अगस्त के आखिरी सोमवार को मशहूर फिल्म क्रिटिक और ट्रेड एनालिस्ट तरन आदर्श ने अपने ट्विटर अकाउंट पर साल 2019 में सबसे ज्यादा कमाई करने वाली बॉलीवुड फिल्मों की लिस्ट शेयर की थी. दस फिल्मों की इस सूची में अव्वल नंबर पर ‘कबीर सिंह’ और दसवें नंबर पर ‘मणिकर्णिका’ थी. कुछ लोगों को यह सूची फेमिनिज्म के बहुत से दावों को मुंह चिढ़ाती नजर आई होगी. लेकिन यहां पर ज्यादा ध्यान खींचने वाली बात यह रही कि इस लिस्ट में खान त्रयी में से केवल एक ही सितारे की फिल्म थी. सलमान खान की फिल्म ‘भारत’ 316 करोड़ रुपए की कमाई के साथ, इसमें तीसरे नंबर पर काबिज थी.

अब अगर अगस्त के पहले हफ्ते में आई शाहरुख खान की फिल्म ‘ज़ीरो’ से जुड़ी एक खबर पर भी गौर करें तो यह कहती है कि इस फिल्म ने टीवी पर व्यूअरशिप के सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए. दिसंबर-2018 में रिलीज हुई यह फिल्म जब जुलाई में टीवी पर दिखाई गई तो करीब एक करोड़ लोगों ने एक साथ इसे देखा. इससे पहले यह रिकॉर्ड सलमान खान की फिल्म ‘रेस-3’ के नाम दर्ज था जिसे लगभग 70 लाख लोगों ने एक साथ देखा था. यहां पर ध्यान देने वाली बात यह है कि (‘भारत’ की तरह ही) ‘रेस-3’ भी कमाई के मामले में तीन सौ करोड़ वाले क्लब में शामिल थी. लेकिन दो सौ करोड़ के बजट में बनी ‘ज़ीरो’ ने महज 90 करोड़ की कमाई की थी और वह अपनी लागत भी वसूल नहीं कर पाई थी. यहां पर यह बताना भी जरूरी है कि जीरो ने टीवी पर देखे जाने के मामले में बधाई हो, स्त्री, संजू, पद्मावत जैसी फिल्मों के रिकॉर्ड भी तोड़े हैं.

अब सवाल उठता है कि अगर ‘ज़ीरो’ को दर्शक टीवी पर बार-बार देखना पसंद कर रहे हैं तो फिर सिनेमा हॉल तक जाने में उन्हें आलस क्यों आ गया था? या जब सलमान खान की ‘रेस’ और ‘भारत’ जैसी अतिबोर फिल्में सिनेमाहॉल में इतनी बड़ी सफलता बटोरने में सफल हो जाती हैं तो शाहरुख खान की ‘ज़ीरो’ या ‘हैरी मेट सेजल’ जैसी औसत फिल्में ऐसा क्यों नहीं कर पा रही हैं? वह भी तब जब स्टार पॉवर और फैन फॉलोइंग के मामले में दोनों सितारे बराबरी पर ही ठहरते हैं. बीते कुछ वक्त से लगातार शाहरुख खान की कई ऐसी फिल्में, जिन्हें ठीक-ठाक बिजनेस और औसत मनोरंजन वाली लिस्ट में शामिल होना चाहिए था, बॉक्स ऑफिस पर औंधे मुंह गिरी हैं. लेकिन जब ये ऑनलाइन प्लेटफॉर्म्स या टीवी पर रिलीज हुईं तो खूब देखी और सराही भी गईं.

