पाकिस्तान ने जम्मू-कश्मीर का विशेष दर्जा खत्म किए जाने के भारत के फैसले को अंतरराष्ट्रीय न्यायालय (आईसीजे) में उठाने का फैसला किया है. बीते बुधवार को वहां के विदेश मंत्री शाह महमूद कुरैशी ने यह जानकारी दी. उन्होंने बताया कि प्रधानमंत्री इमरान खान ने यह फैसला कानूनी विशेषज्ञों से बातचीत के बाद किया है.

पाकिस्तान ने इससे पहले इस मसले को कई अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उठाया था, लेकिन हर जगह से उसे निराशा ही हाथ लगी. संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में चीन की वजह से इस मामले पर बैठक तो हुई, लेकिन इसका उसे कोई फायदा नहीं मिला. सुरक्षा परिषद के सदस्यों ने इसे कितनी गंभीरता से लिया, इसका पता इससे चलता है कि उन्होंने इस मुद्दे पर औपचारिक बैठक या फिर अनौपचारिक बयान की पाकिस्तान की मांग को भी सिरे से खारिज कर दिया. बताया जाता है कि सुरक्षा परिषद के 15 सदस्यों में से 13 ने इसे दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय मसला माना और बातचीत के जरिए समाधान पर जोर दिया. मुस्लिम देशों के संगठन ‘इस्लामी सहयोग संगठन’ ने भी कश्मीरियों की सुरक्षा को लेकर चिंता जाहिर करते हुए भारत और पाकिस्तान को बातचीत करने की ही सलाह दी.

बहरहाल, अब पाकिस्तान ने हर जगह से मायूसी हाथ लगने के बाद अंतरराष्ट्रीय न्यायालय (आईसीजे) में जाने का फैसला किया है. लेकिन कानून के जानकारों का मानना है कि पाकिस्तान को आईसीजे में भी कोई सफलता हाथ नहीं लगेगी और उसे वहां से भी बैरंग लौटना होगा. ये लोग इसके पीछे कई वजह बताते हैं.

आईसीजे संयुक्त राष्ट्र की न्यायिक संस्था है जो दो या अधिक देशों के बीच कानूनी विवादों का निपटारा करती है. आईसीजे सबसे पहले यह देखता है कि जो मसला उसके पास आया है क्या वह उसके अधिकार क्षेत्र में है भी या नहीं. इसके लिए आईसीजे चार्टर के अनुच्छेद-36 में दो शर्तें दी गई हैं. अगर कोई मामला इनमें से किसी एक शर्त या दोनों को पूरा करता है तो वह आईसीजे के अधिकार क्षेत्र में आता है और फिर न्यायालय उसकी सुनवाई करता है.

आईसीजे चार्टर के अनुच्छेद-36 की पहली शर्त

अनुच्छेद-36 की पहली शर्त में कहा गया है कि यदि दोनों देश इस बात पर सहमत हैं कि यह मामला वाकई उन दोनों के बीच का विवाद है तो ऐसा मामला आईसीजे के अधिकार क्षेत्र में आता है और वह इस पर सुनवाई कर सकता है.

जानकारों के मुताबिक पाकिस्तान अपनी अर्जी में आईसीजे से कहेगा कि भारत द्वारा जम्मू-कश्मीर से धारा-370 को खत्म करना गलत है क्योंकि यह मसला कश्मीर से जुड़ा है जो उसके और भारत के बीच विवादित मसला है, इसलिए न्यायालय भारत के इस फैसले को रद्द करे. जानकार कहते हैं कि ऐसे में भारत इसे अपना आंतरिक मामला बताते हुए दलील देगा कि धारा-370 को लेकर उसने अपने संविधान में बदलाव किया है और इसका पड़ोसी मुल्क से कोई लेना-देना नहीं है. भारत यह तर्क भी देगा कि जम्मू-कश्मीर के विशेष दर्जे को रद्द करने से पाकिस्तान के साथ नियंत्रण रेखा (एलओसी) में कोई बदलाव नहीं हुआ है तो ऐसे में धारा-370 हटाना दोनों देशों के बीच का मसला कैसे हो गया.

