ग्रेटर नोएडा, दादरी क्षेत्र का एक गांव (सेक्टर म्यू-I के पास)

‘आपके यहां भी बच्चा चोरी की अफ़वाह फैल रही है?’
‘अफ़वाह नहीं, सच है.’
‘अरे! यानी आपके गांव से भी कोई बच्चा चोरी हो चुका है?’
‘ना ना, हम पर तो भगवान की मेहरबानी रही अब तक. लेकिन अगले गांव घोड़ी-बछेड़ा से दो बालक चोरी हो गए… आपने ना पढ़ा अख़बार में? एक बच्चा चोर पकड़ा भी गया है.’
‘कहां, उसी गांव में?’
‘ना, ना! वहां ना.’
‘फिर?’
‘रतलाम (मध्यप्रदेश) में.’
‘उसने चुराए थे घोड़ी-बछेड़ा के बच्चे?’
‘ना, उसने तो कहीं और के चुराए थे.’
‘कहां के?’
‘जे तो ना पता हमें!’

घोड़ी-बछेड़ा गांव

‘सुना है आपके गांव से बच्चे चोरी हो गए हैं कुछ दिन पहले!’
‘ना भाईसाहब, हमारे यहां से तो ना हुए.’
‘लेकिन पिछले गांव में तो यही चर्चा है.’
‘ग़लत बता दिया भाईसाहब. वो हमारे नहीं; बगल के गांव की बात है. लेकिन वो चोर तो पकड़ में आ गया भाईसाहब.’
‘कहां?’
‘औरंगाबाद, बुलंदशहर (उत्तरप्रदेश) में.’
‘बच्चे मिल गए उसके पास.’
‘जे तो ना पता भाईसाहब. आप उस गांव में चले जाओ, वहीं मिल जाएगी सारी जानकारी.’

फ़िर एक और अगला गांव और उससे भी अगला गांव. इस तरह हमने सेक्टरों की शक्ल ले चुके इस क्षेत्र के करीब दर्जन भर गांव छान मारे. इन सभी में एक ही रामकहानी का जोर था - बच्चे चोरी तो हुए हैं, लेकिन उनके नहीं बल्कि आस-पड़ोस के किसी गांव के. और चोर पकड़े तो गए, लेकिन वहां नहीं किसी दूर शहर में. जबकि स्थानीय पुलिस इलाके में ऐसी किसी भी घटना के होने से इनकार कर रही है. साफ है कि इस क्षेत्र में बच्चा चोरी से जुड़ी बातें अफ़वाह से ज्यादा कुछ नहीं है.

लेकिन हमारी पड़ताल में इन अफ़वाहों से जुड़ा एक बेहद अजीब लेकिन दिलचस्प पहलू भी सामने आया. थोड़ी देर घुलने-मिलने के बाद कुछ स्थानीय लोगों का कहना था कि बच्चे उठवाने के पीछे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का हाथ है. शुरु में हमने इसे बस एक मजाक समझा. लेकिन ऐसा कहने वाले कई लोग काफी गंभीरता से अपनी बात पर अड़े रहे. ग्रेटर नोएडा की एक रेजिडेंशियल सोसायटी में छाड़ू-पौंछा करने वाली जानकी (बदला हुआ नाम) भी इन लोगों में से एक थीं. जब हमने जानकी से ‘आपको कैसे पता?’ जोर देकर पूछा तो झल्लाए से अंदाज़ में जवाब मिला, ‘सारी दुनिया में हल्ला है...’ अपनी बात के पक्ष में जानकी ने सहजता से तर्क दिया कि यदि मोदी जी बच्चे न चुरवा रहे होते तो क्या अब तक चोर पकड़ न लिए जाते!

ऐसी ही एक दूसरी रेजिडेंशियल सोसायटी में गार्ड का काम करने वाले सुरेश जानकी से सहमति तो जताते ही हैं, अपनी तरफ़ से नई बात भी जोड़ देते हैं. वे कहते हैं, ‘कुछ दिन पहले यहां से 70 बच्चों से भरी एक पूरी बस का अपहरण हो गया.’ ज़ाहिर तौर पर उन्हें इस बात का अहसास ही नहीं था कि एक साथ 70 बच्चों का गायब होना कितनी बड़ी घटना हो सकती है! लेकिन सुरेश का यह दावा उस चर्चा के आगे कुछ भी नहीं जिससे हमारा पाला अभी पड़ना बाकी था.

जब हमने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को बच्चा चोर बताने वालों से यह पूछा कि भला वे किसी का बच्चे क्यों चुरवाने लगे, तो कुछ लोगों की दलील थी कि वे अपहृत बच्चों के गुर्दों को बिकवाते हैं. वहीं बैठे रामसिंह (बदला हुआ नाम) ने तो बड़े आत्मविश्वास के साथ जवाब दिया ‘बच्चों की किडनी बीस हजार रुपए में बिकती है.’ उनकी यह बात सुनकर उनके ही एक साथी बड़े ख़फ़ा हो गए. उनका कहना था, ‘मोदी जी काहे चुरवाने लगे बच्चा, सच कहिए न कि योगी (आदित्यनाथ) जी का हाथ है इसके पीछे.’

