बीते महीने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने देश से भ्रष्टाचार को उखाड़ फेंकने का आह्वान किया था. ठीक उसी दिन प्रधानमंत्री के निर्वाचन क्षेत्र - वाराणसी - में पीडब्ल्यूडी के चीफ इंजीनियर अंबिका सिंह के कक्ष में एक ठेकेदार ने खुद को गोली मारकर आत्महत्या कर ली. ठेकेदार अवधेश श्रीवास्तव की कार से पुलिस को जो छह पन्नों का सूसाइड नोट मिला उसमें कई इंजीनियरों पर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लगाने के साथ चार करोड़ के बकाए का भुगतान न होने के कारण आत्महत्या करने की बात की गई है. आत्महत्या करने से पहले ठेकेदार ने चीफ इंजीनियर से बकाया भुगतान का अनुरोध किया था लेकिन प्रताड़ित और अपमानित किए जाने पर उसने वहीं आत्महत्या कर ली. सूसाइड नोट में अवधेश श्रीवास्तव ने लिखा था, ‘पीडब्ल्यूडी के अफसरों के शोषण के कारण आर्थिक तंगी के दौर में पत्नी के गहने गिरवी रखकर भी काम करता रहा लेकिन अब हिम्मत टूट गई है. इसलिए आत्महत्या कर रहा हूं. मौत की जिम्मेदारी पीडब्ल्यूडी के अधिकारियों की है.’

इस नोट में अवधेश ने आरोप लगाए हैं कि उन पर बार-बार ड्रॉइंग और नक्शे बदलने और ज्यादा कमीशन के लिए दबाव बनाया जाता था. किये गए कार्य के बारे में मुख्यमंत्री के चाणक्य ऐप पर जानकारी अपलोड न करने और ब्लेकलिस्ट कर देने की धमकी देकर प्रताड़ित किया जाता था. इस नोट में यह भी आरोप लगाया गया है कि आप्रवासी भारतीय सम्मेलन, जिलाधिकारी आवास और सर्किट हाऊस के निर्माण कार्य के लिए उन्हें पांच करोड़ का भुगतान भी नहीं करवाया जा रहा था. अपने सूसाइड नोट में श्रीवास्तव ने चीफ इंजीनियर के अलावा सहायक अभियंता आशुतोष सिंह और अवर अभियन्ता मनोज कुमार सिंह पर भी कई गंभीर आरोप लगाए हैं.

इस घटना के ठीक एक दिन पहले लखनऊ में लोकभवन (मुख्यमंत्री सचिवालय) और विधान भवन के सामने एक अन्य ठेकेदार - वीरेन्द्र कुमार रस्तोगी - ने खुद पर केरोसिन डालकर आत्महत्या करने का प्रयास किया था. लेकिन वहां पर पर्याप्त पुलिस बल के मौजूद होने से उन्हें अधजली हालत में बचा लिया गया. सीतापुर के ठेकेदार रस्तोगी का मामला भी अभियन्ताओं के भ्रष्टाचार से ही जुड़ा हुआ है. उनका आरोप है कि उन्होंने निर्माण निगम से मथुरा में शटरिंग का ठेका लिया था. लेकिन रिश्वत न दे पाने के कारण उन्हें 40 लाख रुपयों का भुगतान नहीं किया जा रहा है. इस मामले की जानकारी मुख्यमंत्री से लेकर तमाम बड़े अधिकारियों को दी जा चुकी है, मगर कोई सुनवाई नहीं हो रही. ऐसे में मजबूर होकर उन्हें लखनऊ आकर आत्मदाह करना पड़ रहा है. वीरेन्द्र कुमार ने 21 अगस्त को मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को पत्र लिखकर आत्मदाह करने की सूचना भी दे दी थी. पत्र में उन्होंने लिखा था कि, ‘5 अगस्त को निर्माण निगम ने भुगतान के लिए 15 दिन का समय मांगा था. वह समय भी पूरा हो चुका है, मगर भुगतान की कोई बात नहीं हुई. अतः अब वह 27 अगस्त को लखनऊ में विधान भवन के सामने आत्मदाह करेगा. इसकी पूरी जिम्मेदारी शासन व राजकीय निर्माण निगम की होगी.’

