मुंबई के किशनचंद चेलाराम महाविद्यालय ने 30-31 अगस्त 2019 को दो दिनों का एक परिसंवाद आयोजित किया जिसका विषय था - ‘क्या महात्मा गांधी संभव हैं? उद्घाटन प्रो. सामधोंग रिनपोचे ने किया. बीजवक्तव्य डॉ. आशीष नंदी का था. एक सत्र संस्कृति पर था, जिसमें गणेश देवी, मल्लिका साराभाई, अपूर्वानंद और मैंने भाग लिया. इस सत्र का विचार-विषय था- ‘संस्कृति के विचारों से फिर जुड़ाव’.

इधर कुछ ऐसी आदत सी पड़ गयी है जब संस्कृति पर कहीं भी बोलना हो तो शुरूआत में हमारे यहां उसके एकवचन नहीं बहुवचन होने पर इसरार से करता हूं. इससे कई बार ऐसा भ्रम भी हो सकता है कि इस बहुलता के लिए हिंदू धर्म प्रमुख रूप से श्रेय ले सकता है. यह भ्रम इसलिए है कि इससे हिंदू धर्म की बुनियादी बहुलता का एक मिथक बन जाता है जो फिर यह मानने लगता है कि हिंदू धर्म बुनियादी रूप से उदार और सर्वसमावेशी है. इन दिनों हिंदुत्व के नाम पर हिंदुओं का एक बड़ा वर्ग जो हत्या-हिंसा-बलात्कार-घृणा का माहौल बना रहा है और उससे असहमत हिंदू तक उसे चुपचाप देखकर होने दे रहे हैं, यह साक्ष्य तथाकथित हिंदू उदारता और सहिष्णुता की असलियत समझने के लिए काफ़ी है.

गांधी-दृष्टि से विचार करें तो संस्कृति में, दृष्टि और आचरण दोनों में, बहुलता का स्वीकार अनिवार्य है. यह नहीं कि मतभेद या असमानताएं नहीं हैं. यही कि उन्हें संवाद, समझ और परस्पर सद्भाव से समझा और उनसे निपटा जा सकता है. हमारी संस्कृति में, उसकी विचार-परंपरा में असहमति, संवाद और विवाद की जगह रही है जो आज ख़त्म की जा रही है, वह लोकतंत्र के नाम पर असल में बहुसंख्यकतावाद की हेकड़ी से. गांधी-दृष्टि बहुत सारे द्वैतों के ध्वंस का आधार भी बनती है. याद करें गांधी ने कहा था कि ‘मैं अच्छा हिंदू हूं, इसलिए अच्छा मुसलमान, अच्छा क्रिस्तान (ईसाई) आदि भी हूं’. गांधी-दृष्टि धर्मों के बीच लोकतांत्रिकता और समकक्षता का आग्रह करती है. हमारे प्रायः सभी धर्मों ने लोकतंत्र में सत्तर वर्ष बिताने के बाद भी स्वतंत्रता-समता-न्याय के मूल्य न समझे हैं, न उन्हें अमल में लाने की कोशिश की है. पहले भी एकाधिक बार मैंने लिखा-कहा है कि हमारे धर्म लोकतंत्र से पिछड़ गये धर्म हैं.

हमारे सार्वजनिक जीवन में भद्रता, परस्पर सद्भाव और आदर, असहमति की जगह बराबर घटती जा रही है. गांधी-दृष्टि आज भद्रता और गरिमा के पुनर्वास पर बल देगी. इन दिनों तो कई बार लगता है कि सिविल सोसायटी तो है पर सिविल होना लगातार भूल-चूक रही है. बड़ी संख्या में तथाकथित भक्त सामाजिक व्यवहार और संवाद में किसी तरह की भी सौम्‍यता बाहर कर रहे हैं.

