आत्म और अन्य का द्वैत सिर्फ़ एक दार्शनिक प्रत्यय भर नहीं है. उसकी गहरी-लंबी सामाजिक-सांस्कृतिक उपस्थिति भी रही है. जो लोग अपने को भिन्न मानते या ऐसे देखे जाते हैं क्योंकि उनकी आत्म से असमानता होती है, उन्हें मोटे तौर पर अन्य कहा-माना जाता है. हर समाज में अन्य, अपनी असमानता के बावजूद, मान्यता की मांग करता है. जैसे आत्म के वैसे ही अन्य के अनेक पहलू होते हैं. अकसर बिना अन्य के आत्म अपने को परिभाषित नहीं कर सकता. हम जिन्हें अपने से अलग या दूसरा मानते हैं वे हमें अपने को व्यक्तिगत तौर पर या सामाजिक रूप से परिभाषित करने में मदद करते हैं. संसार भर में सदियों से ‘दूसरे’ रहे हैं और कई बार प्रताड़ित किये जाकर शरणार्थी बने हैं लेकिन उतना ही सही यह भी है कि जब दूसरों को स्वीकार किया गया है तो अतीत में, जिसे हम सभ्यता कहते हैं, उसका निर्माण हुआ है. अन्यता को एक सिद्धान्त के रूप में पिछले लगभग दो सौ बरसों में औपनिवेशिक शक्तियों ने विकसित किया जो उस द्वैत में रंगा हुआ है जिसमें सभ्य और बर्बर दो ज़रूरी कोटियां थीं.

दसवां नेमिचन्द्र जैन स्मृति व्याख्यान देते हुए इतिहासकार-चिंतक रोमिला थापर ने आत्म और अन्य के संबंध की भारतीय इतिहास में पड़ताल करते हुए बताया कि भारतीय परंपरा में पूर्वपक्ष-प्रतिपक्ष-सिद्धान्त के द्वारा आत्म और अन्य की गुत्थी का हल खोजा जाता रहा है और ज्ञान को कभी स्थिर नहीं माना गया है क्योंकि नये साक्ष्य और जिज्ञासा की नयी विधियों की संभावना बराबर बनी रहती है. रोमिला जी ने यह भी स्पष्ट किया कि धर्म भारत में अनौपचारिक और औपचारिक दोनों ही रूपों में व्यक्त होता रहा है. अनौपचारिक धर्म वह है जब कोई व्यक्ति मुक्त भाव से यह निश्चय करता है कि वह किसे और क्यों पूजेगा. औपचारिक धर्म वह है जिसमें आस्था और व्यवहार तय किये जाते हैं. ऐसा धर्म संस्थाएं स्थापित करता है जो उसे अधिकार देती हैं और उसके समर्थकों की संख्या बढ़ाने में सहायक होती हैं. उसमें पुरोहित, अनुष्ठान, पवित्र ग्रंथ आदि का प्रावधान होने लगता है.

प्रायः सभी धर्म अनौपचारिक ढंग से शुरू होते रहे हैं. जैसे-जैसे उनका सामाजिक समर्थन बढ़ता है वैसे-वैसे वे औपचारिक आयाम अपनाते और संस्थाएं स्थापित करते हैं. ऐसे धर्म सार्वजनिक स्पेस में सक्रिय होते हैं और निजी आस्था और अनौपचारिक पूजा तक सीमित नहीं रहते. वे सामाजिक और राजनैतिक नीति से सम्बद्ध हो जाते हैं. जब ऐसे धर्मों में रूढ़िवादिता बढ़ती है तो ‘अन्य’ प्रगट होता है, असहमति के रूप में और कई बार यह असहमति अपनी आस्था और व्यवस्था भी विकसित करती है. रूढ़ि के सामने कई विकल्प उभरते हैं: वह विरोधी मानकर असहमति को नकार दे, अन्य सम्प्रदायों के बरक़्स उन्हें रखे या कालान्तर में उन्हें अपने में शामिल कर ले. ये सभी भारत में होते रहे हैं.

