भारत की बेरोज़गारी दर नौ प्रतिशत को पार कर गई है. मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक़ 25 अगस्त को ख़त्म हुए हफ़्ते में यह दर 9.07 प्रतिशत थी. अंग्रेज़ी अख़बार बिज़नेस स्टैंडर्ड में प्रकाशित एक रिपोर्ट की मानें तो पिछले तीन सालों में दर्ज की गई बेरोज़गारी की यह सबसे बड़ी दर है. कुछ महीनों पहले राष्ट्रीय सैंपल सर्वे कार्यालय (एनएसएसओ) के एक सर्वे के आधार पर प्रकाशित हुई इसी अख़बार की एक रिपोर्ट में बताया गया था कि 2017-18 में भारत की बेरोज़गारी दर 6.1 प्रतिशत पर पहुंच गई है जो पिछले 45 सालों में सबसे ज़्यादा है.

जनवरी में प्रकाशित हुई उस रिपोर्ट को तब केंद्र सरकार ने यह कहकर नकार दिया था कि यह फ़ाइनल रिपोर्ट नहीं है. लेकिन बीती 30 मई को दूसरी बार नरेंद्र मोदी सरकार की बनने के ठीक अगले दिन ही स्पष्ट हो गया कि एनएसएसओ का सर्वे और उसके आधार पर बिज़नेस स्टैंडर्ड की रिपोर्ट दोनों सही थे.

मोदी सरकार के आलोचकों का कहना है कि अब यह बिलकुल साफ़ हो गया है कि देश की अर्थव्यवस्था रोज़गार के ऐतिहासिक संकट से गुज़र रही है. इसका प्रमाण यह भी है कि आए दिन देश के किसी न किसी हिस्से में कारख़ाने या शोरूम बंद होने या किसी कंपनी में बड़ी संख्या में कर्मचारियों की छटनी की ख़बरें आती रहती हैं.

लेकिन एक तरफ़ सरकार इस संकट को सीधे स्वीकार करती नज़र नहीं आती, वहीं दूसरी तरफ़ रोज़गार सृजन के मुद्दे पर भाजपा नेता अभी भी जैसा मन भाए वैसा बोल देते हैं. उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का पिछले महीने दिया एक हालिया बयान इसकी मिसाल है. राज्य के एक विश्वविद्यालय में छात्रों से मुख़ातिब होते हुए योगी आदित्यनाथ ने तब उन्हें यह सलाह दी थी कि डिग्री लेने के बाद केवल नौकरी के पीछे नहीं भागना चाहिए, बल्कि समाज के विकास में सक्रिय भूमिका निभानी चाहिए. योगी ने छात्रों से उम्मीद जताई कि वे ‘’हर घर नल’ योजना को सफल बनाने में मदद करेंगे, प्रदूषण नियंत्रण पर काम करेंगे और ग़रीबों के लिए घर बनाने के लिए आगे आएंगे.’

बेरोज़गारी को लेकर ऐसी बेफ़िक्री क्यों?

लेबर ब्यूरो के आंकड़ों के मुताबिक़ 2013-14 में देश की बेरोज़गारी की दर 3.4 प्रतिशत थी. तब भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार रहे नरेंद्र मोदी ने एक चुनावी रैली में कहा कि सत्ता में आने पर उनकी सरकार हर साल एक करोड़ नौकरियां देगी. 2014 के लोकसभा चुनाव के बाद उनकी पार्टी केंद्र में आ गई, लेकिन नौकरियां कम होने का सिलसिला कम होने के बजाय हर साल बढ़ता गया. 2015-16 में देश की बेरोज़गारी दर बढ़ कर 3.7 प्रतिशत हो गई. 2016-17 में यह 3.9 प्रतिशत रही और 2017-18 में यह 6.1 प्रतिशत की दर पर पहुंच गई. यह नया आंकड़ा एनएसएसओ का था जिसे लेबर ब्यूरो की जगह लाया गया था. इस रिपोर्ट में ज़्यादा बड़ी चिंता की बात यह दिखी कि बेरोज़गारों में सबसे अधिक संख्या 15 से 29 साल की उम्र के युवाओं की है. शहरी भारत में इस आयु वर्ग के 18.7 प्रतिशत पुरुष और 27.2 प्रतिशत महिलाओं के पास नौकरी नहीं है. वहीं, ग्रामीण भारत में इसी आयु वर्ग के 17.4 और 13.6 प्रतिशत (क्रमशः) पुरुष और महिलाएं बेरोज़गार हैं.