वजहों पर आएं तो इसकी पहली वजह शाहरुख खान के प्रति फिल्म समीक्षकों के बदले हुए रवैये को ठहराया जा सकता है. यह पिछले कुछ सालों में बहुत सख्त हुआ है. यह सच है कि शाहरुख कभी भी बेहतरीन अभिनेता नहीं माने गए. उनका चार्म, स्टाइल, स्टार पॉवर और कुछ मौकों पर अच्छी परफॉर्मेंस भी, वे वजहें थीं जिनके चलते उनकी शुरूआती पच्चीस फिल्मों में से दो तिहाई सुपरहिट रही थीं. इन्हीं की बदौलत शाहरुख को रोमांस का अघोषित बादशाह भी माना गया. लेकिन बीते कुछ सालों से अचानक समीक्षक उनसे उम्मीद करने लगे हैं कि वे परदे पर शाहरुख खान बनकर अदाएं दिखाने की बजाय केवल एक अभिनेता बनकर अभिनय करें. यह एक अजीब सा विरोधाभास है. उनकी जिस खासियत - रूमानी छवि - को दर्शक आज भी पसंद करते हैं, उसे ही क्रिटिक सिरे से खारिज करते नज़र आते हैं. और इसके चलते अक्सर उनके बाहें फैलाने वाले अंदाज का मजाक उड़ाते या उनके अभिनय पर दोहराव का आरोप लगाते दिखते हैं. यही कारण है कि शाहरुख खान की ‘जब हैरी मेट सेजल’, ‘डियर जिंदगी’ या ‘ज़ीरो’ सरीखी फिल्में भी क्रिटिक्स के निशाने पर आ जाती हैं.

हर अभिनेता की फिल्म के प्रति दर्शकों और समीक्षकों की पहले से तय एक राय होती है. मसलन, आमिर खान की फिल्मों में सोशल मैसेज होने या सलमान खान की फिल्मों में मसखरी के करीब लगने वाला मनोरंजन होने की उम्मीद कोई भी कर सकता है. इनमें से किसी की फिल्म में कुछ खामियां हों भी तो भी फिल्म को ठीक-ठाक की कैटेगरी में रखकर, उसे देखे जाने की सिफारिश का जा सकती है. लेकिन शाहरुख खान के मामले में अजीब यह है कि कुछ लोग अब उसने सबकुछ परफेक्ट होने की उम्मीद करने लगे हैं.

ज़ीरो की ही फिर से बात करें तो इसमें शाहरुख की परफॉर्मेंस काफी अच्छी थी. इसके एक ठीक-ठाक लवस्टोरी होने के बावजूद फिल्म की अपेक्षाकृत छोटी कुछ गलतियों को किसी ने स्वीकार नहीं किया. ज्यादातर समीक्षकों ने इसे एक बढ़िया विषय वाली अजीबो-गरीब फिल्म करार दिया. जबकि दर्शकों से बात करने पर पता चलता है कि यह एक अजीबो-गरीब ट्रीटमेंट वाली एक मनोरंजक फिल्म थी. इसका थोड़ा अंदाजा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि भारत जैसी अझेल फिल्म को ढाई स्टार देने वाले गंभीर समीक्षकों ने भी ज़ीरो को एक या डेढ़ सितारों पर सीमित कर दिया था. फिल्मों को मिलने वाले स्टार्स दर्शकों पर पूरी तरह से तो नहीं लेकिन कुछ हद तक तो फर्क डालते ही हैं.

शाहरुख खान की फिल्मों की उपेक्षा किए जाने का एक और वजनदार कारण उनका समय-समय पर अपने राजनीतिक विचार जाहिर करते रहना भी हो सकता है. हालांकि वे राजनीतिक पार्टियों के मंचों से ज़रूरत भर की दूरी बनाकर रखते हैं लेकिन कभी-कभार बराबरी, साम्प्रदायिक सौहार्द्र की बातें और घटनाओं या लोगों के सही-गलत होने पर टिप्पणी कर दिया करते हैं. देश के बदलते सामाजिक ताने-बाने के बीच ऐसी बातें किसी सार्वजनिक हस्ती के पक्ष या विपक्ष में माहौल बनाने में एक बड़ी भूमिका अदा करती हैं.

