जलवायु परिवर्तन पर संयुक्त राष्ट्र (यूएन) एक अहम बैठक करने जा रहा है. यह बैठक 23 सितंबर को न्यूयॉर्क स्थित संस्था के मुख्यालय में होगी. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी इसमें हिस्सा लेने जा रहे हैं.

संयुक्त राष्ट्र की ही एक संस्था है - इंटरगवर्नमेंटल पैनल ऑन क्लाइमेट चेंज या अंतरशासकीय जलवायु परिवर्तन परिषद यानी आईपीसीसी. नवंबर 1988 में वजूद में आई यह संस्था जलवायु परिवर्तन संबंधी वैज्ञानिक अध्ययनों के आधार पर दुनिया की सरकारों को संभावित ख़तरों के प्रति आगाह करती है और उनकी रोकथाम के उपाय भी सुझाती है. वैश्विक तापमान और जलवायु परिवर्तन के बारे में समय-समय पर प्रकाशित होने वाली उसकी रिपोर्टें स्थिति की गंभीरता से परिचित कराती हैं. 2002 से 2015 तक भारत के राजेंद्र पचौरी उसके अध्यक्ष रह चुके हैं. इस समय यह पद दक्षिण कोरिया के होसुंग ली के पास है.

स्विट्ज़रलैंड के जेनेवा शहर में स्थित ‘आइपीसीसी’ के मुख्यालय ने हाल ही में अपने वैज्ञानिकों की एक नई रिपोर्ट प्रकाशित की है. इसके अनुसार नए अध्ययनों का निचोड़ यही है कि पृथ्वी पर तापमान, उसके पूरे इतिहास की तुलना में, इस समय सबसे अधिक तेज़ गति से बढ़ रहा है. 1950 वाले दशक के बाद से भूमि और महासागरों के ऊपर का तापमान, हर दशक में, औसतन 0.2 डिग्री सेल्सियस की गति से बढ़ता गया है. कम से कम पिछले 30 लाख वर्षों में, और संभवतः पिछले छह करोड़ वर्षों में भी, पृथ्वी की ऊपरी सतह का तापमान इस गति से कभी नहीं बढ़ा!

तापमान बढ़ने की असाधारण तेज़ गति

उदाहरण के तौर पर क़रीब 20 हज़ार वर्ष पहले समाप्त हुए पिछले हिमयुग के समय का अधिकतम तापमान बाद के 10 हज़ार वर्षों में कुल मिलाकर केवल 5 डिग्री सेल्सियस बढ़ा. यानी, प्रति दस वर्ष केवल 0.005 डिग्री की गति से बढ़ा. दूसरे शब्दों में, इस समय की गति तब की अपेक्षा 40 गुनी तेज़ है.

‘आइपीसीसी’ के वैज्ञानिकों का कहना है कि पृथ्वी पर के पिछले छह करोड़ वर्षों के तापमानों के बारे में जुटाई गई जानकारियां काफ़ी हद तक विश्वसनीय हैं. उन्हें प्राचीन महासागरीय निक्षेपों (समुद्र के तल में जमा प्राचीन चट्टानों के अवशेष), जीवधारियों और विभिन्न तत्वों के आइसोटोपों (समस्थानिकों) के अध्ययन द्वारा जुटाया गया है. यह जानने के लिए कि लाखों-करोड़ों वर्ष पूर्व पृथ्वी के वायुमंडल की बनावट कैसी थी, बर्फीले अंटार्कटिका (दक्षिणी ध्रुव महाद्वीप और सागर) में भारी मशीनों से गहरी बोरिंगें की जाती रही हैं. इन बोरिगों से मिली बर्फ के अध्ययनों से पिछले आठ लाख वर्षों के वायुमंडलीय कार्बन-डाईऑक्साइड की सघनता के आंकड़े जुटाए गए हैं. ये बताते हैं कि जलवायु परिवर्तन में कार्बन-डाईऑक्साइड की बहुत बड़ी भूमिका होती है.

