पिछले दिनों कश्मीर से धारा-370 के प्रावधान हटाए जाने के बाद उपराष्ट्रपति श्री वेंकैया नायडू और बसपा प्रमुख सुश्री मायावती के बयानों को लेकर एक विवाद उठ खड़ा हुआ है. विवाद के मूल में सोशल मीडिया पर बहुप्रसारित डॉ भीमराव अंबेडकर का एक कथित बयान था, जिसमें वे शेख अब्दुल्ला को कटु शब्दों में कश्मीर पर भारत का पक्ष समझाते दिखाए गए हैं. इस विवाद के बाद विभिन्न पक्षों द्वारा सारा जोर उस बयान की सत्यता-असत्यता का पता लगाने पर चला गया. इसके बाद बाबा साहब अंबेडकर के संपूर्ण वाङ्मय से कश्मीर से संबंधित कुछ वक्तव्यों को सामने लाया गया और उसे उपरोक्त बयानों की काट के रूप में पेश किया गया. लेकिन इतने भर से यह पूरी तरफ साफ नहीं हो पाता कि कश्मीर पर वास्तव में अंबेडकर क्या सोचते थे.

इसलिए गहराई में जाकर इस प्रश्न के पूरे उत्तर की ठीक-ठीक पड़ताल करनी जरूरी है कि कश्मीर पर अंबेडकर के मन में क्या चल रहा था और विभिन्न अवसरों पर उन्होंने उसे किन शब्दों में व्यक्त किया था और यह भी कि इस समस्या का उन्होंने क्या समाधान सुझाया था.

डॉ अंबेडकर भारत-विभाजन के पक्षधर थे

कश्मीर पर बाबा साहब का पक्ष समझने के लिए भारत-विभाजन के प्रश्न पर उनका विचार समझना जरूरी है. भारत के विभाजन से सात वर्ष पहले दिसंबर 1940 में उनकी 500 पृष्ठों की एक पुस्तक प्रकाशित हुई थी जिसका नाम था- ‘पाकिस्तान अथवा भारत का विभाजन’ (पाकिस्तान ऑर पार्टीशन ऑफ़ इंडिया). इस पुस्तक में डॉ अंबेडकर ने भी ‘सांस्कृतिक भिन्नता’ के तात्कालीन प्रचलित अर्थ के आधार पर भारत के विभाजन की सैद्धांतिक रूप से वकालत की थी. इस किताब की पृष्ठ संख्या-10 पर वे कहते हैं, ‘यदि आप भाषा के आधार पर हिंदू कर्नाटक को हिंदू महाराष्ट्र से या हिंदू आंध्र को हिंदू मद्रास से अलग कर सकते हैं, तो पाकिस्तान को भारत से अलग क्यों नहीं कर सकते. इस तर्क में कोई दम नहीं है कि विभाजन का भाषाई आधार अलग चीज है और सांस्कृतिक आधार अलग. क्योंकि भाषाई भिन्नता वास्तव में संस्कृतिक भिन्नता का ही दूसरा नाम है. पाकिस्तान बस ऐसे ही एक सांस्कृतिक इकाई की अभिव्यक्ति है जो अपनी विशिष्ट संस्कृति के विकास के लिए आज़ादी की मांग कर रही है.’

यहां यह याद रखना जरूरी है कि बाबा साहब को अच्छी तरह मालूम था कि 1933 में जब रहमत अली ने पाकिस्तान की संकल्पना कर इसके लिए आंदोलन शुरू किया था तो इसमें कश्मीर भी मुख्य रूप से शामिल था. बल्कि तब इसमें बंगाल और असम शामिल नहीं थे, जिन्हें बाद में मुस्लिम लीग ने अपनी मांग में शामिल किया. इस पुस्तक की पृष्ठ संख्या पांच और छह पर उन्होंने इसका जिक्र भी किया है.

