असम में राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (एनआरसी) की अंतिम सूची जारी कर दी गई है लेकिन दशकों से इस कवायद की समर्थक रही सत्ताधारी भाजपा इसको लेकर खुश नहीं है. एनआरसी कार्यालय के मुताबिक इस सूची में 3.11 करोड़ आवेदकों के नाम शामिल हैं जबकि 19.07 लाख लोगों को बाहर कर दिया गया है. इस हवाले से भाजपा के वरिष्ठ नेता और असम के वित्त मंत्री हेमंत बिस्वा सरमा ने इस सूची से सिर्फ 19 लाख लोगों के बाहर होने में ‘गड़बड़ी’ बताई है. उनका दावा है कि इस सूची से और भी ‘अवैध प्रवासियों’ को बाहर होना चाहिए. सरमा के मुताबिक असम से ‘हर एक विदेशी’ को बाहर निकालने की भाजपा की लड़ाई अभी जारी रहेगी.

इंडियन एक्सप्रेस से बात करते हुए असम के वित्तमंत्री ने कहा है कि भाजपा और पार्टी की अगुवाई वाली राज्य सरकार अब सुप्रीम कोर्ट में जाएगी और सीमावर्ती जिलों की एनआरसी सूची में ‘री-वेरीफिकेशन’ (फिर से पुष्टि) की मांग करेगी. इसके साथ ही हेमंत बिस्वा सरमा ने कहा है कि उनकी पार्टी इस मामले पर आधिकारिक रुख बाद में साफ करेगी.

भाजपा नेता के मुताबिक उन्हें पता चला है कि राज्य के मूल निवासी एनआरसी सूची से खुश नहीं हैं. सरमा का कहना है, ‘एनआरसी की कवायद असम के लोगों की अपेक्षाओं पर खरी नहीं उतरी है क्योंकि इस प्रक्रिया में 19 लाख लोगों को बाहर किया गया है. इनमें से 3.80 लाख लोग वे हैं जो अपील नहीं करेंगे और कई तो मर भी चुके हैं. तो इस हिसाब से बाहर किए गए लोगों का असल आंकड़ा 15 लाख है लेकिन इनमें से पांच-छह लाख वे लोग हैं जो बांग्लादेश में धार्मिक उत्पीड़न की वजह से 1971 से पहले यहां आ चुके थे.’

एनआरसी की प्रक्रिया में 1971 से पहले शरणार्थी के तौर पर आए लोगों के प्रमाणपत्र को मान्यता नहीं दी गई है. यह बताते हुए सरमा कहते हैं कि ट्रिब्यून इनको भी मान्यता देगा और इस तरह से एनआरसी से बाहर किए गए लोगों की कुल संख्या सिर्फ 11 लाख रह जाएगी. फिर इनमें से कुछ लोग ऐसे हैं जिनके माता-पिता एनआरसी की सूची में शामिल हैं. जब इन लोगों का नाम भी एनआरसी में शामिल हो जाएगा तो इससे बाहर निकाले गए लोगों की तादाद सिर्फ छह या सात लाख ही बचेगी जो बहुत कम है.

हेमंत बिस्वा सरमा के मुताबिक सरकार ने संसद में जानकारी दी थी कि असम में 40 लाख लोग विदेशी हैं और यही वजह है कि स्थानीय लोग एनआरसी की सूची से बाहर निकाले गए लोगों की कम संख्या को लेकर नाखुश हैं.