दोहन के बुरे नतीजे

कोई दस हज़ार वर्ष पूर्व मनुष्य ने जब खेती करना शुरू किया, तो मनुष्य भी वायुमंडल में कार्बन-डाईऑक्साइड की मात्रा बढ़ाने वाला एक प्रमुख कारक बनने लगा. ‘आइपीसीसी’ की रिपोर्ट का कहना है कि आज स्थिति यह है कि तापमानवर्धक 23 प्रतिशत गैसें खेती-किसानी और वनसंपदा की लूट जैसी भू-दोहन की गतिविधियों का परिणाम हैं. खेती यदि विवेकपूर्ण ढंग से की जाये, रासायनिक उर्वरकों से यथासंभव परहेज़ या उनका न्यूनतम उपयोग किया जाये और पेड़ों और जंगलों का काटा जाना रोका जाये, तो इस तरीके से भी तापमानवर्धक गैसों के उत्सर्जन में उल्लेखनीय कमी लायी जा सकती है.

पेरिस के 2015 वाले जलवायुरक्षा समझौते में लक्ष्य रखा गया था कि औसत वैश्विक तापमान जितना 20वीं सदी के आरंभ में था, 21वीं सदी का अंत आने तक उसमें 1.5 से अधिक की वृद्धि नहीं होनी चाहिये. ‘आइपीसीसी’ के वैज्ञानिकों की नयी रिपोर्ट कहती है कि औसत भूतलीय तापमान अभी ही 1.53 डिग्री और सागरतलीय तापमान 0.9 डिग्री बढ़ चुका है.

50 करोड़ लोगों का जीवन दांव पर

कहने की आवश्यकता नहीं कि यदि बड़े पैमाने पर अभी से कारगर क़दम नहीं उठाये गये तो तापमान बढ़ने की वर्तमान गति को देखते हुए पेरिस समझौते का लक्ष्य कागज़ी ही रह जायेगा. रिपोर्ट के अनुसार, उस स्थिति में दुनिया के 50 करोड़ लोगों का जीवन पानी के अभाव और रेगिस्तानों के विस्तार के कारण घोर संकट में पड़ जायेगा. मध्य यूरोप, भूमध्य सागरीय देशों, लैटिन अमेरिका में अमेज़न नदी के दक्षिणवर्ती भागों और दक्षिणवर्ती अफ्रीका तक में बार-बार सूखे पड़ेंगे और लू चलेगी. बढ़ती हुई जनसंख्या के लिए भोजन जुटाने के साथ-साथ यदि जलवायु परिर्तन से बचने के उपाय भी करने हैं तो विश्व समुदाय को अभी से तुरंत कारगर उपायों पर काम करना शुरू कर देना चाहिये.

मौसमी अति की घटनाएं बढ़ेंगी

रिपोर्ट तैयार करने वाले वैज्ञानिकों ने कारगर उपायों के तौर पर खेती आदि के लिए ज़मीन और वनों के अंधाधुंध शोषण का अंत करने का आग्रह किया है. उनका यह भी कहना है कि खाद्य पदार्थों की बर्बादी रुके और खेती-किसानी के कारण पैदा होने वाले कार्बन-डाईऑक्साइड के उत्सर्जन को सख्ती से घटाया जाए. उन्होंने आगाह किया है कि तापमान यदि बढ़ता ही रहा, तो सूखे और बाढ़, भीषण गर्मी और सर्दी, लू और तूफ़ान जैसी मौसमी अति की घटनाएं बढ़ेंगी और पैदावार तेज़ी से घटेगी. इसलिए खाद्यपदार्थों के उत्पादन और खाने-पीने के सारे तौर-तरीकों की गंभीरता से समीक्षा करने और उनमें क्रांतिकारी बदलाव लाने की ज़रूरत है.