आरबीआई समेत मोदी सरकार के अधिकारियों ने भी माना है कि देश में मंदी का दौर है. लेकिन सरकार कहती है कि भारतीय अर्थव्यवस्थता की स्थिति अभी भी चीन और अमेरिका से बेहतर है और भाजपा नेता कहते हैं कि युवा नौकरी के पीछे न भागें. ऐसे में कई लोगों का कहना है कि क्या सत्तारूढ़ दल को वाक़ई रोज़गार की चिंता है.

जानकार बताते हैं कि रोज़गार सृजन के मोर्चे पर विफल रहने के बाद भाजपा नेताओं का अजीबोग़रीब बयान देने का सिलसिला नोटबंदी के बाद शुरू हुआ. वे इसकी मुख्य वजह भाजपा की चुनावी जीत के सिलसिले का जारी रहना बताते हैं. माना जाता है कि मोदी सरकार के इस कथित ऐतिहासिक और साहसी क़दम से तमाम लोगों की नौकरियां ख़त्म हो गईं, लेकिन भाजपा को इसका चुनावी नुक़सान नहीं उठाना पड़ा. इस कारण बेरोज़गारी के मुद्दे पर भाजपा नेता अंदरूनी तौर पर चिंतित नहीं रहे और सवाल किए जाने पर घुमा-फिरा कर बयान देते रहे.

योगी आदित्यनाथ के बयान में भाजपा के इसी रवैये की झलक दिखती है. वे युवाओं से समाज सेवा की उम्मीद लगाते हैं, लेकिन उसके बदले बतौर सरकार उन्हें क्या देंगे, यह नहीं बताते. लेकिन ऐसा करने वाले वे अकेले नहीं हैं. पिछले तीन सालों पर ग़ौर करें तो पता चलता है कि रोज़गार को लेकर कई भाजपाई नेताओं ने ऐसे बयान दिए हैं.

‘नौकरियां कम होना अर्थव्यस्था के लिए अच्छा है’

साल 2017 में वर्ल्ड इकनॉमिक फ़ॉर्म जैसे अंतरराष्ट्रीय मंच पर केंद्रीय मंत्री पीयूष गोयल ने कहा था कि नौकरियां कम होना अर्थव्यवस्था के लिए अच्छा है. भारती एयरटेल के चेयरमैन सुनील मित्तल के बेरोज़गारी से जुड़े एक सवाल का जवाब देते हुए पीयूष गोयल ने कहा, ‘सुनील ने कंपनियों द्वारा नौकरियां कम करने की जो जानकारी दी वह एक बहुत अच्छा संकेत है. आज का सच यह है कि कल का युवा नौकरी ढूंढने वाला नहीं है. वह नौकरी देने वाला बनना चाहता है. देश में आज ऐसे कई और युवा देखने को मिल रहे हैं जो उद्यमी बनना चाह रहे हैं.’

पीयूष गोयल के इस बयान के समर्थन में कहा गया कि उन्होंने मुद्रा योजना के हवाले से यह बात कही थी. उस समय तक इस योजना के तहत आठ करोड़ से ज़्यादा लोगों को 3.42 लाख करोड़ रुपये तक के लोन दिए गए थे. वहीं, इसके विरोध में कहा गया कि यह कैसे पता चलेगा इन लोगों में वे लोग भी शामिल हैं जिन्होंने अपनी नौकरियां खो दीं. उदाहरण के लिए, 2016-17 के वित्तीय वर्ष के दौरान लार्सन एंड टुब्रो कंपनी ने अपने 14,000 कर्मचारियों को निकाल दिया था. वहीं, एचडीएफ़सी बैंक ने अपने कर्मचारियों की संख्या 90,421 से 84,325 कर दी थी. लोगों का कहना था कि क्या इन दोनों कंपनियों से निकाले गए सभी लोग मुद्रा योजना की मदद से उद्यमी बन गए?