भारत में धर्म एकाश्म और एकरूप नहीं रहे हैं. औपचारिक समय से पहले सामाजिक सरोकार और धार्मिक पहचानें अकसर सम्प्रदायों के रूप में व्यक्त होती थीं. ये संप्रदाय संभ्रांत वर्ग तक नहीं, बड़ी संख्या में लोगों को संबोधित थे. कोई भी संस्कृति एकरूप और अपरिवर्तित नहीं रहती. कोई शुद्ध सतत् संस्कृति नहीं होती जो इतिहास के दौरान वैसी ही बनी रहे. हर संस्कृति या तो अपनी ऐतिहासिक स्थिति के कारण या अन्य तत्वों के सम्पर्क में आने के कारण अपने को बदलती या पुनर्नवा होती है. उसकी बहुल जड़ें और बहुल शाखाएं ही उसकी अनश्वरता का सुनिश्चय करती हैं.

ऋग्वेद में आर्यवर्ण और दासवर्ण दो भेद हैं. उसका आपसी सम्बन्ध जटिल है. दास आर्य-आत्मन् के अन्य हैं. वे सामाजिक रूप से दूर किये जाते हैं और उनसे सेवा का काम लिया जाता है पर कुछ दासी स्त्रियों के पुत्र दासी-पुत्र ब्राह्मण कहलाते हैं. वेद की कई ऋचाएं दास-ऋषियों ने रची है क्योंकि वे संस्कृति पर अपने अधिकार से ब्राह्मण की कोटि में माने गये थे. यहांं आत्म अन्य के लिए जगह बना रहा है.

वैदिक काल से एक हज़ार बरस बाद श्रमण हुए- जैन, बौद्ध, आजीविक. यहां संस्कृति खुद अपने बीच से वैकल्पिक अन्य पैदा कर रही है. श्रमण कमो-वेश वैदिक ब्राह्मणत्व के विरुद्ध थे. उन्होंने देवताओं में विश्वास, निजी आत्मन के अस्तित्व, यज्ञ की सार्थकता आदि पर प्रश्न उठाये. तब तक स्थिति यह हो गयी कि कई असहमत सम्प्रदाय बन गये और कोई एकरूप धर्म नहीं रहा. श्रमणों ने सामाजिक परिदृश्य पर भिक्षुक के रूप में एक नया व्यक्तित्व रचा जो परित्याग पर आधारित नयी नैतिकता भी थी. यह नया अन्य था. वह स्वेच्छा से समाज से बाहर था पर इसी कारण उसकी समाज में नैतिक हैसियत थी. फिर अवर्णों के रूप में नया अन्य गढ़ा गया जो सबसे नीचे की जाति में रखा गया. यह कुछ पर बलात् अन्यता लादने जैसा था.

भक्ति काल में मौजूदा धर्मों के अन्य के रूप में नयी स्थिति बनी. सूफ़ी भी इस समय प्रगट हुए. धार्मिक शिक्षा अनेक स्तरों पर फैली और आज जिनको हम हिंदू या मुसलमान कहते हैं इसी समय संग्रथित होना शुरू हुए. न भक्त, न सूफ़ी किसी नये धर्म की स्थापना या प्रस्ताव कर रहे थे. उनमें अद्भुत खुलापन और ग्रहणशीलता थे अपने अनुयायियों की पिछली धार्मिक पहचान या वर्ण तथा जाति इस नये अन्य के लिए अप्रासंगिक थी. कृष्ण भक्ति संप्रदाय में अनेक कवि और उपासक अलग-अलग धार्मिक और सामाजिक पृष्ठभूमियों से आये. उनमें रसखान जैसे धनी ज़मींदार खानदानी और रहीम जैसे मुग़ल दरबारी भी शामिल थे. यह दिलचस्प है कि कृष्ण भक्तों को रूढ़िबद्ध इस्लाम के मौलवियों और काज़ियों ने और रूढ़ ब्राह्मणों ने ‘अन्य’ माना.

ज़ाहिर है कि हिंदू-मुस्लिम के बीच जो अकाट्य द्वैत इस समय हावी किया जा रहा है उसे भारतीय इतिहास और परम्परा का साक्ष्य और समर्थन उपलब्ध नहीं है. आत्म और अन्य के बीच संबंध-संवाद और परस्पर संशोधन और एहतराम की ही परंपरा है. उनके बीच शत्रुता की नहीं, जैसा आजकल फैलाया जा रहा है.