‘आइपीसीसी’ के वैज्ञानिकों ने अनाजों, फल-फूल और सब्ज़ियों का उपयोग बढ़ाने का सुझाव देते हुए ज़ोर दिया है कि जलवायु परिवर्तन पर यदि लगाम लागानी है, तो मंसाहार से भी दूरी बनानी पड़ेगी. मांसाहार घटने से उन गैसों का बनना भी घटेगा, जो पशुपालन से पैदा होती हैं. वैज्ञानिक इसके पक्ष में नहीं हैं कि मांसाहारी खाद्यों पर टैक्स बढ़ा कर उनकी खपत खटायी जाये. उनका कहना है कि मांसाहारी खाने के उत्पादन और औद्योगिक प्रसंस्करण से लेकर घरों में उसके उपभोग तक की सारी कड़ी को लगातार घटाते जाने की जरूत है. मांसाहार को केवल पैसे वालों की पहुंच तक ही सीमित करना इसलिए भी उचित नहीं है. जलवायु परिवर्तन से सब लोग प्रभावित होते हैं, इसलिए उसकी रोकथाम के प्रयासों में भी सबको हिस्सेदार बनना चाहिये.

मांसाहार जलवायु संहारक है

‘आइपीसीसी’ की नयी रिपोर्ट में मांसाहार के लिए बड़े पैमाने पर पशुपालन और वनों के कटाव को आड़े हाथों लिया गया है. उन्हें जलवायु के लिए सबसे ख़तरनाक कारकों की श्रेणी में रखते हुए कहा गया है, ‘जलवायु त्रासदी के बाद सीधे भुखमरी ही आयेगी.’ हमें वनों और दलदलों की भी विशेष रूप से रक्षा करनी होगी, क्योंकि वे कार्बन-डाईऑक्साइड को बांधते हैं.

रिपोर्ट तैयार करने वाले वैज्ञानिकों ने पाया कि अकेले 2007 से 2016 के बीच मनुष्यों द्वारा पैदा की गई जितनी सारी कार्बन-डाईऑक्साइड, मीथेन और डाईनाइट्रस मोनॉक्साइड (लॉफ़िंग गैस N2O) वायुमंडल में पहुंची, उसकी क्रमशः13, 44 और 82 प्रतिशत मात्रा खेती-वानिकी जैसी भूमि के उपयोग से जुड़ी गतिविधियों की देन थी. जर्मनी के पोट्सडाम जलवायु शोध संस्थान ‘पीआईके’ के वैज्ञानिक अलेक्सांदर पौप का कहना है, ‘विश्वस्तर पर देखा जाये, तो क़रीब एक-चौथाई तापमानवर्धक गैसें भू-दोहन की इन्हीं गतिविधियों की उत्पत्ति हैं.’

कहने की आवश्यकता नहीं कि जिन मानवीय गतिविधियों में भू-दोहन सबसे अधिक होता है, उनमें खेती और वानिकी का स्थान सबसे ऊपर है. खेती के लिए नयी ज़मीन वनों को काट कर ही मिलती है. इससे जलवायु पर दोहरा बोझ पड़ता है. कार्बन-डाईऑक्साइड को बांधने वाले वन घटते जाते हैं. धान जैसी फ़सलों और पशुपालन के बढ़ने से तापमानवर्धक गैसों का उत्सर्जन बढ़ता जाता है.

धान की खेती मीथेन का सबसे बड़ा स्रोत

उदाहरण के लिए, मीथेन गैस कार्बन-डाईऑक्साइड से भी 25 गुना अधिक तापमानवर्धक है. जर्मनी में लाइपज़िग स्थित ‘हेल्महोल्त्स जलवायु शोध केंद्र’ के जीववैज्ञानिक योज़ेफ़ ज़ेटेले का कहना है, खेती-किसानी से दुनिया भर में जितनी मीथेन पैदा होती है, उसका 20 प्रतिशत हिस्सा धान के खेतों से आता है. अमेरिकी वैज्ञानिकों ने 2018 में पाया कि जलवायु परिवर्तन के मानवजनित जितने भी कारक है, उनमें धान की खेती का हिस्सा ढाई प्रतिशत है.