‘नौकरी के पीछे मत भागो, पान की दुकान खोलो’

रोज़गार से जुड़े सवालों का सामना करने के लिए भाजपा के नेताओं ने मुद्रा योजना का कई बार इस्तेमाल किया है. इस सिलसिले में त्रिपुरा के मुख्यमंत्री बिप्लब देव ने भी एक बयान दिया था. इसमें उन्होंने युवाओं को नौकरियों के पीछे भागने के बजाय पान की दुकान खोलने की सलाह दी थी. पिछले साल अप्रैल में दिए उस बयान में बिप्लब देव ने कहा था, ‘पढ़े-लिखे नौजवानों ने सरकारी नौकरियों के लिए राजनेताओं के पीछे भागकर अपना अमूल्य समय ख़राब किया है. अगर वे नौकरी के लिए सरकारों के पीछे न भागते और पान की दुकान लगा लेते तो उनके बैंक खाते में अब तक पांच लाख रुपये जमा होते... नेताओं के पीछे-पीछे भागने से अच्छा है कि युवा प्रधानमंत्री की मुद्रा योजना के तहत बैंक से क़र्ज़ लें और पशु संसाधन क्षेत्र की विभिन्न परियोजनाओं को शुरू करके स्वरोज़गार का सृजन करें.’

‘पकौड़ा बेचना भी नौकरी माना जाए’

रोज़गार सृजन के मुद्दे पर अजीबोग़रीब बयान देने वाले भाजपा नेताओं में ख़ुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी शामिल हैं. पिछले साल की शुरुआत में एक निजी न्यूज़ चैनल को दिए इंटरव्यू में प्रधानमंत्री ने ऐसी बात कही जो बिप्लब देव के पान वाले बयान से काफ़ी मिलती-जुलती थी. फ़र्क़ बस यह था कि उसमें प्रधानमंत्री मोदी ने पान की जगह पकौड़े का ज़िक्र किया था. इंटरव्यू में बेरोज़गारी को लेकर किए गए सवाल पर प्रधानमंत्री का कहना था, ‘अगर कोई पकौड़ा बेचकर प्रतिदिन रुपये कमाता है तो उसे भी नौकरी के तौर पर माना जाना चाहिए... आपके चैनल के बाहर कोई व्यक्ति पकौड़ा बेच कर 200 रुपये कमा रहा है तो आप उसे रोज़गार मानेंगे कि नहीं?’

भाजपा के सबसे बड़े नेता के इस बयान ने पार्टी को उलझन में डाल दिया, क्योंकि वे यह तो कह नहीं सकते थे कि प्रधानमंत्री ने जो कहा वह सही नहीं है. लिहाज़ा बयान को सही साबित करने की कोशिश की गई जिसने और नए बयानों को जन्म दिया. कहा गया कि पकौड़े वाले बयान में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की युवाओं को स्वरोज़गार के ज़रिये आत्मनिर्भर बनाने की इच्छा दिखती है. वे युवाओं को नौकरियों के पीछे भागने वाला नहीं, बल्कि नौकरियां देने वाला बनाना चाहते हैं. भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने कहा कि प्रधानमंत्री ने यह संदेश दिया है कि भीख मांगने से अच्छा है आदमी पकौड़ा बेचे, पकौड़े बेचने वाले व्यक्ति की दूसरी पीढ़ी उद्योगपति बनेगी.

वहीं, गुजरात की पूर्व मुख्यमंत्री और भाजपा नेता आनंदीबेन पटेल ने कहा, ‘पकौड़ा बनाना भी एक कौशल है, जो एक समृद्ध व्यापार की नींव का पत्थर साबित हो सकता है. अगर आप अच्छे और स्वादिष्ट पकौड़े नहीं बनाएंगे तो आपको ग्राहक नहीं मिलेंगे... अगर कोई व्यक्ति दो साल पकौड़े बनाता है तो तीसरे वर्ष वह रेस्टोरेंट खोल सकता है और 4-5-6 वर्षों में होटल भी शुरू किया जा सकता है.’