसित करने के लिए ज़रूरी है कि वे एक-दूसरे के साथ लगातार बातचीत, विचार-विनिमय करें. प्रश्न यह है कि इस दिशा में क्या बुद्धिजीवी और ग़ैर-राजनैतिक सजग लोग कोई पहल कर सकते हैं?

छायावाद के सौ वर्ष

छायावाद को खड़ी बोली का स्वर्ण युग कहा जाता है. जब वह आया और तीनेक दशक चला, तब खड़ी बोली में कविता ने ऐसी परिपक्वता और ऊंचाई अर्जित कर ली यह आश्चर्य की बात है. अब जब छायावाद के सौ बरस हो गये हैं तब इस आश्चर्य को आभारपूर्वक याद करना चाहिये. इस नयी वृत्ति को आलोचकों का समर्थन काफ़ी बाद में मिला पर वह पूरे हिन्दी अंचल पर छा गयी थी. निश्चय ही इसका कारण छायावाद में मूर्धन्यों प्रसाद-निराला-पन्त-महादेवी की चौकड़ी का एकत्र होना था. उनमें बहुलता थी और कुछ समानताएं भी. उनका प्रकृतिप्रेम देशप्रेम का रूपक था. प्रसाद-निराला में महाकाव्यात्मक चेतना थी तो गहरी गीतिपरकता भी. हिंदी के इतिहास में पहली बार प्रसाद, निराला और पन्त जैसे कवियों ने अपनी कविता के शास्त्र को समझाने का यत्न किया, अपने नवाचार का बचाव किया.

छायावाद एक स्तर पर संस्कृत कविता का पुनराविष्कार हिंदी में कर पाया तो दूसरी ओर उसने भक्ति और रीति कविता का उत्तराधिकार भी नये रूप में प्रगट किया. छायावादी कविता को उचित ही शक्ति काव्य और सत्याग्रह युग की कविता कहा गया है. कविता की स्वायत्तता पर छायावादी आग्रह एक तरह से कविता की स्वतंत्रता का आग्रह था. यह दावा किया जा सकता है कि राजनैतिक स्वतंत्रता भले बाद में आयी, छायावाद ने कविता में स्वतंत्रता बहुत पहले हासिल कर ली थी. छायावाद में एक उज्ज्वल विकल्प-स्वप्न ने आकार पाया और यह भी देख सकते हैं कि साधारण ने काव्यप्रवेश किया. प्रसाद का खण्ड काव्य ‘आंसू’ और निराला की ‘कुकुरमुत्ता’ जैसी कविताएं इसकी गवाही देती हैं.

हिंदी कविता ने रहस्य और विस्मय के भाव धीरे-धीरे, आधुनिकता की झोंक में, ग़ायब होते गये हैं. ‘प्रथम किरण का आना रंगिणि, तुमने कैसे पहचाना?’ जैसी पंत की कविताएं, निराला के अनेक प्रार्थना गीत, महादेवी के प्रणय-गीत लोप के पहले का विस्मय-रहस्य का लोक प्रगट करते हैं. कवि के इस संसार में अन्ततः अकेले होने की नियति का स्वीकार भी हिंदी कविता में शायद छायावाद से ही शुरू हुआ. ‘मैं अकेला, आ रही मेरे दिवस की सान्ध्यबेला (निराला), ‘पन्थ होने दो अपरिचित, प्राण रहने दो अकेला’ (महादेवी) आदि कविताएं इसकी परिचायक हैं.

छायावाद की ऐसी छबि, दुर्भाग्य से, बन या बना दी गयी कि वह निरे भावोच्छ्वास का काव्य है. उसके सभी कवि सशक्त बौद्धिक थे. ‘कामायनी’, ‘राम की शक्तिपूजा’, ‘परिवर्तन’ जैसी कविताएं बिना बौद्धिक ऊर्जा के लिखी ही नहीं जा सकती थीं. छायावाद से ही सही मायनों में कविता में आधुनिकता की शुरूआत होती है. उसमें कविता में नागरिकता आती है पर लोकचेतना को अतिक्रमित कर नहीं, उसे भी जगह देकर. यह भी याद रखना चाहिये कि सभी छायावादी मूर्धन्य मसिजीवी थे. वे किसी नौकरी पर निर्भर नहीं रहे.