हालांकि यहां यह स्पष्ट करना भी जरूरी है कि सांस्कृतिक आधार पर राज्यों और राष्ट्रों के निर्माण को स्वीकार करते हुए भी डॉ अंबेडकर किसी भी सांस्कृतिक समुदाय के भीतर के सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक अंतर्विरोधों को नज़रअंदाज नहीं करते थे, बल्कि उनके चिंतन में इन पक्षों पर ही ज्यादा जोर रहा है. उन्हें ‘संस्कृति’ शब्द और उसके प्रचलित निहितार्थों से भी बहुत परहेज था. तभी जब 1938 में कर्नाटक को बंबई (महाराष्ट्र) से अलग करने की बात आई तो बंबई विधान सभा में उन्होंने कहा था, ‘निजी तौर पर मैं खुल्लम-खुल्ला कहना चाहता हूं कि मैं नहीं मानता कि इस देश में किसी विशेष संस्कृति के लिए कोई जगह है, चाहे वह हिंदू संस्कृति हो, या मुस्लिम संस्कृति, या कन्नड़ संस्कृति या गुजराती संस्कृति. ये ऐसी चीजें हैं जिन्हें हम नकार नहीं सकते हैं, पर उनको वरदान नहीं मानना चाहिए, बल्कि अभिशाप की तरह मानना चाहिए, जो हमारी निष्ठा को डिगाती हैं और हमें अपने लक्ष्य से दूर ले जाती हैं. यह लक्ष्य है एक ऐसी भावना को विकसित करना कि हम सब भारतीय हैं.’

यह तो एक सर्वविदित तथ्य है कि डॉ अंबेडकर ने हिन्दू धर्म की बुराइयों पर निर्ममता से प्रहार किया था, लेकिन इस तथ्य पर कम ही बात होती है कि उन्होंने उससे भी कड़ा प्रहार इस्लाम धर्म की बुराइयों पर किया था. इसलिए यह जान लेना चाहिए कि भारत की वर्तमान हिंदूवादी सरकार यदि बाबा साहब को अपने सुभीते से आंशिक रूप से अपनाकर पूजा करना चाहती है, तो उसकी कुछ ठोस वजहें भी हैं. हिंदू भारत और मुस्लिम पाकिस्तान के बीच की सांस्कृतिक भिन्नता को कितनी कठोरता से उन्होंने स्थापित किया यह जानने के लिए भारत सरकार द्वारा प्रकाशित डॉ अंबेडकर का संपूर्ण वाङ्मय (अंग्रेजी में वॉल्यूम-8, और हिंदी में खंड-15) के संबंधित अध्याय देखने चाहिए.

मुस्लिम लीग और हिंदू महासभा के दोहरे चरित्र को उजागर किया

इस अध्याय में डॉ अंबेडकर ने तात्कालीन मुसलमानों और मुस्लिम राजनेताओं को घोर लोकतंत्र-विरोधी करार देते हुए कश्मीर पर उनकी राजनीति की पोल खोली है. वे लिखते हैं, ‘भारतीय रियासतों में राजनीतिक सुधारों के प्रति मुस्लिम नेताओं का रुख यह दर्शाता है कि मुस्लिम राजनीति किस तरह विकृत हो गई है. मुसलमानों और उनके नेताओं ने कश्मीर के हिंदू राज्य में प्रतिनिधि सरकार की स्थापना के लिए प्रचंड आंदोलन चलाया था. वे ही मुसलमान और वे ही नेता अन्य मुस्लिम रियासतों में प्रतिनिधि सरकारों की व्यवस्था लागू किए जाने के घोर विरोधी हैं. इस विचित्र रवैये का कारण बहुत सीधा सा है. हर मामले में मुसलमानों के लिए निर्णायक प्रश्न यही है कि उसका हिंदुओं की तुलना में मुसलमानों पर क्या प्रभाव पड़ेगा. यदि प्रतिनिधि सरकारों से मुसलमानों को (बहुसंख्यक होने की वजह से) सहायता मिलती हो तो वे उसकी मांग करेंगे और उसके लिए संघर्ष भी करेंगे.