धान की खेती में एक तो पानी बहुत लगता है, और दूसरे पानी से भरे धान के खेतों और क्यारियों में ऐसे बैक्टीरिया आदि खूब पनपते हैं, जो पौधों की जड़ों आदि को सड़ा कर मीथेन गैस पैदा करते हैं. इसका अर्थ यही हुआ कि जलवायु को यदि और अधिक प्रतिकूल होने से बचाना है, तो मांसाहार से परहेज़ के साथ-साथ चावल की खपत और धान की खेती भी घटानी होगी.

खान-पान बदलना होगा

यदि हम चाहते हैं कि वैश्विक औसत तापामान इस सदी के अंत तक तीन से पांच डिग्री तक न बढ़े, दुनिया में अभी से प्रलय न मचे, तो हम यह नहीं कह सकते कि हम क्या खाते हैं और क्या नहीं, यह हमारी निजी स्वतंत्रता का प्रश्न है. जब संकट सबके सिर पर हो, तब निजी पसंद-नापसंद की स्वतंत्रता के लिए स्थान नहीं हो सकता.

स्थिति चिंताजनक अवश्य है, लेकिन विकल्पहीन नहीं. ‘आइपीसीसी’ की नयी रिपोर्ट में कहा गया है कि वैश्विक तापमान में वृद्धि को 1.5 डिग्री पर अब भी रोका जा सकता है. लेकिन, इसके लिए खेती-किसानी के तौर-तरीकों और खान-पान की आदतों में परिवर्तन के साथ-साथ तेज़ी से और बड़े पैमाने पर वृक्ष एवं वनरोपण अभियान चलाने होंगे. पेड़-पौधे ही हवा से कार्बन-डाईऑक्साइड सोख कर उसे अपने भीतर बांधते हैं. हवा में कार्बन-डाईऑक्साइड जितनी घटेगी, भूतल पर का तापमान बढ़ने की गति में उतनी ही कमी आयेगी.

वनसंहार चरम सीमा पर

विभिन्न अध्ययनों के आधार पर अनुमान लगाया गया है कि पृध्वी पर हर साल 15 अरब पेड़ घट रहे हैं. नये पेड़ केवल नौ अरब ही लग पा रहे हैं. वनों का घटना 2017 में अपनी चरम सीमा पर पहुंच गया था. उन्हें मुख्य रूप से सोयाबीन और तेल के लिए खजूर की खेती करने, लकड़ी पाने और वनसंपदा के दोहन के लिए काटा और जलाया जा रहा है.

जुलाई 2019 में विज्ञान पत्रिका ‘साइंस’ ने स्विट्ज़रलैंड के शोधकों का एक अध्ययन प्रकाशित किया. अध्ययनकर्ता इस निष्कर्ष पर पहुंचे थे कि वृक्ष और वनरोपण अभियानों द्वारा जलवायु परिवर्तन की जितने कारगार तरीके से रोकथाम की जा सकती है, उतनी और किसी तरीके से नहीं हो सकती. अकेले इसी तरीके से मानवजनित दो-तिहाई कार्बन-डाईऑक्साइड को हवा से ख़ीच कर पेड़ों के रूप में बांधा जा सकता है.

एक-तिहाई अधिक वनरोपण चाहिये

इन शोधकों ने लिखा कि शहरों या खेतिहर ज़मीन के लिए कोई बाधा बने बिना, हमारी पृथ्वी पर इस समय जितने वनप्रदेश हैं, उनकी अपेक्षा वह एक-तिहाई अधिक वनों को संभाल सकती है. यदि ऐसा किया जा सके, तो औसत वैश्विक तापमान में केवल 1.5 बढ़ोतरी होने देने का लक्ष्य पाया जा सकता है.

