असम में राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर यानी एनआरसी की अंतिम सूची शनिवार को जारी कर दी गई. इस सूची में 3.11 करोड़ लोगों को शामिल किया गया है और 19 लाख लोग इससे बाहर हैं. इससे पहले पिछली साल 30 जुलाई को प्रकाशित हुए एनआरसी मसौदे में 40 लाख लोग सूची से बाहर थे. तब इस बात को लेकर असम से लेकर दिल्ली तक काफ़ी हंगामा हुआ था कि क्या इन सभी को ‘विदेशी’ घोषित कर दिया गया है. बाद में सुप्रीम कोर्ट ने मामले में हस्तक्षेप करते हुए अंतिम सूची तैयार करने की प्रक्रिया अपनी निगरानी में कराने का फ़ैसला किया. इसके तहत मसौदे की सूची से बाहर रखे गए सभी लोगों को ख़ुद को भारत का नागरिक साबित करने का मौक़ा दिया गया. एक साल के बाद अब जब एनआरसी की अंतिम सूची जारी कर दी गई है तो इससे कुछ नए सवाल पैदा हो गए हैं.

एनआरसी से बाहर रह गए लोगों के पास अब क्या विकल्प हैं?

एनआरसी की अंतिम सूची से बाहर रखे गए 19 लाख लोगों के आगे अब कई बड़ी चुनौतियां हैं. इनमें सबसे बड़ी चुनौती यह साबित करना है कि 25 मार्च, 1971 या उससे पहले उनके पुरखे भारत में रह रहे थे. इसके लिए उनके पास पहला विकल्प विदेशी न्यायाधिकरण (एफटी) के पास आवेदन देने का है. न्यायाधिकरण उनके आवेदन पर 120 दिनों के भीतर फ़ैसला लेगा. यहां एक बड़ी दिक़्क़त यह है कि एफ़टी के सामने ख़ुद को भारतीय नागरिक साबित करने के लिए लोगों को नए सबूत लाने होंगे. क्योंकि अभी तक जो भी सबूत इन लोगों ने पेश किए होंगे, उन पर ग़ौर करने के बाद ही इन्हें एनआरसी की सूची से बाहर किया गया होगा.

अगर विदेशी न्यायाधिकरण में भी इन लोगों का आवेदन अस्वीकार हो जाता है तो सूची से बाहर किये गये लोगों के पास हाई कोर्ट और उसके बाद ज़रूरत पड़ी तो सुप्रीम कोर्ट में अपील करने का विकल्प मौजूद है. यहां भी उन्हें दो दिक़्क़तों का सामना करना पड़ सकता है. पहली दिक़्क़त नए दस्तावेज़ पेश करने की ही होगी. वहीं, दूसरी दिक़्क़त अदालत पहुंचने से पहले ही जेल जाने से जुड़ी है. दरअसल, एफ़टी में भी अपना केस हारने की वजह से सूची से बाहर रखे गए लोगों को गिरफ़्तार किया जा सकता है या किसी निगरानी के केंद्र में रखा जा सकता है. ऐसे में ये लोग अदालत में कैसे अपील करेंगे, यह फ़िलहाल साफ़ नहीं है. हालांकि असम सरकार ने भरोसा दिया है कि वह उन लोगों की हरसंभव मदद करेगी जो सच में भारत के नागरिक हैं लेकिन ग़लती से अंतिम सूची से बाहर कर दिए गए.

खुद को भारत का नागरिक साबित न कर पाने पर क्या होगा?

सभी विकल्पों को आजमाने के बाद भी अंतिम सूची से बाहर रह गये लोगों को कहां भेजा जाएगा, इसकी स्थिति काफ़ी उलझन भरी है. ग़ौरतलब है कि असम मूवमेंट का उद्देश्य बांग्लादेश से भारत में आए लोगों को वापस वहीं भेजना था. लेकिन बांग्लादेश ने कभी भी औपचारिक रूप से यह स्वीकार नहीं किया है कि उसका एक भी नागरिक अवैध रूप से भारत में घुसा है. वहीं, रोहिंग्या मुसलमानों को अपने यहां शरण देने के चलते वह पहले ही कई तरह की मुसीबतें झेल रहा है. हाल के समय में उसने रोहिंग्याओं को वापस म्यांमार भेजने के कई प्रयास किए हैं. ऐसे में लगता नहीं कि वह भारत में ग़ैर-नागरिक घोषित किए गए लोगों को अपना मानकर उन्हें अपने यहां आने देगा. भारत सरकार की तरफ़ से भी इस संबंध में अभी तक यह साफ़ नहीं किया गया है कि वह इन ‘विदेशी’ नागरिकों को बांग्लादेश कैसे भेजेगी.

ग़ैर नागरिक क़रार दिए जाने के चलते अंतिम सूची से बाहर किए लोगों के पास वोटिंग का अधिकार नहीं रहेगा. गृह मंत्रालय का कहना है कि ऐसे लोगों के लिए भारत में कोई नीति नहीं है. उनके रहने, काम करने और पढ़ने के अधिकारों को लेकर भी तस्वीर साफ़ नहीं है. कुछ लोगों ने सरकार को सलाह दी है कि जब तक इस समस्या का समाधान नहीं निकल जाता, तब तक इन लोगों को काम करने का परमिट दिया जाए. वहीं, कई लोग इस सुझाव के ख़िलाफ़ है. इस स्थिति में यही लगता है कि असम की जेलों और हिरासत केंद्रों में इन लोगों की संख्या बढ़ने वाली है. इससे अपनी तरह की कई नई चुनौतियां सामने आ सकती हैं.

क्या एनआरसी का मुद्दा अब ख़त्म हो गया है?

एनआरसी की अंतिम सूची सुप्रीम कोर्ट के जुलाई महीने के उस फ़ैसले के बाद जारी की गई है, जिसमें उसने एनआरसी मसौदे में शामिल 20 प्रतिशत लोगों का पुनःसत्यापन करने की इजाज़त देने से इनकार कर दिया था. कोर्ट ने कहा था कि एनआरसी की प्रक्रिया को दोबारा दोहराया नहीं जा सकता. अब अपडेटेड सूची में विदेशी नागरिकों की संख्या 40 से 19 लाख हो जाने पर भाजपा खुश नहीं है. असम के वित्त मंत्री और वरिष्ठ भाजपा नेता हिमंता बिस्व सर्मा का कहना है कि 19 लाख की संख्या ‘त्रुटिपूर्ण’ है और अंतिम सूची से और अवैध प्रवासियों को बाहर किया जाना चाहिए था. सर्मा ने कहा है कि उनकी पार्टी के लिए यह मुद्दा अभी ख़त्म नहीं हुआ और इसे लेकर वे अपने लड़ाई जारी रखेंगे. उधर, ऑल असम स्टूडेंट्स यूनियन ने भी एनआरसी पर नाख़ुशी जताते हुए इस मुद्दे को एक बार फिर सुप्रीम कोर्ट में ले जाने की घोषणा की है.