...कश्मीर रियासत में शासक हिंदू है, लेकिन जनता में बहुसंख्यक मुसलमान हैं. मुसलमानों ने कश्मीर में प्रतिनिधि सरकार के लिए संघर्ष इसलिए किया क्योंकि कश्मीर में प्रतिनिधि सरकार से तात्पर्य है हिंदू राज्य से मुस्लिम अवाम के हाथों में सत्ता का हस्तांतरण. अन्य मुस्लिम रियासतों में शासक मुसलमान लेकिन अधिसंख्य जनता हिंदू है. ऐसी रियासतों में प्रतिनिधि सरकार का मतलब होगा मुस्लिम शासक से हिंदू जनता के हाथ में सत्ता का हस्तांतरण. और इसी कारण मुसलमान एक मामले में प्रतिनिधि सरकार की व्यवस्था का समर्थन करते हैं, जबकि दूसरे में विरोध. मुसलमानों की सोच में लोकतंत्र की प्रमुखता नहीं है. उनकी सोच को प्रभावित करने वाला तत्व यह है कि लोकतंत्र, जिसका मतलब बहुमत का शासन है, वह हिंदुओं के विरुद्ध संघर्ष में मुसलमानों पर क्या असर डालेगा. वे उससे मजबूत होंगे या कमजोर? यदि लोकतंत्र से वे कमजोर पड़ते हैं तो वे लोकतंत्र नहीं चाहेंगे. वे किसी मुस्लिम रियासत में हिंदू प्रजा पर मुस्लिम शासक की पकड़ कमजोर करने के बजाय अपने निकम्मे राज्य को वरीयता देंगे.’

यहां यह याद रखना जरूरी है कि डॉ अंबेडकर ऐसा उस समय कह रहे हैं जब भारत के विभाजन से लेकर देसी रियासतों और कश्मीर का प्रश्न जोर पकड़ चुका था. यह उपरोक्त कथन बाबा साहब द्वारा विभाजन पर लिखी गई उपरोक्त पुस्तक के ही तृतीय संस्करण, 1946 से है, जिसे बाद में उनके संपूर्ण वाङ्मय में शामिल किया गया है.

आत्मनिर्णय पर अंबेडकर के विचार

इसी पुस्तक में आगे डॉ अंबेडकर ने फिलिस्तीन, कश्मीर, हैदराबाद एवं अन्य प्रांतों में ‘आत्मनिर्णय के सिद्धांत’ के मामले में भी मुस्लिम लीग और हिंदू महासभा दोनों के दोहरे चरित्र को उजागर करते हुए लिखा है,‘सर्वप्रथम, आत्मनिर्णय जनता द्वारा होना चाहिए. यह बिंदु इतना सरल है कि इसे बताने की कोई आवश्यकता प्रतीत नहीं होती. परंतु इस पर बल देना आवश्यक हो गया है. हिंदू और मुसलमान दोनों आत्मनिर्णय के इस विचार के साथ छल-कपट कर रहे हैं. पाकिस्तान के अंतर्गत किसी एक क्षेत्र का दावा मुसलमानों द्वारा इसलिए किया जाता है, क्योंकि वहां की जनता मुस्लिम है, और दूसरे क्षेत्र का दावा इसलिए किया जाता है कि वहां का शासक मुस्लिम है, भले ही उस क्षेत्र की बहुसंख्यक जनता गैर-मुस्लिम हो. भारत में मुस्लिम लीग आत्मनिर्णय के लाभ का दावा कर रही है, फिलीस्तीन के मामले में इसका विरोध कर रही है. लीग द्वारा यह दावा किया जाता है कि कश्मीर एक मुस्लिम राज्य है, क्योंकि यहां की बहुसंख्यक जनता मुस्लिम है और हैदराबाद पर इसलिए दावा किया जाता है, क्योंकि वहां का शासक मुस्लिम है.

...इसी प्रकार हिंदू महासभा भी उस क्षेत्र को हिंदुस्तान में सम्मिलित करने का दावा करती है, क्योंकि वहां की जनता गैर-मुस्लिम है. हिंदू महासभा उस क्षेत्र को भी हिंदुस्तान में सम्मिलित करने के दावे के साथ अग्रसर है जहां का शासक तो हिंदू है लेकिन अधिकांश जनता मुस्लिम है. इस प्रकार इन अजीब और परस्पर-विरोधी दावों के पीछे एकमात्र तथ्य यह है कि पाकिस्तान बनाने की इच्छुक हिंदू और मुस्लिम दोनों पार्टियां आत्मनिर्णय के सिद्धांत को दूषित करने और पटलने में व्यस्त हैं. जिसके फलस्वरूप वे सुसंगठित रूप से उस क्षेत्रीय लूट को पूर्ण करने में स्वयं को न्यायसंगत ठहराते रहते हैं.’