जर्मनी में म्युनिक विश्वविद्यालय की प्रोफ़ेसर यूलिया पोंगार्त्स स्विस शोधकों के इस निष्कर्ष को बहुत आशावादी मानती हैं. वे कहती हैं, ‘केवल पेड़ लगा कर हम जलवायु परिवर्तन को रोक नहीं पायेंगे. पेड़ों की भूमिका बहुत बड़ी ज़रूर होगी, किंतु हमें जीवाश्म ईंधनों ( प्रकृतिक गैस, तेल और कोयले) के उपयोग को भी बड़ी मात्रा में घटाना होगा.’ इसे वे भी स्वीकार करती हैं कि पेड़-पौधे कार्बन-डाईऑक्साइड को ही नहीं बांधते, उनकी पत्तियों से पसीजने वाले पानी के वाष्प बनने से हवा ठंडी भी होती है. भारत जैसे उष्णकटिबंधीय देशों में काट दिये गये वनों को यदि फिर से उनके पुराने स्वरूप में लाया जा सके, तो स्थानीय स्तर पर तापमान को कई डिग्री तक कम किया जा सकता है.

इथियोपिया का वनरोपण अभियान

अफ्रीकी देश इथियोपिया ने इसी जुलाई के अंत में दावा किया कि वहां पेड़ लगाने वाले स्वयंसेवियों ने, 12 घंटे के एक अभियान में पेड़ों के 35 करोड़ पौधे रोपे. यदि यह दावा सही है, तो इसे एक ऐसी बहुत बड़ी सफलता मानना होगा, जिससे भारत जैसे देश भी शिक्षा ले सकते हैं. भारत में भी वृक्ष या वनरोपण अभियानों के लिए केंद्र या राज्य सरकारों के मुंह ताकने के बदले स्वयंसेवी अभियान चलाने होंगे. एक बार पौधे लगाने से भी अधिक ज़रूरी है बार-बार उनकी देखभाल करना और पानी देना. जलवायु परिवर्तन की मार सब पर पड़ रही है, इसलिए वृक्ष और वनरोपण भी सबको मिल कर ही करना होगा.

सरकारें यह कर सकती हैं कि ब्रिटेन के वेल्स प्रदेश की तरह वे भी, मानवरहित ड्रोनों की सहायता से, उपयुक्त जगहों पर पेड़ों के अंकुरित बीजों की वर्षा करें. दक्षिणी वेल्स में नीची उड़ान करते ड्रोनों की सहायता से, पहले से अंकुरित और पोषक तत्वों वाले एक घोल के साथ एक कैप्सूल में बंद बीजों की वर्षा की जाती है. कैप्सूल कुछ ही दिनों में अपने आप विघटित हो जाता है. अंकुरित बीज जहां गिरते हैं, वहां अपने आप उगने लगते हैं.

ड्रोनों द्वारा वृक्षारोपण

कई देशों में यह प्रयोग कर रही ब्रिटिश कंपनी का कहना है कि एक साथ कई ड्रोनों के उपयोग से हर दिन एक लाख तक पेड़ों का रोपण किया जा सकता है. इस विधि से जंगलों में उन जगहों पर भी सरलता से नये पेड़ उगाये जा सकते हैं, जहां आग लग जाने या आंधी-तूफ़ान के कारण बहुत से पेड़ नष्ट हो गये हैं या जहां ढलान के कारण आसानी से पहुंचा नहीं जा सकता. इस बात का भी ध्यान रखा जाना चाहिये कि, दो-चार प्रकार के ही नहीं, कई प्रकार के पेड़ों वाले मिश्रित वन उगाये जायें, ताकि पेड़ों की किसी बीमारी या हानिकारक कीड़ों के कारण सारे पेड़ एक साथ नष्ट न हो जायें.

विश्व जलवायु परिषद का कहना है कि जलवायु परिवर्तन एक ऐसी विश्वव्यापी चुनौती है, जिससे हर एक को कई-कई प्रकार से और कई स्तरों पर लड़ना होगा.