कुछ जानकारों के मुताबिक भारत एक तर्क यह भी दे सकता है कि पाकिस्तान हमेशा से अपने कब्जे वाले कश्मीर-पीओके में अपने मनमुताबिक बदलाव करता आया है. इण्डिया फाउंडेशन के निदेशक आलोक बंसल एक न्यूज चैनल से बातचीत में कहते हैं, ‘पाकिस्तान ने पहले अपने हिस्से वाले कश्मीर को असंवैधानिक तरीके से दो हिस्सों में बांट दिया. उसने गिलगित-बाल्टिस्तान को छह दशक तक एक कॉलोनी की तरह बनाकर रखा. 2009 में उसने भले ही स्वायत्तता का दिखावा करते हुए इस क्षेत्र को मुख्यमंत्री और राज्यपाल दे दिया हो, लेकिन आज भी इस क्षेत्र को पाकिस्तान की केंद्रीय सरकार ही चलाती है. वहां के सारे निर्णय गिलगित-बाल्टिस्तान कॉउंसिल लेती है जिसका अध्यक्ष पाकिस्तान का प्रधानमंत्री है.’ बंसल आगे कहते हैं कि गिलगित-बाल्टिस्तान में ‘स्टेट सब्जेक्ट रूल’ 1974 से नहीं है और पाकिस्तान के अन्य प्रांतों के लोग वहां आकर बस रहे हैं. इसके अलावा पाकिस्तान ने कश्मीर मुद्दा न सुलझने के बावजूद गिलगित-बाल्टिस्तान में एक बड़ा भौगोलिक बदलाव किया और कश्मीर का करीब 15 फीसदी हिस्सा चीन को दे दिया.

जानकार कहते हैं कि भारत इन सभी दलीलों से यह साबित कर देगा कि जम्मू-कश्मीर से धारा-370 हटाना दोनों देशों के बीच का विवादित मामला नहीं है. ये लोग कहते हैं कि इस तरह इस मामले के आईसीजे के अधिकार क्षेत्र में आने की पहली शर्त पूरी नहीं होगी.

आईसीजे चार्टर के अनुच्छेद-36 की दूसरी शर्त

आईसीजे चार्टर की दूसरी शर्त की बात करें तो वह मसला अंतरराष्ट्रीय न्यायालय के अधिकार क्षेत्र में आता है जिसमें किसी एक देश ने द्विपक्षीय या अंतरराष्ट्रीय संधि का उल्लंघन किया हो. जानकारों की मानें तो इस शर्त के तहत पाकिस्तान यह कह सकता है कि भारत ने धारा-370 हटाकर 1948 के संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में लाये गए कश्मीर प्रस्ताव का उल्लंघन किया है.

जानकारों की मानें तो भारत के पास पाकिस्तान की इस दलील को गलत साबित करने के लिए कई तर्क हैं. पूर्व विदेश सचिव कंवल सिब्बल अपनी एक टिप्पणी में लिखते हैं कि अनुच्छेद-370 का प्रावधान 1954 में भारतीय संविधान में भारत ने अपने आप जोड़ा था, यह संयुक्त राष्ट्र के किसी भी प्रस्ताव में शामिल नहीं है. इसे भारतीय संविधान में संयुक्त राष्ट्र में आए प्रस्तावों के कई साल बाद जोड़ा गया था ऐसे में अब इसे एकतरफा हटाने से किसी अंतरराष्ट्रीय संधि और प्रस्ताव का उल्लंघन नहीं होता है.

कुछ जानकार एक और बात भी बताते हैं. उनके मुताबिक अगर पाकिस्तान संयुक्त राष्ट्र के 1948 के प्रस्ताव के उल्लंघन की बात करता है तो उसकी यह दलील बिलकुल ही नहीं सुनी जायेगी. ऐसा इसलिए कि संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में 1948 में कश्मीर पर लाये गए प्रस्ताव-47 को खुद पाकिस्तान ने ही महत्वहीन कर दिया था.

संयुक्त राष्ट्र के प्रस्ताव-47 में कश्मीर में जनमत संग्रह कराने की बात कही गयी है. लेकिन इसके लिए दो शर्तें रखी गई थीं. पहली कि पाकिस्तान को जम्मू-कश्मीर से अपने सभी सैनिकों और आतंकियों को हटाना होगा. दूसरी शर्त में कहा गया था कि पाकिस्तान द्वारा सैनिक और आतंकी हटाए जाने के बाद भारत अपने हिस्से वाले कश्मीर में केवल उतने ही सुरक्षा बल रखेगा जिससे क़ानून व्यवस्था की स्थिति बनी रहे. बताते हैं कि पाकिस्तान ने इस प्रस्ताव की पहली शर्त कभी पूरी ही नहीं की जिससे यह प्रस्ताव महत्वहीन हो गया.

जानकार कहते हैं कि ऐसे में इस मामले पर पाकिस्तान को अंतरराष्ट्रीय न्यायालय से भी वही जवाब मिलेगा जो यूएन से मिला है. यूएन महासचिव एंतोनियो गुतेरेस ने अपने बयान में कहा है, ‘पाकिस्तान कश्मीर के अंतिम और शांतिपूर्ण हल के लिए शिमला समझौते के तहत भारत से द्विपक्षीय बातचीत करे.’