इसके बाद जब भारत में जब राज्यों के पुनर्गठन की कोशिशें चल रही थीं तो डॉ अंबेडकर नहीं चाहते थे कि तात्कालीन हैदराबाद रियासत ज्यों-की-त्यों बनी रहे या कि प्रस्तावित आंध्र की राजधानी हैदराबाद बने. वे चाहते थे कि हैदराबाद रियासत को दो हिस्सों में बांटकर आंध्र एक नया राज्य बने जिसकी राजधानी वारंगल को बनाया जाए. बिल्कुल ऐसा ही विभाजन वे कश्मीर का भी चाहते थे. इस संदर्भ में अंबेडकर ने थोड़े तंज के साथ प्रधानमंत्री नेहरू के बारे मे कहा था, ‘प्रधानमंत्री हैदराबाद में और इसी तरह कश्मीर में भी ईश्वर की इच्छा के विरुद्ध काम करना चाहते हैं. बेशक, जल्दी ही उन्हें इसके परिणाम से सबक मिलेगा.’ (डॉ बाबा साहब अंबेडकर राइटिंग्स एंड स्पीचेज़, वॉल्यूम-1, पेज-133)

धारा-370 से अप्रत्यक्ष रूप से बेचैनी

12 अप्रैल, 1950 को ‘रिप्रेज़ेन्टेशन ऑफ़ द पीपुल बिल’ पर लोकसभा में चर्चा चल रही थी और डॉ अंबेडकर उस समय केन्द्रीय कानून मंत्री थे. उससे लगभग चार महीने पहले ही धारा-370 अस्तित्व में आ चुकी थी. इस दौरान उन्होंने सीधे धारा-370 का नाम नहीं लेते हुए अप्रत्यक्ष रूप से इस हवाले से जम्मू और कश्मीर राज्य में विशेष प्रावधान की चर्चा इन शब्दों में की थी -

‘फिर मैं कश्मीर पर आता हूं. जैसा कि यह सदन देखेगा कि कश्मीर को लेकर एक विशेष प्रावधान है, और वह प्रावधान इस अहम मायने में अलग है कि कश्मीर के प्रतिनिधि जनता द्वारा नहीं चुने जाएंगे. अब कश्मीर के मामले में इस अपवाद का कारण यह है कि यदि कहा जाए तो कश्मीर बहुत ही क्षीण रूप से भारत का हिस्सा है. कश्मीर से संबंधित अनुच्छेद कहता है कि (भारतीय संविधान का) केवल अनुच्छेद-1 ही उसपर लागू होता है, मतलब बस इतना कि कश्मीर भारतीय क्षेत्र का हिस्सा है. संविधान के अन्य प्रावधानों का कश्मीर पर लागू होना राष्ट्रपति पर निर्भर करेगा, जो कश्मीर की सरकार से परामर्श कर शेष अनुच्छेदों को ऐसे रूपांतरणों या बदलावों के साथ लागू करेंगे जैसा वे तय करना चाहें.’

‘जैसा कि सम्मानित सदन संभवतः यह जानता होगा कि कश्मीर के मामले में एक आदेश पहले ही जारी कर दिया गया है जिसमें राष्ट्रपति ने संसद में राज्यों के प्रतिनिधित्व से संबंधित अनुच्छेद में यह कहते हुए कुछ बदलाव किए हैं कि वे कश्मीर की सरकार से परामर्श कर कश्मीर के प्रतिनिधि को नामित करेंगे. मैं समझता हूं कि यह आदेश 26 जनवरी को जारी किया गया था. ऐसी स्थिति में संसद के लिए संसद में कश्मीर के प्रतिनिधित्व से संबंधित कोई भी प्रावधान बनाने की इससे अलग वास्तव में कोई गुंजाइश नहीं बचती जैसा कि इस विधेयक में प्रावधान किया गया है. मैं समझता हूं कि प्रथम अनुसूची किस तरह अस्तित्व में आई है इसे स्पष्ट करने के लिए इससे अधिक ज़रूरी और कुछ नहीं है.’ (डॉ बाबासाहब अंबेडकर राइटिंग्स एंड स्पीचेज़, वॉल्यूम-15, पेज-129)

