अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की नीतियों से जूझ रही चीन की दिग्गज कंपनी ह्वावे ने अपने ही पैरों पर खड़े होने की ठान ली है. इसी मुहिम के तहत पिछले दिनों ह्वावे ने अपना खुद का ऑपरेटिंग सिस्टम (ओएस) लांच कर दिया. स्मार्टफोन पर काम करने वाले इस ऑपरेटिंग सिस्टम का नाम ‘हार्मनी ओएस’ रखा गया है.

ह्वावे को अपना ऑपरेटिंग सिस्टम क्यों बनाना पड़ा?

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने न केवल अमेरिका बल्कि दुनियाभर में ह्वावे की सेवाओं पर रोक लगाने की मुहिम छेड़ रखी है. इस साल की शुरुआत में अमेरिका ने इस चीनी कंपनी खिलाफ धोखाधड़ी, जासूसी और बौद्धिक संपदा की चोरी के कई मामले दर्ज किये थे. बीते मई में डोनाल्ड ट्रंप ने एक कार्यकारी आदेश जारी कर उसके उपकरणों, वायरलेस और इंटरनेट नेटवर्क की बिक्री पर प्रतिबंध लगा दिया. इसके कुछ रोज बाद ह्वावे को ब्लैकलिस्ट कर दिया गया. इसका मतलब यह हुआ कि अगर किसी अमेरिकी कंपनी को ह्वावे को उपकरण और सॉफ्टवेयर बेचना है तो उसे सरकार से विशेष इजाजत लेनी होगी.

अमेरिका की इस कार्रवाई का दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी स्मार्टफोन निर्माता कंपनी के व्यापार पर बड़ा असर पड़ा. ह्वावे अमेरिकी एंड्रॉयड निर्माता कंपनी गूगल, चिप निर्माता कंपनी इंटेल, माइक्रोन और क्वालकॉम के सबसे बड़े खरीददारों में शामिल है. इन कंपनियों से उपकरण और तकनीक न ख़रीद पाने के चलते दुनिया भर में उसके व्यापार को तगड़ झटका लगना स्वाभाविक था. उसे सबसे बड़ा झटका गूगल से मिला जिसने ह्वावे के लिए अपने एंड्रॉयड ऑपरेटिंग सिस्टम की सेवायें बंद कर दीं.

ह्वावे के स्मार्टफोन बिक्री का आधे से भी ज्यादा हिस्सा चीन के बाहर से आता है. इस साल मार्च तक स्मार्टफोन की बिक्री के मामले में उसने एप्पल जैसी दिग्गज कंपनी को पीछे छोड़ दिया था और वह केवल सैमसंग से ही पीछे थी. लेकिन, गूगल द्वारा ह्वावे का एंड्रॉयड लाइसेंस रद्द किए जाने के बाद से अब तक दुनियाभर में उसकी बिक्री में 40 फीसदी से ज्यादा की गिरावट आयी है. यूरोप में कई जगह आलम यह है कि ह्वावे के हाल ही में लॉन्च स्मार्टफोन भी आधे से कम कीमत में बिक रहे हैं.

इन परेशानियों से निजात पाने के लिए ही ह्वावे ने बीते जून में अपना खुद का ऑपरेटिंग सिस्टम बनाने का फैसला किया था जिसे उसने बीते 09 अगस्त को लांच कर दिया. कंपनी ने हार्मनी ओएस लांच कर अपने उन करोड़ों स्मार्टफोन यूजर्स को बड़ी राहत दी है, जो एंड्रॉयड का सपोर्ट बंद होने के बाद से खासे चिंतित थे.

कैसा है हार्मनी ऑपरेटिंग सिस्टम

ह्वावे का हार्मनी ओएस गूगल के एंड्रॉयड ऑपरेटिंग सिस्टम से काफी मिलता-जुलता है. यह स्मार्टफोन, स्मार्ट टीवी, स्मार्ट स्पीकर्स के साथ-साथ सेंसर्स के लिए भी कंपैटिबल है. यह आजकल मशहूर हो रहे इंटरनेट ऑफ थिंग्स का भी हिस्सा है. हार्मनी ओएस हुआवे के अपने नए माइक्रोकर्नल पर आधारित है. ह्वावे का दावा है कि एंड्रॉयड की तुलना में यह कम से कम संसाधनों का इस्तेमाल करके तेज स्पीड को मेन्टेन कर सकता है.