शाहरुख खान के मामले में तो यह भी पता चल चुका है कि ये केवल कोरी बाते नहीं हैं. वे अपने व्यवहार से इन्हें अमल में लाते भी दिखते हैं. उदाहरण के लिए कुछ साल पहले उन्होंने देश में असहिष्णुता बढ़ने की बात स्वीकार कर देश के एक विशेष तबके को नाराज़ कर दिया था. यह तबका अब तक उनसे नाराज है और बीच-बीच में शाहरुख के खिलाफ सोशल मीडिया कैंपन चलाता रहता है या फिर उनसे पाकिस्तान चले जाने की मांग करता है. इसके अलावा बीते साल गणेश पूजा करते हुए उन्होंने अपने बेटे की तस्वीर पोस्ट कर एक-दूसरे धार्मिक समुदाय की नाराजगी भी मोल ले ली. इस तरह की बातों का इस्तेमाल करके भी बीते कुछ सालों में उनकी फिल्मों के खिलाफ माहौल बनाए जाते देखा गया है. इस तरह के दुष्प्रचार से फैन भले ही बच जाएं लेकिन आम दर्शकों के प्रभावित होने की पूरी संभावना होती है.

एक बार फिर ‘ज़ीरो’ पर लौटें और सलमान खान की अतिसफल ‘भारत’ से इसकी तुलना करें तो पता चलता है कि ‘ज़ीरो’ जहां एकदम नए आइडिया के साथ बनाई गई एक ओरिजिनल मसाला फिल्म थी, वहीं ‘भारत’ एक कोरियन फिल्म ‘ओड टू माय फादर’ की सीन दर सीन की गई एक भौंड़ी नकल थी. ‘ज़ीरो’ जहां शाहरुख खान और अनुष्का शर्मा सहित तमाम कलाकारों की बेहतरीन परफॉर्मेंस के लिए याद की जा सकती है, वहीं ‘भारत’ सुनील ग्रोवर, बृजेंद्र काला और जैकी श्रॉफ जैसे बेहतरीन कलाकारों को भी ज़ाया कर देती है. सब मिलाकर देखें तो ‘भारत’ जहां केवल सलमान खान के परसोना का सोना बिखेरने वाली एक सतही फिल्म कही जा सकती है, वहीं ‘ज़ीरो’ एक ऐसी फिल्म है जो ज्यादातर वक्त आपका कई तरह से मनोरंजन करती है और साथ ही हाशिये पर रहने वाले उन लोगों की कहानी भी कहती है जो इससे पहले बहुत कम मौकों पर, पूरी तरजीह के साथ हिंदी फिल्मों का हिस्सा बने थे. और अगर बने भी इतनी गंभीर फिल्मों में नज़र आए जो मास तक पहुंच ही नहीं पाईं.

अब अगर इसके इसके अजीबो-गरीब और अविश्वसनीय अंत की बात करें तो उसके लिए पर्याप्त कारण फिल्म में दिए गए हैं. यहां पर इस खामी को स्वीकार किया जा सकता है कि इसी के चलते फिल्म कुछ मौकों पर जबरन खिंचती हुई लगती है. लेकिन अगर फिल्म से वास्तविक या सटीक होने की उम्मीद छोड़ दी जाए तो इसे देखना उतना बुरा अनुभव भी नहीं है. जहां तक ऐसा कर पाने का सवाल है तो लगभग हर बॉलीवुड फिल्म के साथ हमें ऐसा करना ही पड़ता है. क्या सलमान खान या अक्षय कुमार की फिल्मों को दर्शक किसी और तरीके से गले उतार सकते हैं? अगर इसका जवाब न में है तो फिर शाहरुख खान की फिल्म को क्यों नहीं? बेशक, यह कहना थोड़ा कुतर्कपूर्ण है लेकिन इतने ही अतार्किक तरीके से शाहरुख खान की फिल्मों के विरोध में बने माहौल पर और क्या ही कहा जा सकता है?