यह जरूर कहा जा सकता है कि जब अंबेडकर कश्मीर की विशेष स्थिति के बारे में उपरोक्त शब्दों में बता रहे थे तो उनमें एक प्रकार की बेचैनी जैसी थी. इस बेचैनी की वजह हमें आगे उन्हीं के शब्दों में पता चलेगी. उस समय अंबेडकर इसपर इसलिए भी खुलकर नहीं बोलना चाहते थे क्योंकि वे सरकार का हिस्सा थे और अपनी ही सरकार की कश्मीर-नीति की खुलकर आलोचना नहीं कर सकते थे.

प्रधानमंत्री नेहरू की कश्मीर-नीति के कटु आलोचक

27 सितंबर, 1951 को जब अंबेडकर ने कानून मंत्री के अपने पद से इस्तीफा दे दिया तो उन्होंने इसके कई कारण गिनाए थे. इनमें तीसरा सबसे प्रमुख कारण उन्होंने प्रधानमंत्री नेहरू की कश्मीर नीति को भी बताया था. इस बारे में जारी अपने आधिकारिक वक्तव्य में डॉ अंबेडकर ने कहा था -

‘पाकिस्तान के साथ हमारा झगड़ा हमारी विदेश नीति का हिस्सा बन चुका है जिसके बारे में मैं गहरा असंतोष अनुभव करता हूं. पाकिस्तान के साथ हमारे संबंध दो कारणों से खराब हुए हैं - पहला कश्मीर और दूसरा है पूर्वी बंगाल में हमारे लोगों की स्थिति. मैंने महसूस किया कि हमें पूर्वी बंगाल के प्रति ज्यादा चिंतित होना चाहिए. तमाम अखबारों से पता चलता है कि वहां हमारे लोगों की स्थिति कश्मीर से कहीं ज्यादा असहनीय है. इसके बावजूद भले ही हम कश्मीर मुद्दे पर ही अपना सबकुछ दांव पर लगाते रहे हों, तब भी मुझे लगता है कि हम एक अवास्तविक मुद्दे पर लड़ते रहे हैं. इस मुद्दे पर हम इस नज़रिए से लड़ रहे हैं कि सही कौन है और गलत कौन. जबकि मेरी निगाह में असल मुद्दा यह नहीं है कि सही ‘कौन’ है, बल्कि यह है कि सही ‘क्या’ है. इसे ही यदि हम मुख्य सवाल मानें तो मेरी नज़र में इसका सही समाधान कश्मीर का विभाजन ही है. इसके हिंदू और बौद्ध हिस्से को भारत को दे दें, और मुस्लिम हिस्सा पाकिस्तान को, जैसा कि हमने भारत के मामले में किया.’

‘कश्मीर के मुस्लिम हिस्से से हमारा वास्तव में कोई लेना-देना नहीं है. यह कश्मीर और पाकिस्तान के मुसलमानों के बीच का मामला है. वे जैसे चाहें वैसा तय कर सकते हैं. या नहीं तो यदि आप चाहें तो इसे तीन हिस्सों में बांट दीजिए- युद्ध-विराम क्षेत्र, घाटी, और जम्मू-लद्दाख क्षेत्र. और इसके बाद केवल घाटी में जनमत-संग्रह करा लें. मुझे जिसका डर है वह यह है कि प्रस्तावित जनमत-संग्रह में पूरे क्षेत्र में जनमत-संग्रह की बात होगी, और उसमें कश्मीर के हिंदू और बौद्ध लोग भी उनकी इच्छा के विरुद्ध पाकिस्तान में घसीट लिए जाएंगे. और हमें वहां भी वैसी ही समस्या का सामना करना पड़ेगा जिसका हम आज पूर्वी बंगाल में कर रहे हैं.’ (डॉ बाबासाहब अंबेडकर राइटिंग्स एंड स्पीचेज़, वॉल्यूम-14 (भाग-2), पेज-1322)

