मंगलवार को ख़बर आई कि दुनिया की जानी-मानी फास्ट फूड रेस्तरां चेन केएफसी अब मीटलेस यानी शाकाहारी ‘चिकन नगेट्स’ और विंग्स का ट्रायल करेगी. केएफसी ने ऐलान किया कि वह लॉस-एंजेलिस की कंपनी बियोन्ड मीट के साथ मिलकर यह प्रयोग आजमाना चाहती है. बियोन्ड मीट वीगन फूड (वनस्पतियों से तैयार होने वाला भोजन) बनाती है जिसका चलन इन दिनों तेज़ी से बढ़ रहा है.

आने वाले समय में केएफसी के मेन्यू में मीट ज्यादा होगा या शाकाहार, यह तो तभी पता चलेगा, लेकिन अगर उसमें मीट कम होता है तो यह पर्यावरण और उसके प्रेमियों के लिये एक अच्छी ख़बर है. औद्योगिक स्तर पर मीट का उत्पादन और सेवन धरती और प्रकृति के बहुत अच्छी बात नहीं है. इसका सीधा वास्ता ग्लोबल वॉर्मिंग से है और अगर दुनिया में औद्योगिक स्तर पर मीट का उत्पादन कम होता है तो वह पूरी दुनिया के साथ-साथ भारत के लिये भी एक खुशख़बरी होगी.

केएफसी करीब 140 देशों में फैली है और पूरी दुनिया में इसके 23000 से अधिक रेस्तरां हैं. हालांकि कंपनी अमेरिका से यह प्रयोग शुरू करेगी लेकिन जिस तरह से लोगों में शाकाहार के लिये जागरूकता बढ़ रही है उसे देखते हुये पूरी दुनिया के बाज़ार पर इसका असर देखने को मिल सकता है. इसका अंदाज़ा इस बात से भी लग सकता है कि इस ऐलान के बाद बियोन्ड मीट और यम (केएफसी की मालिक कंपनी जो शेयर बाज़ार में लिस्टेड है) दोनों ही कंपनियों के शेयरों में उछाल आया यानी निवेशकों ने इस ऐलान को थम्स-अप दिया.

मांसाहार के ख़तरे

पर्यावरण के लिये मांसाहार के ख़तरे इसके विशाल औद्योगिक उत्पादन की वज़ह से हैं. इसमें पशु-पक्षियों को भारी भरकम खुराक के ज़रिये मांस की मांग पूरा करने के लिये तैयार किया जाता है. एक अनुमान के मुताबिक एक किलो बीफ तैयार करने में करीब 6-7 किलो अनाज की जरूरत होती है और यह अमेरिका, यूरोप और एशिया के कई देशों में भोजन का एक प्रमुख हिस्सा है. बहुत सारे अनाज़ के साथ-साथ मांसाहार के प्रोडक्शन और रेफ्रिजरेशन में अत्यधिक बिजली की भी जरूरत होती है. और यह सब कार्बन एमीशन की वजह बन रहा है.

जलवायु परिवर्तन पर नज़र रखने वाली वेबसाइट इंडिया क्लाइमेट डायलॉग में छपी एक रिपोर्ट के मुताबिक वीगन मील के मुकाबले मांसाहारी भोजन 2.5 गुना अधिक कार्बन डाइऑक्साइड छोड़ता है. सवाल है कि साल 2050 में जब दुनिया की आबादी 1000 करोड़ हो जायेगी, तब क्या यह धरती मांस का उत्पादन और सेवन झेल पायेगी?

शाकाहार के प्रति जागरूकता भले ही बढ़ी हो लेकिन आंकड़े बताते हैं कि पिछले 60 साल में दुनिया में मीट उत्पादन उससे भी ज्यादा तेज़ी से बढ़ा है. सत्तर के दशक की शुरुआत में पूरी दुनिया का मीट उत्पादन आठ करोड़ टन से कम था. लेकिन आज यह 33 करोड़ टन से अधिक है यानी चार गुना से अधिक की वृद्धि.

इसकी एक बड़ी वजह हैं ब्राज़ील, अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया और चीन जैसे देश जहां मीट की खपत बहुत अधिक है. जहां दुनिया में औसतन हर आदमी सालाना 43 किलोग्राम मांस खाता है वहीं इन देशों का प्रति व्यक्ति मीट सेवन बहुत अधिक है. मिसाल के तौर पर ऑस्ट्रेलिया में यह आंकड़ा करीब 112 किलोग्राम और अमेरिका में 142 किलोग्राम है!