इन दोनों ही घटनाओं के बाद संबंधित विभागों में खलबली बच गई है. रूके हुए भुगतान के लिए आनन-फानन में फाइलें दौड़ने लगी हैं और अधिकारी अपनी गर्दन बचाने के लिए दूसरों पर जिम्मेदारियां डालने लग गए हैं. सीतापुर वाले मामले में जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ विभागीय कार्रवाई भी शुरू हो गई है और वाराणसी वाले मामले में एक दर्जन से ज्यादा अधिकारियों व कर्मचारियों को निलंबित किया जा चुका है. अवधेश श्रीवास्तव की आत्महत्या के मामले में आठ लोगों के विरूद्ध एफआईआर की गई है. इनमें से कई लोगों को गिरफ्तार भी किया जा चुका है और मामले की उच्च स्तरीय शासकीय जांच भी शुरू हो गई है.

लेकिन उत्तर प्रदेश के सरकारी विभागों में ठेकेदारी से जुड़े भ्रष्टाचार के सिर्फ ये दो ही मामले नहीं हैं. इसी वर्ष मार्च में पीडब्ल्यूडी के एक ठेकेदार राजेन्द्र यादव ने उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य के नाम पर धन वसूले जाने का आरोप लगाकर सनसनी फैला दी थी. दरअसल राजेन्द्र यादव ने एक अवर अभियंता का अपहरण कर लिया था. यादव का कहना था कि इस अभियंता ने काम दिलवाने के लिए केशव प्रसाद मौर्य के नाम पर उससे 20 लाख रूपये वसूल किए थे. इस मामले में राजेन्द्र यादव और अभियन्ता पंकज यादव के खिलाफ तो मुकदमा चल रहा है लेकिन केशव प्रसाद मौर्य का नाम रिश्वतखोरी में क्यों आया इस पर कोई भी जांच तक नहीं बिठाई गई. इसी वर्ष मार्च में लखनऊ में ठेकेदारों ने भ्रष्टाचार के खिलाफ पीडब्ल्यूडी मुख्यालय पर प्रदर्शन भी किया था.

उत्तर प्रदेश में योगी सरकार आने के बाद उसने भ्रष्टाचार के खिलाफ जीरो टालरेंस की नीति की घोषणा की थी. इसके चलते अखिलेश सरकार में भ्रष्टाचार के पर्याय बन चुके राज्य के सिंचाई, स्वास्थ्य और लोक निर्माण जैसे विभागों में ई-टेंडरिंग प्रणाली की शुरूआत की गई. मंत्रियों को भी भ्रष्टाचार पर नकेल कसने के लिए हिदायतें दी गईं. लेकिन सूबे में भ्रष्ट तंत्र की जड़ें इतनी गहरी हो चुकी हैं कि हाल ही में उत्तर प्रदेश के जिन मंत्रियों के इस्तीफे लिए गए और जिनके महत्वपूर्ण विभाग छीने गए उन सभी पर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लगे थे.

अपनी ईमानदारी के लिए चर्चित उत्तर प्रदेश के पूर्व आईएएस अधिकारी सूर्य प्रताप सिंह कहते हैं, ‘उत्तर प्रदेश सरकार की समस्या यह है कि यहां ज्यादातर मंत्रियों के पास शासन चलाने का अनुभव है ही नहीं. मुख्यमंत्री ने पद संभालने से पहले अपने संसदीय क्षेत्र से बाहर कोई काम नहीं किया था और दोनों उपमुख्यमंत्रियों की स्थिति इससे भी बदतर है. दूसरी ओर सूबे के अधिकारियों और अभियन्ताओं ने पिछली दो सरकारों में जिस तरह भ्रष्टाचार की बहती गंगा में हाथ धोए हैं, उनके लिए अब ‘नमामि गंगे’ की शरण में स्वच्छ हो पाना उतना ही असम्भव है जितना खुद गंगा का स्वच्छ हो पाना. इसलिए उन्होने उत्तर प्रदेश सरकार की कमजोर कड़ियों को अपने रंग में रंग लिया है.’

सूर्य प्रताप सिंह की इस दलील की पुष्टि इस बात से होती है कि योगी सरकार के जिन मंत्रियों पर भ्रष्टाचार की शिकायतों के मामले में गाज गिरी उनमें से ज्यादातर शिक्षा, स्वास्थ्य और सिंचाई विभाग जैसे महकमों से जुड़े थे. उत्तर प्रदेश में पीडब्लूडी के अलावा यही तीन विभाग भ्रष्टाचार के सिरमौर माने जाते हैं.