भाषा में बह जाता जगत

बीसवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध और इक्कीसवीं के आरम्भ में जिन कवियों ने निर्भीकता, साहस, कल्पना के नवाचार और अपनी प्रगल्भ प्रखरता से काव्यशास्त्र बदला उनमें मराठी कवि दिलीप चित्रे रहे हैं. यह कविता का वितान बदलना भर नहीं था, यह उसके भूगोल का विलक्षण विस्तार था. यह कविता के इतिहास को ताज़ा नज़र से देखकर पुनरायत्त और किसी हद तक पुनराविष्कृत करना था. यह निरन्तर परिवर्तन की क्रान्ति थी जो अब टिकाऊ हो गयी है और अब तक अबाध चल रही है.

दिलीप चित्रे द्विभाषिक कवि थे. उन्होंने मराठी के अलावा अंग्रेज़ी में लिखा और कई मराठी-हिंदी कवियों की कविताओं का अनुवाद भी अंग्रेज़ी में किये. वे चित्रकार थे और उनके कुछ चित्रांकन हिंदी संचयन में शामिल हैं. उन्होंने फ़िल्में भी बनायीं. भारत भवन में रहते उन्होंने शमशेर बहादुर सिंह के कविता-पाठ पर एक बहुत सुंदर फ़िल्म बनायी थी. उनकी हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत में गहरी पैठ थी और उसके बारे में उन्होंने, जब-तब, मार्मिकता और गहरी संवेदना से लिखा. वे कुशल संपादक थे और उन्होंने अंग्रेज़ी और मराठी में कई पत्रिकाओं का बहुप्रशंसित संपादन किया.

अपनी सारी वैचारिक सघनता और प्रखरता के बावजूद, या शायद उसके कारण, दिलीप जानते थे कि जीवन और सच्चाई, भाषा और रूपाकार अत्यन्त जटिल होते हैं और उन्हें एक कवि सरलीकृत या सामान्यीकृत नहीं कर सकता. ऐसा करना कविकर्म का ही प्रत्याख्यान होता. दूसरे, दिलीप को इसका भी पूरा तीख़ा अहसास था कि हमारा समय और समाज, अपनी सारी आधुनिकता के बावजूद, सच और सच्चाई के अलक्षित पक्षों का सामना करने की ताब नहीं रखता है. दिलीप कभी मुनासिब नाटकीयता के साथ और कभी बिना किसी नाटकीयता के, अपने ग़लत या कई बार अनैतिक समझे जाने का जोखि़म उठाकर कविता में सच कहने, सत्यकथन का लगातार दुस्साहस करते थे. कठिन समय में सच भी कठिन होता है और उसे किसी आसान तरीके से समझा-कहा-खोजा नहीं जा सकता. दिलीप चित्रे का अपना काव्यशिल्प इस दुहरी कठिनाई से जूझता कठिन शिल्प है जिसे सच की प्रामाणिकता अधिक प्यारी है, सरलता का आकर्षण प्रलोभन नहीं उसका अभीष्ट नहीं. उनकी कविता जगत्समीक्षा और आत्मसमीक्षा कई बार एक साथ है. हमें वही कवि अपने सच कहने से भरोसे का लगता है जो अपनी सचाई का भी निर्ममता से बखान कर सके. उनकी कविता कभी-कभी ‘हरामज़ादी आवाज़’ भी बन सके इस जतन से वे कभी विरत नहीं हुए.

तुषार धवल के हिंदी अनुवाद में दिलीप चित्रे की कविताओं के संचयन ‘मैजिक मुहल्ला’ को रज़ा फ़ाउण्डेशन के सहयोग से दिलीप के कुछ चित्रों की प्रतिकृतियों के साथ दो ज़िल्दों में वाणी प्रकाशन ने प्रकाशित किया है. 30 अगस्त को मुंबई में उनकी कविता के मराठी समग्र के साथ इसका भी लोकार्पण हुआ.