निर्देशक: नितेश तिवारी

कलाकार: सुशांत सिंह राजपूत, श्रद्धा कपूर, वरुण शर्मा, तुषार पांडेय, ताहिर राज भसीन, नवीन पोलिशेट्टी

रेटिंग: 3/5

हर साल मई-जून के महीने में बोर्ड्स और इंजीनियरिंग एंट्रेस एग्जाम्स का रिजल्ट आने के बाद छात्रों के आत्महत्या करने की खबरें आती हैं. हिंदुस्तान जैसे देश में जहां अशिक्षा पहले ही इतनी बड़ी समस्या है, जिन छात्रों तक पढ़ाई-लिखाई पहुंच रही है, उनमें से भी कुछ का आत्महत्या कर लेना और भी डराने वाला है. आंकड़े बताते हैं कि भारत में हर घंटे एक छात्र आत्महत्या करता है. ‘छिछोरे’ इस भयावहता को अपना हिस्सा बनाती है और उसके बहाने सफलता-असफलता की बजाय जीवन को गंभीरता से लेने का वजनदार किस्सा कह जाती है.

फिल्म की कहानी एक टीनएज बच्चे राघव के सूसाइड अटेम्प्ट से शुरू होती है जो उसे आईसीयू में पहुंचा देता है. राघव के इलाज के दौरान उसके तलाकशुदा मां-बाप और उनके बिछड़े दोस्त आपस में मिलते हैं. यहां से कहानी दो समांतर हिस्सों - वर्तमान और फ्लैशबैक - में बंट जाती है. आज वाले हिस्से में फिल्म राघव की मेडिकल कंडीशन के उतार-चढ़ाव दिखाती है. और कल वाले हिस्से में उसके मां-बाप की कॉलेज लाइफ के जरिए वह बंपर मनोरंजन पेश करती है. हालांकि इन दोनों हिस्सों के सीक्वेंस आपस में सिंक किए गए हैं, इसलिए एक के आने पर दूसरे का थोड़ा-थोड़ा अंदाजा हो जाता है लेकिन इसके बाद भी मजे में कोई कमी नहीं आती है.

‘छिछोरे’ की कहानी के बैकग्राउंड में इंजीनियरिंग कॉलेज होने के चलते फिल्म में बहुत सारी ऐसी बातें, हरकतें और संबोधन शामिल हैं जिन्हें किसी और जगह पर सही ठहरा पाना मुश्किल होता. मसलन, किरदारों के नाम सेक्सा, मम्मी, बेवड़ा सरीखे अजीबो-गरीब रखे गए हैं. और पूरी फिल्म के दौरान सेक्स और ‘चड्डी’ जोक्स की भरमार रहती है. ‘छिछोरे’ में कॉलेज और हॉस्टल लाइफ से जुड़ी तमाम ऐसी बाते हैं जिनमें से कुछ राज़ बनकर हमेशा दोस्तों के बीच रह जाती हैं और कुछ बाद में ‘अपने जमाने में तो हम...’ मार्का किस्सों में इस्तेमाल होती हैं. और इन्हें दिखाने के तरीके में वह ‘थ्री ईडियट्स’ को बहुत पीछे छोड़ देती है.

अभिनय की बात करें तो छिछोरे में कॉलेज बॉय बनकर सुशांत सिंह राजपूत कहर ढाते लगते हैं. रंगीन पोलो शर्ट्स में, साढ़े चार इंची स्माइल के साथ, वे घर से इंजीनियर बनने आए राजा बेटे की छवि बेहतरीन तरीके से परदे पर उतारते हैं. दूसरी तरफ, स्टाइलिश सूट और सॉल्ट एंड पेपर लुक के साथ अपने पापा वर्जन में भी वे भरोसेमंद लगते हैं. उनके अलावा फिल्म में सेक्सा बने वरुण शर्मा हमारा सबसे ज्यादा ध्यान खींचते हैं. शर्मा ने इस बार भी दिल्ली वाले पंजाबी का रोल किया है लेकिन अच्छा यह है कि इस बार वे अपनी पिछली फिल्मों से पैदा हुई शिकायतें दूर करने की कोशिश करते दिखे हैं.

‘छिछोरे’ गैंग की एकमात्र फीमेल सदस्य श्रद्धा कपूर भी कॉलेज की बबली गर्ल से लेकर ग्रेसफुल-ग्लैमरस मम्मी बनकर अच्छी लगती हैं. और वे फिल्म में खटकने वाला भी कुछ नहीं करतीं. यही शायद फिल्म को उनकी तरफ से दिया गया सबसे बड़ा योगदान है. उनके अलावा तुषार पांडेय, ताहिर राज भसीन, सहर्ष शुक्ला और नवीन पोलिशेट्टी ने भी अपने अभिनय से ‘छिछोरे’ को उसका जरूरी छिछोरापन दिया है. लेकिन वरुण शर्मा के अलावा इन सभी का अभिनय उनके स्टूडेंट वर्जन में ज्यादा एनर्जेटिक और मनोरंजक है, जबकि शर्मा ने कमाल करते हुए अपनी ‘सेक्सानेस’ पूरी फिल्म में मेंटेन करके रखी है. फिल्म का सरप्राइज एलीमेंट प्रतीक बब्बर हैं और वे फिल्म में क्या करते हैं, यह आप सिनेमाहॉल जाकर ही जानें तो बेहतर है.

फिल्म की खामियों की बात करें तो यहां पर मेडिकल टर्म्स और सीक्वेंसेज का सटीक न होना बुरी तरह खटकता है. इसके अलावा किरदारों के अधेड़ वर्जन में उनका मेकअप और प्रोस्थेटिक्स बिलकुल भरोसेमंद नहीं लगते हैं. यहां पर हर किरदार को गंजा देखकर आप इस हास्यास्पद नतीजे पर पहुंच सकते हैं कि उम्र बढ़ने के साथ केवल बाल झड़ते हैं और बाल तो झड़ते ही हैं. वहीं, श्रद्धा कपूर के मामले में तो कपड़ों के अलावा उम्र दूसरा रत्ती भर भी फर्क नहीं डालती है. फिल्म के बाकी पक्षों की बात करें तो लोकेशन्स विश्वसनीय और सिनेमैटोग्राफी अच्छी कही जा सकती है. संवाद इतने मजेदार हैं कि बाद में याद आने पर भी हंसी आती है. और सबसे अनोखी और अच्छी बात है कि गानों की सिचुएशन कतई फिल्मी नहीं है.

कुछ हद तक ‘स्टूडेंट्स ऑफ द इयर’ और बहुत हद तक ‘जो जीता वही सिकंदर’ सरीखे मिज़ाज को पकड़ती नितेश तिवारी निर्देशित ‘छिछोरे’ - बॉलीवुड की छाप बन चुका - जबर्दस्ती का आदर्शवाद नहीं झाड़ती है. इसके उलट, यह सच और इम्पर्फेक्शन को बेहद करीब से दिखाकर, बड़ी सफाई से याद दिलाती है कि कामयाबी केवल शब्दकोश में कोशिश के पहले आती है. और फिर धीरे से फुसफुसाती है कि कभी बाद में भी नहीं आई तो भी कोई बात नहीं!