हार्मनी ओएस लॉन्च किए जाने के मौके पर ह्वावे कंज्यूमर बिजनेस के सीईओ रिचर्ड यू ने बताया कि दुनिया में सबसे ज्यादा इस्तेमाल किए जाने वाले एंड्रॉयड और आईओएस इंटरनेट से कनेक्ट होने वाली छोटी डिवाइसेज को अमूमन सपोर्ट नहीं करते हैं. लेकिन हार्मोनी ओएस के साथ ऐसा नहीं है. उनके मुताबक इसे बनाने के दौरान यह भी ध्यान रखा गया है कि एक ऐसा सिंगल सॉफ्टवेयर या ओएस बनाया जाए, जो ज्यादा मेमोरी और पॉवर वाले स्मार्टफोन और लैपटॉप के साथ-साथ उन डिवाइसेज पर भी आसानी से काम कर सके जिनमें कम मेमोरी और छोटे हार्डवेयर का इस्तेमाल किया जाता है. रिचर्ड यू ने ह्वावे यूजर्स को आश्वस्त किया कि एंड्रॉयड से हार्मनी ओएस पर आसानी से स्विच किया जा सकता है, नए ऑपरेटिंग सिस्टम पर स्विच करने में एक से दो दिन का समय लगेगा और यह बेहद आसान है.

तकनीक से जुड़े जानकारों की मानें तो हार्मनी ओएस के पीछे की तकनीक निश्चित रूप से आशाजनक दिखती है. इसके सिक्योरिटी फीचर्स का स्तर भी एंड्रायड की तुलना में बेहतर लगता है. जानकारों का कहना है कि हार्मनी ओएस में जिस तरह की तकनीक का इस्तेमाल किया गया है, उसे देखते हुए यह आने वाले सालों में एंड्रॉयड के लिए बड़ी चुनौती बन सकता है. लेकिन, ये लोग इस बात को लेकर आशंकाएं जाहिर करते हैं कि यह इस समय ह्वावे को संकट से निकलेगा. ये लोग ऐसी कई वजह बताते हैं जिनके चलते यह ह्वावे को अभी कोई बड़ी राहत नहीं देगा.

एप्स को लेकर मुश्किलें

तकनीक से जुड़े जानकार कहते हैं कि हार्मनी ओएस को लेकर ह्वावे को सबसे पहले एप्स के मोर्चे पर जूझना होगा. नए ओएस के चलते उसके पास एप्स की भारी कमी होगी जिसके चलते बेहद कम लोग एंड्रॉयड के मुकाबले इसे तरजीह देंगे. एंड्रॉयड आधारित स्मार्टफोन्स के बड़े स्तर इस्तेमाल होने का पहला बड़ा कारण इसका ‘ईजी टू यूज़’ होना और दूसरा इस पर मौजूद लाखों एप्स हैं. इस समय एंड्रॉयड ऑपरेटिंग सिस्टम के लिए 20 लाख से ज्यादा एप्स गूगल प्ले स्टोर पर मौजूद हैं.

इसके अलावा एप डेवलपर्स भी हार्मनी ओएस के लिए एप डेवलप करने में अभी ख़ास दिलचस्पी नहीं लेंगे. दरअसल, डेवलपर्स उसी ऑपरेटिंग सिस्टम के लिए एप बनाना पसंद करते हैं जिसे बड़ी संख्या में इस्तेमाल किया जाता है. इसकी वजह यह है कि इससे एप बनाने की लागत जल्द निकल आती है और फायदा भी ज्यादा होता है. तकनीक का विश्लेषण करने वाली कंपनी ‘मूर इनसाइट्स एंड स्ट्रेटजी’ के अध्यक्ष पैट्रिक मूरहेड एक अमेरिकी न्यूज वेबसाइट से बातचीत में कहते हैं, ‘अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हार्मनी ओएस उन्हीं समस्याओं का सामना करेगा जो विंडोज, टिज़ेन और अन्य ओएस को एंड्रॉयड और आईओएस के मुकाबले पेश आईं. बिना एप्स की डिवाइस (स्मार्टफोन) कोई नहीं खरीदता और जब इसे कोई खरीदता नहीं तो डेवलपर्स ऐसी डिवाइस के लिए एप्स बनाने की जहमत नहीं उठाते.’