ऐसा नहीं था कि क्षेत्र के सभी लोग मोदी और योगी के विरोधी थे. अगले चौराहे पर जब हमने इस बारे में पड़ताल करना चाही तो एक सज्जन ने आस-पास झांक कर हमें जवाब दिया, ‘भाईसाहब, बुरा मत मानना. लेकिन ये सब कारस्तानी मायावती के लोगों की है. चुनावों में मायावती को मुंह की खानी पड़ी इसलिए ऐसी अफ़वाहें फैलवाकर भारतीय जनता पार्टी को बदनाम करना चाहती हैं.’ ये सज्जन यहीं नहीं रुके, नया शगूफ़ा छोड़ते हुए उन्होंने कहा, ‘ये भी हो सकता है कि ये सब किया-धरा समाजवादी पार्टी के लोगों का हो. बच्चे वे उठवा रहे हों और नाम मोदी और योगी जी का लगा रहे हों.’

हम अफ़वाहों के दौर को एक बार फ़िर लोगों के जेहन पर वैसे ही हावी होते देख रहे थे जैसे कि मंकीमैन के जमाने से लेकर चोटीकटवा और मुंहनोचवा के वक़्त देखा गया था. लेकिन इस बार सोशल मीडिया की अभूतपूर्व रफ़्तार और भूमिका ने बच्चा चोरी से जुड़ी अफ़वाहों को कहीं ज्यादा तेज और ख़तरनाक बना दिया. बीते कुछ दिनों में ही देश के अलग-अलग हिस्सों से आई ख़बरें इस बात की पुष्टि करती हैं.

रिपोर्ट के दौरान ऐसा ही एक वीडियो हमारे सामने भी आया जिसमें बच्चा चोरी के शक में एक महिला की बुरी तरह पिटाई की जा रही थी. इस वीडियो को हमारे सामने सिर्फ़ इसलिए पेश किया गया ताकि हम क्षेत्र में बच्चा चोरों की उपस्थिति से जुड़े दावों पर यकीन कर सकें. वीडियो के साथ एक मैसेज भी था. इसके मुताबिक यह घटना सेक्टर-37 की थी. संयोग से हमारी मुलाकात जल्द ही उस परिवार से हो गई जिसके बच्चे के अपहरण की कोशिश का इल्ज़ाम पिटने वाली औरत के सर पर था. बच्चे की मां कुसुम ने बताया कि वह महिला उसके बच्चे को बिस्किट खिलाकर साथ ले जाने की कोशिश कर रही थी. हालांकि कुसुम ने वीडियो दिखाने के बावजूद उस महिला के साथ किसी तरह की मारपीट से इनकार करते हुए उसे पुलिस को सौंप दिए जाने की बात कही.

स्थानीय चौकी इंचार्ज नसीम अहमद ने बताया कि पिटने वाली महिला ‘केतरी’ मानसिक रूप से कमज़ोर है और वह सहज मानवीय स्वभाव के चलते बच्चों को बिस्किट खिलाने की कोशिश कर रही थी जो शायह उसे भीख में मिले थे. अहमद के मुताबिक केतरी उससे पूछी जाने वाली हर बात को दोहराती है. जैसे उससे जब यह पूछा गया कि - बच्चे चोरी किए तो इस पर उसका जवाब था ‘बच्चे चोरी किए.’ पूछा गया कि ‘कितने बच्चे चोरी किए’, जवाब भी यही मिला ‘कितने बच्चे चोरी किए’. किसी ने केतरी से कहा, ‘तीन बच्चे चोरी किए’ उसने भी दोहरा दिया, ‘तीन बच्चे चोरी किए’. बकौल अहमद, ‘चौकी पर लाए जाने के बाद भी केतरी को जो भी बच्चा नज़र आ रहा था वह उसे भी बिस्किट खिलाने की कोशिश कर रही थी. मेडिकल जांच के बाद उसे नारी निकेतन भेज दिया गया.’

लेकिन इस पूरे घटनाक्रम में पुलिस की भी एक बड़ी चूक सामने आई. दरअसल उसी दिन केतरी को बच्चा चोरी के संदेह में पास के ऐच्छर गांव में भी बुरी तरह पीटा गया था. जहां उसे स्थानीय युवकों ने बड़ी मुश्किल से भीड़ से बचाया था. उन युवकों में से एक नकुल भाटी का कहना था कि भीड़ को समझाने-बुझाने के बाद उन्होंने केतरी को पुलिस को सौंप दिया था. यदि कुसुम और नकुल भाटी की बात मानें तो केतरी को पुलिस दो बार अपने साथ लेकर गई. लेकिन पुलिस के अनुसार केतरी एक ही बार चौकी पहुंची थी. यानी उसे पहली दफा बिना किसी कार्रवाही के ही छोड़ दिया गया था. इस तरह पुलिस की लापरवाही और लोगों की संवेदनहीनता के चलते एक लाचार की एक दिन में दो-दो बार जान पर बन आई थी. कुसुम की तरह पुलिस ने भी वीडियो मौजूद होने के बाद भी केतरी के साथ किसी भी तरह की मारपीट से इनकार कर दिया.