संयुक्त राष्ट्र के वैज्ञानिकों की ताज़ा रिपोर्ट ने इस बात पर ज़ोर दिया है कि धरती को बचाने के लिये कृषि उत्पादन और खान-पान दोनों के ही पैटर्न को बदलने की ज़रूरत है. ग्रीनपीस की एक रिपोर्ट में भी जंगलों के कटने और खान-पान की आदतों को क्लाइमेट चेंज के लिये ज़िम्मेदार बताया गया है.

शाकाहार का बढ़ता चलन

यह कहना ग़लत नहीं होगा कि केएफसी का ताज़ा ऐलान बाज़ार के रुझान को भांपते हुये है. मांसाहार को प्रमुखता देने वाले देशों में भी लोगों के बीच ग्लोबल वॉर्मिंग और स्वास्थ्य को लेकर फिक्र बढ़ रही है. इस साल की शुरुआत से ही अमेरिका और यूरोप समेत दुनिया भर के बच्चे और युवा अपने-अपने स्कूल-कॉलेज छोड़कर सड़कों पर प्रदर्शन करने उतर रहे हैं.

इन बच्चों-युवाओं की प्रमुख मांग जलवायु परिवर्तन के ख़तरों से दुनिया को बचाने की है. लेकिन इस तरह की मुहीम अब शाकाहार के लिये बढ़ते रुझान में भी तब्दील हो रही है. लोग अब इस बात को समझ रहे हैं कि अंधाधुंध रसायनों के इस्तेमाल से बन रहा मीट सेहत के लिये कितना ख़तरनाक है. वीगन सोसायटी के आंकड़ों के मुताबिक ब्रिटेन में 2014 में जहां 1.5 लाख लोग शाकाहारी थे वहीं 2018 में इनकी संख्या छह लाख हो गई यानी चार गुना की बढ़ोतरी.

भारत के लिये इसके मायने

खान-पान और उत्पादन में किसी भी तरह का सकारात्मक बदलाव भारत के लिये अच्छी ख़बर है. विशेष भौगोलिक हालात की वजह से यहां ग्लोबल वॉर्मिंग का असर तुरंत देखने को मिलता है. इसकी एक मिसाल सुंदरवन का इलाका है. यहां बढ़ते समुद्र स्तर की वजह से पानी में खारापन बढ़ता जा रहा है और इसके चलते किसानों के लिये धान की खेती करना नामुमकिन हो गया है. भारत और बांग्लादेश के कई सुंदरवन निवासी किसान अब धान की खेती छोड़कर केकड़ा पालन की ओर झुक रहे हैं.

वैसे दुनिया के अन्य देशों के मुकाबले हमारे देश में मीट की खपत अपेक्षाकृत काफी कम है - सालाना सिर्फ 4.4 किलो/ प्रति व्यक्ति. लेकिन यह याद रखना भी ज़रूरी है कि हमारी आबादी अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया और यूरोपीय देशों के मुकाबले काफी अधिक है. हालांकि यहां एक अच्छी बात यह है कि भारत की मांसाहार खपत में 80% हिस्सा पोल्ट्री का है जिसका उत्पादन बीफ और दूसरे रेड मीट के मुकाबले काफी कम ऊर्जा की मांग करता है.

भारत में मीट उत्पादन से जुड़ा एक तथ्य यह भी है कि हमारा मांस का निर्यात पिछले कुछ सालों में लगातार बढ़ा है. आज भारत सालाना करीब 20 लाख टन मीट निर्यात करता है और ब्राज़ील के बाद वह दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा निर्यातक देश है.

केएफसी का यह प्रयोग किस हद तक पहुंचता है और व्यवहारिक रूप में इससे शहरी खानपान कितना प्रभावित होता है यह जानने के लिये इंतज़ार करना पड़ेगा. लेकिन यह कई दूसरी अंतरराष्ट्रीय कंपनियों को भी शाकाहार की दिशा में कदम बढ़ाने की सोच दे सकता है. बर्गर किंग और मैकडोनल्ड्स जैसी फास्ट फूड चेंस के वीगन मीट से जुड़े इक्का-दुक्का प्रयोगों ने शायद केएफसी को ऐसा करने के लिए प्रेरित किया होगा. और उन जैसी कंपनिया भी अब केएफसी से प्रेरित होकर इस दिशा में और आगे जाने की सोच सकती हैं. ऐसे में ऊर्जा की कुल खपत घटी तो धरती को ठंडा रखने की दिशा में यह मददगार होगी.