अपने घोषणापत्र में सुझाया कश्मीर समस्या का समाधान

लेकिन बाद में तो ऐसी स्थिति बनी की उन्होंने कश्मीर सहित विभिन्न मुद्दों को आधार बनाकर सरकार से ही इस्तीफा दे दिया. इसके बाद वे 1952 में होने वाले प्रथम आम चुनावों की तैयारी में जुट गए. इस दिशा में पहला कदम था अपनी पार्टी ‘शेड्यूल कास्ट्स फेडरेशन’ का चुनावी घोषणापत्र जारी करना. तीन अक्टूबर, 1951 को ‘टाइम्स ऑफ़ इण्डिया’ अखबार ने अंबेडकर के इस मैनिफेस्टो का मसौदा प्रकाशित किया था. अंबेडकर ने इसमें कश्मीर मुद्दे पर भी अपना रुख पूरी तरह स्पष्ट करते तीन प्रमुख बिंदुओं में अपनी बात रखी थी.

घोषणापत्र के बिंदु-25 में अंबेडकर कहते हैं, ‘भारत जब आज़ाद हुआ था तो सभी राष्ट्रों ने इसे शुभकामनाएं दी थीं. आज स्थिति एकदम उलट है. आज भारत का कोई दोस्त नहीं है. ...विदेशी राष्ट्रों ने जो पिछले तीन साल के भीतर भारत के प्रति अपना मोर्चा बदला है उसका कारण कश्मीर, संयुक्त राष्ट्र संघ में कम्यूनिस्ट चीन के प्रवेश और कोरियाई युद्ध जैसे मामलों में भारत की नीति है.’

इसी घोषणापत्र के बिंदु-26 में डॉ अंबेडकर कहते हैं, ‘कांग्रेस सरकार द्वारा कश्मीर मुद्दे पर अपनाई गई नीति शेड्यूल कास्ट्स फेडरेशन को स्वीकार्य नहीं है. यदि यह नीति जारी रही तो यह भारत और पाकिस्तान के बीच एक चिरस्थायी शत्रुता को जन्म देगी और दोनों देशों के बीच युद्ध की संभावना भी पैदा करेगी. ...इसलिए कश्मीर का विभाजन हो- मुस्लिम इलाके पाकिस्तान में चले जाएं (इस शर्त पर कि यदि घाटी में रह रहे कश्मीरी ऐसा चाहें) और जम्मू तथा लद्दाख जैसे गैर-मुस्लिम क्षेत्र भारत में आ जाएं.’

इसी घोषणापत्र के बिंदु-35 में अंबेडकर लिखते हैं, ‘भारत सरकार के कुल राजस्व यानी लगभग 350 करोड़ का आधा से अधिक हिस्सा लगभग 180 करोड़ हर साल सेना खाए जा रही है. जिस देश के लोग भुखमरी से मर रहे हों वहां रक्षा पर इतना खर्च बहुत ही ज्यादा है. हमने घोषणापत्र में कश्मीर समस्या का जो समाधान सुझाया है उसके आधार पर और विदेश नीति में बदलाव करके दूसरे देशों के साथ मित्रवत् संबंध अपनाकर रक्षा खर्च में हर साल 50 करोड़ की कमी करने में कोई खतरा नहीं होनी चाहिए.’ (डॉ बाबासाहब अंबेडकर राइटिंग्स एंड स्पीचेज़, वॉल्यूम-17, भाग-1, पेज-386-398)

एक महीने बाद 27 अक्टूबर, 1951 को जालंधर में कुछ पत्रकारों ने अंबेडकर के साथ एक प्रेस-वार्ता की थी. पहला प्रश्न कश्मीर के बारे में ही था. जवाब में अंबेडकर ने कहा था, ‘मुझे डर है कि जम्मू-कश्मीर में जनमत संग्रह भारत के खिलाफ जा सकता है. जम्मू और लद्दाख में हिंदू आबादी को पाकिस्तान में जाने से बचाने के लिए, ऐसी किसी भी स्थिति में क्षेत्रीय आधार जम्मू, लद्दाख और कश्मीर में अलग-अलग जनमत-संग्रह होना चाहिए.’ (डॉ बाबासाहब अंबेडकर राइटिंग्स एंड स्पीचेज़, वॉल्यूम-17, भाग-2, पेज-381)