जानकारों का क्या कहना है

वरिष्ठ समाज शास्त्री राजीव गुप्ता कहते हैं, ‘जिस तरह राष्ट्रीय स्तर पर मूल मुद्दों को छिपाने के लिए तरह-तरह की युक्तियों का सहारा लिया जाता है. उसी तरह नगर और जिला स्तर पर अवाम को भटकाने के लिए ऐसी अफ़वाहों का इस्तेमाल होता है. इस तरह भय के मनोविज्ञान द्वारा लोगों के असंतोष को कब किसके खिलाफ आक्रामकता में बदल दिया जाता है, पता नहीं चल पाता.’

राजीव गुप्ता बात आगे बढ़ाते हैं, ‘आम लोगों द्वारा बच्चा चोरी के लिए बड़े नेताओं को जिम्मेदार ठहराना राज्य की असफलता या राज्य के प्रति बढ़ते अविश्वास का संकेत है. लोग ऐसी बातें तभी करते हैं जब वे मानने लगें कि राज्य उनके बच्चों की सुरक्षा करने में नाकाम है. आम तौर पर इस तरह की असुरक्षा का भाव निचले तबकों या फ़िर ग्रामीण क्षेत्रों में ज्यादा देखने को मिलता है. इसका एक कारण पुलिस की संख्या में कमी तो है ही, लेकिन इसके लिए पुलिस की घटती संवेदनशीलता को भी नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता है.’

सामाजिक संगठन ‘रिहाई मंच’ के सचिव राजीव यादव का मानना है कि हमारे अंदर जो नस्लीय भेद की प्रवृत्ति मजबूती से मौजूद है वो किसी भी मैले-कुचैले, काले या गंदे इंसान में एक अपराधी को तलाशती है और मौका मिलते ही इस तरह की घटनाओं का कारण बनती है. लखनऊ से ताल्लुक रखने वाले यादव इन घटनाओं को लेकर शासन-प्रशासन को भी आड़े हाथ लेते हैं. यादव के शब्दों में, ‘लॉ कमीशन ने मॉब लिंचिंग के ख़िलाफ़ कड़े कानून बनाने की बात कही है ताकि भीड़ की शक्ल में हमला करने वाले लोगों के ख़िलाफ़ कार्रवाही हो और इस तरह की वारदातों पर काबू पाया जा सके. लेकिन उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों की सरकारें मॉब लिंचिंग जैसी घटनाओं के अस्तित्व को ही स्वीकारने को तैयार नहीं है.’

वहीं, साइबर सिक्योरिटी एक्सपर्ट आयुष भारद्वाज इस तरह की अफ़वाहों से जुड़ी कुछ तकनीकी वजहों की तरफ़ भी हमारा ध्यान ले जाते हैं. ‘आमतौर पर इस तरह के मैसेज वायरल करने के पीछे एक या दो व्यक्ति न होकर पूरे-पूरे समूह काम करते हैं. इनका एक ही उद्देश्य होता है- अंटेशन सीकिंग कंटेट की मदद से ज्यादा से ज्यादा फॉलोअर बढ़ाना. यह बढ़ी हुई व्युअरशिप सीधे तौर पर उनकी कमाई का ज़रिया तो बनती ही है, साथ ही किसी खास विचारधारा या राजनैतिक/ग़ैर राजनैतिक संगठनों के प्रोपेगेंडा को फैलाने में भी बड़ी भूमिका निभाती है. इस काम के एवज़ में मोटी धनराशि वसूली जाती है’ बात को तफसील से समझाते हुए भारद्वाज कहते हैं, ‘अक्सर इस तरह के संदेशों की तफ्तीश करने पर पता चलता है कि इनकी शुरुआत किसी विशेष क़ौम, वर्ग या धर्म के ख़िलाफ़ नफ़रत फैलाने से होती है. कई बार यह भी देखने को मिलता है कि ज़रूरत पड़ने पर एक ही मैसेज को अलग-अलग समुदायों के ख़िलाफ़ इस्तेमाल किया जाता है.’

बकौल आयुष, ‘इस तरह के संदेश फेक या ट्रोल अकाउंट के ज़रिए फैलाए जाते हैं. चूंकि भारत में अभी सोशल साइट पर अकाउंट बनाने के लिए किसी तरह के वेरिफिकेशन की ज़रूरत नहीं होती है इसलिए इस तरह के काम करने वाले लोग एक साथ दस-दस/बीस-बीस अकाउंट को ऑपरेट करते हैं. इन पर काबू पाने का पहला प्रभावी तरीका तो यही हो सकता है कि किसी भी सोशल साइट पर अकाउंट बनाने से पहले केवाईसी की तर्ज़ पर डॉक्यूमेंट वेरिफिकेशन अनिवार्य कर दिया जाए. इसके अलावा इस तरह की तकनीक का इस्तेमाल किया जा सकता है जो एनक्रिप्टेड सोशल साइट्स या एप पर भी आपत्तिजनक शब्दों के बार-बार इस्तेमाल करने वालों की पहचान कर सके.’