सरकार ने ई-टेंडरिंग की जो व्यवस्था की थी उस पर भी भ्रष्ट तंत्र और ठेकेदार-इंजीनियरों के गठजोड़ ने पार पा लिया है. उत्तर प्रदेश के राज्यपाल के पूर्व सलाहकार और नैतिक पार्टी के अध्यक्ष सीबी पाण्डेय के मुताबिक, ‘सरकार की तमाम कोशिशों के बावजूद ठेकेदारी से जुड़े कार्यो में ठेकेदारों और अधिकारियों के बीच कट और कमीशन का खेल बदस्तूर फल-फूल रहा है. यह काॅकस इतना मजबूत हो चुका है कि इसने ई-टेंडरिंग का भी तोड़ निकाल लिया है. पहले तो इस व्यवस्था को लागू ही नहीं होने दिया गया और जब यह लागू हुई तो भ्रष्ट तंत्र की सहूलियत के लिए दो बार ई टेंडरिंग की सीमा को आगे बढ़ा दिया गया. अब पांच लाख तक के कार्य बिना ई-टेंडरिंग के करवाए जा सकते हैं. ऐसे में भ्रष्टाचारियों की सुविधा के लिए बड़े कार्यो को छोटे-छोटे टुकड़ों में बाॅट दिया जाता है.’

बताया जाता है कि उत्तर प्रदेश में होने वाले सरकारी कामों में कमीशन खोरी अब 50 फीसदी तक पहुंच चुकी है. कई मामलों में तो यह 65 फीसदी भी होती है. यही वजह है कि अब कई ठेकेदार भी इससे आजिज़ आ गये हैं. नाम न जाहिर होने की शर्त पर एक बड़े ठेकेदार आरोप लगाते हैं कि ‘यहां ई-टेंडरिंग प्रणाली भी पारदर्शी और बेदाग नहीं है. अधिकारी अपने चहेतों को काम देने के लिए तरह-तरह के हथकंडे अपनाते हैं. ई-टेंडर प्रक्रिया को बार-बार रद्द किया जाता है. उसमें ऐसी शर्तें जोड़ी जाती हैं जिन्हें अधिकारियों का चहेता ठेकेदार ही पूरा कर सकता हो. और ज्यादातर भुगतान इसीलिए रोके जाते हैं कि इंजीनियरों को उनकी मनचाहा रिश्वत नही मिल पाती.’

वाराणसी की घटना के बाद सिर्फ प्रधानमंत्री के निर्वाचन क्षेत्र में ही सौ से अधिक ठेकेदारों के भुगतान रोके जाने के मामले सामने आए हैं. यहां 30 करोड़ के भुगतान तीन वर्ष से भी अधिक समय से लंबित पड़े हैं. जनवरी में हुए प्रवासी भारतीय सम्मेलन में आनन-फानन में कराए गए कार्यों में से भी कइयों का भुगतान अब तक नहीं हुआ है. इसी तरह प्रयाग कुम्भ के लिए आकस्मिक तौर पर कराए गए 12 करोड़ से अधिक के कार्यों के लिए ठेकेदार सिंचाई विभाग के मंत्री से लेकर शासन तक गुहार लगा चुके हैं. उधर सड़क निर्माण और बिजली विभाग के भुगतानों के लिए तो ठेकेदार वाराणसी से लेकर लखनऊ तक के चक्कर लगाते ही रहते हैं.

ऐसे में उत्तर प्रदेश के अनेक ठेकेदार अब कमीशन खोरी के खिलाफ मुखर भी होने लगे हैं. वाराणसी के एक ठेकेदार उदय वर्मा कहते हैं, ‘प्रवासी भारतीय दिवस में उनकी फर्म ने 35 लाख का काम किया था. कमीशन की दर तय न हो पाने से उनका भुगतान अब तक नहीं हुआ है. ज्यादा दबाव बनाने पर रजिस्ट्रेशन रद्द कराने की धमकी दी जाती है.’

ठेकेदारों के इस तरह के आरोपों की सफाई में उत्तर प्रदेश डिप्लोमा इंजीनियर्स संघ के अध्यक्ष हरि किशोर तिवारी दलील देते हैं कि जो काम ऊपर के दबाव में बिना टेंडर के करवाए जाते हैं, उनके भुगतान में बाद में कई दिक्कतें आती हैं. वे बताते हैं कि ‘जल्दबाजी में तय हुए वीआईपी आयोजनों में कई काम ऐसे होते हैं जिनके लिए समय की कमी के कारण सही प्रक्रियाओं का पालन करना संभव नहीं होता ऐसे में अभियंता या अधिकारी बाद में भुगतान के आश्वासन पर काम तो करवा लेते हैं लेकिन इनके भुगतान में दिक्कतें आ जाती हैं.’

कारण चाहे जो भी हों लेकिन यह साफ है कि यूपी में ठेकेदारी का भ्रष्टाचार चरम सीमा पर है, वाराणसी की घटना ने इस कड़वे सच को बेनकाब तो किया है मगर योगी सरकार इस पर कितना ध्यान देखी यह देखना अभी बाकी है.