कश्मीर की वजह से बढ़ते रक्षा बजट की आलोचना

27 मई, 1952 को जब राज्यसभा में वर्ष 1952-53 के बजट पर चर्चा चल रही थी तो बम्बई से राज्यसभा में चुनकर आए डॉ अंबेडकर ने उस बहस में कश्मीर-समस्या की वजह से रक्षा बजट पर बेतहाशा खर्च की तीखी आलोचना करते हुए कहा था, ‘हमें कहा जाता है कि दुनिया में हमारे देश का कोई शत्रु ही नहीं है. तो फिर हम सेना रखते ही क्यों हैं? मुझे यह बिल्कुल मालूम नहीं है. दूसरे, यदि हमारा कोई संभावित शत्रु है, यदि मैं शत्रु शब्द का इस्तेमाल कर सकता हूं, तो वह संभवतः पाकिस्तान ही है. और वह भी केवल कश्मीर के मुद्दे की वजह से. ...लेकिन चूंकि कश्मीर का मामला अब संयुक्त राष्ट्र संघ के अधीन है, मुझे नहीं लगता कि संयुक्त राष्ट्र के दांतों तले रहते हुए पाकिस्तान कश्मीर पर या इस देश पर हमला करने की मूर्खता करेगा.

...फिर माननीय सभापति महोदय, लगता है हमें इस बात का एहसास ही नहीं है कि जितनी जल्दी हम कश्मीर मसले को सुलझा लें, उतना ही हमारे लिए बेहतर होगा. क्योंकि यदि हमारे रक्षा बजट में बढ़ोतरी का कारण कश्मीर को बताया जाता है, तो क्या यह हमारा कर्तव्य नहीं है कि हम इस विवाद को खत्म करने की दिशा में कोई सकारात्मक योगदान दें. मैं इस मुद्दे पर विस्तार में नहीं जा सकता, लेकिन जहां तक मैंने इस मामले में चल रही वार्ताओं में भारत सरकार की भूमिका का अध्ययन किया है, मुझे खेद के साथ कहना पड़ता है कि मैं एक शब्द भी ऐसा नहीं पढ़ा है जिससे भारत सरकार द्वारा इस मसले को सुलझाने के बारे में कोई सकारात्मक या नकारात्मक सुझाव का पता चल सके. वे बस सेना को राशि के आवंटन के प्रश्न पर ही अटके हुए हैं.’

‘दुनिया के इतिहास में जनमत-संग्रह का प्रश्न कोई नया नहीं है. ...क्या यह संभव नहीं है कि अपर साइलेसिया और अल्सासे-लोर्राइने में राष्ट्र संघ (लीग ऑफ़ नेशंस) द्वारा कराए गए जनमत संग्रह की तर्ज पर अपने कश्मीर में भी ऐसा ही कुछ करवाएं और तेजी से इस विवाद को निपटाएं ताकि हम रक्षा बजट से 50 करोड़ रुपये जारी कर इसे हमारे लोगों के फायदे के लिए उपयोग कर सकें. मैं कुछ ज्यादा नहीं कहना चाहता लेकिन इतना जरूर कहना चाहता हूं कि हममें से ज्यादातर लोग बहुत शिद्दत से यह महसूस करते हैं कि रक्षा बजट इस देश के कल्याण के रास्ते में सबसे बड़ी बाधा है.’ (डॉ बाबासाहब अंबेडकर राइटिंग्स एंड स्पीचेज़, वॉल्यूम-15, पेज-848-49)