ह्वावे के आगे संकट यह है कि वह एंड्रॉयड के इतने ज्यादा एप्स को कुछ ही महीनों के अंदर हार्मनी ओएस के लिए कैसे बनवाया जाए और अगर ऐसा नहीं किया तो उसे अपने स्मार्टफोन यूजर्स को अपने साथ जोड़े रखना मुश्किल होगा. हालांकि, जानकार के मुताबिक ह्वावे के शीर्ष अधिकारी भी इस बात को अच्छी तरह समझते हैं कि ऑपरेटिंग सिस्टम को सफल बनाने के लिए ज्यादा से ज्यादा एप्स का होना जरूरी है और इसीलिए हार्मनी ओएस को ओपन सोर्स बनाया गया है. इसका सीधा मतलब यह है कि एप डेवलपर्स को हार्मनी कंपैटिबल एप बनाने के लिए प्रेरित किया जाए. यह भी बताया जाता है कि ह्वावे अधिकारी दुनियाभर में डेवलपर्स को प्रोत्साहित करने के लिए और भी योजनाओं पर काम कर रहे हैं. लेकिन, देखना यह है कि जब तक इनकी ये योजनाएं कामयाब होती हैं, तब तक ह्वावे के कितने स्मार्टफोन यूजर्स उसके साथ बने रहते हैं.

ऑपरेटिंग सिस्टम बनने के बाद भी अमेरिकी प्रतिबंध आड़े आएंगे

तकनीक से जुड़े विशेषज्ञ एक और बात भी बताते हैं. इनका कहना है कि भले ही ह्वावे ने अपना खुद का ऑपरेटिंग सिस्टम बनाकर गूगल के एंड्रॉयड पर निर्भरता का तोड़ निकाल लिया हो, लेकिन इसके बाद भी अमेरिकी प्रतिबंध उसके आड़े आएंगे. इन लोगों के मुताबिक अमेरिका ने जो प्रतिबंध लगाए हैं, वे गूगल के साथ-साथ सभी अमेरिकी कंपनियों पर लागू होते हैं. इन कंपनियों में फेसबुक, अमेज़न, उबर, ईबे और पेपल जैसी कंपनियां भी शामिल हैं जिनकी एप्स पर दुनियाभर के अधिकांश स्मार्टफोन यूजर्स निर्भर हैं. ये जानकार आगे बताते हैं कि अमेरिकी प्रतिबंधों के चलते अब इन कंपनियों को ह्वावे के हार्मनी ओएस पर अपनी मौजूदगी के लिए अमेरिकी सरकार से विशेष अनुमति लेनी होगी. इस समय जिस तरह से डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन ने ह्वावे के खिलाफ मोर्चा खोल रखा है, उसे देखते हुए इन कंपनियों को यह विशेष अनुमति मिलने की उम्मीद बेहद कम है.

ऑपरेटिंग सिस्टम लांच करने के अलावा भी बहुत कुछ करना होगा

जानकार इस मामले में यह भी कहते हैं कि ह्वावे ने अपना ऑपरेटिंग सिस्टम तो लांच कर दिया है लेकिन उसे दुनिया भर में अपना भरोसा बनाए रखने के लिए अभी बहुत कुछ करना बाकी है. इन लोगों के मुताबिक अमेरिका ने उस पर जो प्रतिबंध लगाए हैं वो एक न एक दिन हट जाएंगे. लेकिन इन प्रतिबंधों से कहीं ज्यादा नुकसान उसे उन आरोपों की वजह से होगा जो अमेरिका ने उस पर लगाए हैं और जिनके चलते कंपनी की साख को नुकसान पहुंचा है. ह्वावे पर जो धोखाधड़ी, जासूसी और बौद्धिक संपदा की चोरी के आरोप लगे हैं, उनकी वजह से लोग ही नहीं सरकारें भी काफी समय तक ह्वावे को अपनाने से कतराएंगी. जानकारों की मानें तो ऐसे में अगले कई सालों तक चीन के बाहर इस दिग्गज कम्पनी के लिए चुनौतियां कम नहीं होने वाली हैं.