जवाहर सुरंग को बताया देश की सुरक्षा के लिए खतरा

26 अगस्त, 1954 को राज्यसभा में अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों पर बहस के दौरान भी डॉ अंबेडकर ने कश्मीर पर प्रधानमंत्री नेहरू की नीतियों की फिर से कड़ी आलोचना करते हुए कहा था, ‘हमारी विदेश नीति का मूल सिद्धांत दूसरे देशों की समस्याओं को सुलझाना हो गया है, न कि अपनी समस्याओं को सुलझाना. हमारे यहां कश्मीर की समस्या है. हम कभी इसे सुलझाने में सफल नहीं हुए हैं. लगता है हर कोई यह भूल गया है कि यह कोई समस्या भी है. लेकिन मैं मानकर चलता हूं कि एक दिन हम एक नींद से जागेंगे और पाएंगे कि वह भूत है ही. और मुझे पता चला है कि प्रधानमंत्री ने कश्मीर से भारत को जोड़ने के लिए एक सुरंग खोदने की परियोजना शुरू की है. माननीय, मैं समझता हूं कि यह प्रधानमंत्री द्वारा किए जा सकने वाले सबसे खतरनाक कार्यों में से एक है. ...सुरंग खोदते हुए प्रधानमंत्री सोचते हैं कि केवल वही उसका इस्तेमाल करेंगे. उन्हें यह एहसास नहीं है कि यह दोतरफा रास्ता भी हो सकता है. दूसरी ओर से आनेवाला विजेता यदि कश्मीर पर कब्जा कर लेता है, तो वह सीधे पठानकोट पहुंच सकता है, और मुझे मालूम नहीं, लेकिन वह संभवतः प्रधानमंत्री के घर भी पहुंच सकता है.’ (डॉ बाबासाहब अंबेडकर राइटिंग्स एंड स्पीचेज़, वॉल्यूम-15, पेज-881-82)

कश्मीर की लड़ाई में महार बटालियन का योगदान

कश्मीर और डॉ अंबेडकर के बारे में एक और दिलचस्प बात बताई जाती है. 1994 में धनराज डाहाट ने मराठी में एक पुस्तक लिखी जिसका नाम था, ‘डॉ अंबेडकर और कश्मीर समस्या’. अंबेडकर विचारों से जुड़े प्रसिद्ध साहित्यकार मोहनदास नैमिशराय ने 1997 में इस पुस्तक का हिंदी में अनुवाद किया था. डाहाट की यह पुस्तक चांगदेव भवानराव खैरमोडे द्वारा मराठी में 12 खंडों में संकलित ‘डॉ बाबासाहेब अंबेडकर चरित्र’ को अपना आधार बनाया था.

इस पुस्तक में उन्होंने एसएसपी थोराट की किताब ‘दी रेजिमेंटल हिस्ट्री ऑफ़ महार एम. जी. रेजिमेंट’ के हवाले से यह बताया है कि जब अक्टूबर 1947 में जब कश्मीर पर पाकिस्तान की ओर से हमला हुआ तो सरदार पटेल ने वहां सेना भेजने के मामले में डॉ अंबेडकर से सलाह-मशविरा किया. डॉ अंबेडकर ने उन्हें सलाह दी कि जिन परिस्थितियों में वहां युद्ध लड़ा जाना है उसमें महार बटालियन को महारत हासिल है. उल्लेखनीय है कि डॉ अंबेडकर रक्षा मामलों में बहुत रुचि रखते थे और उन्हीं के प्रयासों से सितंबर 1941 में महार बटालियन का पुनर्गठन हुआ था. महार बटालियन ने इस युद्ध में गजब की वीरता का परिचय दिया था. खासकर झांगर और नौशेरा की लड़ाई में महार सैनिकों ने अदम्य साहस और शौर्य का परिचय दिया था. इस युद्ध के बाद महार बटालियन के नाईक कृष्णा सोनवणे को ‘महावीर चक्र’ और अमृत गांबरे, धोंडू जाधव, आबा किरकुतड़े, बलीराम सावड़ी और पुंडलिक महार को ‘वीर चक्र’ प्रदान किया गया था.

निष्कर्ष के तौर पर कहा जा सकता है कि कश्मीर पर डॉ अंबेडकर का दृष्टिकोण अत्यंत यथार्थवादी और समाधानपरक था. पाकिस्तान के साथ कई युद्धों और लगातार चल रहे छद्म-युद्धों में भारत के जितने संसाधनों की बर्बादी हुई है और जिस तरह सुरसा के मुंह की तरह साल-दर-साल बढ़ते रक्षा बजट ने मानव-संसाधन विकास को प्राथमिकता से बाहर कर रखा है, यह सब देखते हुए लगता है कि यदि डॉ अंबेडकर की बात समय रहते मान ली जाती तो इस समस्या का एक व्यावहारिक और चिरकालिक समाधान संभव हो सकता था.