आज ऐसा कोई क्षेत्र नहीं बचा है जहां झूठ और पाखंड का बोलबाला न हो. गांधी-दृष्टि की एक मांग यह होगी कि हर व्यक्ति जो झूठ को पहचानता है और जिसे सच का आभास है वह अपने स्तर पर, एक व्यक्ति का सही, नागरिक सत्याग्रह करे. अगर ऐसे सत्याग्रही नागरिक अकेले होकर भी बढ़ते गये तो फिर एक बड़ा सत्याग्रही समुदाय बन सकता है.

गांधी की निजी संस्कृति के दो और गुण आज हमारे काम आ सकते हैं. पहला बकबक और बेवजह संसद, टेलीविजन, त्यौहारों आदि में जो भयानक कनफ़ोड़ शोर होता रहता है उसके बरक़्स हमें जब-तब मौन बरतना चाहिये. पर कायर चुप्पीवाला नहीं, दहाड़वाला मौन. दूसरे, हम अकेले रहना-करना लगभग भूल चले हैं. गांधी अकेले होने या पड़ जाने से कभी नहीं घबराये. हमें अपनी संस्कृति में फिर एकांत वापस लाना चाहिये.

सभी वक्ताओं ने जिनमें अनेक मूर्धन्य विशेषज्ञ शामिल थे कहा कि गांधी सम्भव है, एक व्यक्ति के रूप में नहीं पर विचार और आचरण के रूप में. यही नहीं कि वे इस तरह संभावना हैं बल्कि उनकी संभावना आज पहले से कहीं अधिक ज़रूरी और तात्कालिक हो गयी है.

ख़तरनाक ज्ञान

पहले ख़बर आयी कि माननीय जज महोदय ने टाल्स्टाय के महान उपन्यास ‘वार एंड पीस’ को ख़तरनाक या आपत्तिजनक बताते हुए अभियुक्त के पास वह होने पर प्रकारान्तर से उस पर आपत्ति की है. फिर खुलासा आया कि उन्होंने अभियुक्त से इस महान उपन्यास नहीं उससे मिलते-जुलते शीर्षकवाली एक पुस्तक का जि़क्र किया है. वे टाल्स्टाय के महान उपन्यास के बारे में जानते हैं. उन्होंने किसी अन्य पुस्तक का जि़क्र किया था जिसके शीर्षक में भी टाल्स्टाय के उपन्यास के शीर्षक का प्रयोग है. पर यह स्पष्टीकरण अभी बाक़ी है कि जिस पुस्तक का जि़क्र जज महोदय ने किया अगर वह प्रतिबंधित पुस्तक नहीं है तो उसका रखना आपत्तिजनक कैसे हो सकता है. पिछले कुछ बरसों में विशेषज्ञतः तथाकथित देशद्रोह आदि के मामलों में अभियुक्तों के पास कुछ विशेष पुस्तकों के होने को उनके आपराधिक होने के साक्ष्य के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है. अगर इस संकीर्ण दृष्टि को हावी होने दिया जाये और उसे क़ानून में उपयुक्त माना जाने लगे तो हमारे अधिकांश गौरवग्रंथ आपत्तिजनक होने की कोटि में आ जायेंगे. ऐसा ज्ञान और सृजन से डरनेवाला राष्ट्र ही कर सकता है- एक आत्मविश्वस्त और ज्ञानसम्पन्न, भारतीय परंपरा से परिचित, राष्ट्र नहीं.

ज्ञान की बढ़ती अवज्ञा, ज्ञान और साहित्य के बढ़ते अपमान का यह नया मुक़ाम है कि जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय के प्रशासन ने अपनी एक एमेरिटस प्रोफ़ेसर विश्वविद्यालय और समादृत इतिहासकार डाॅ. रोमिला थापर से उनका जीवनकार्य वृत्त मांगा है. ऐसा इसलिए कि विश्वविद्यालय की एक विशेषज्ञ समिति यह तय कर सके कि उन्हें उस पर आगे रहने दिया जाये या नहीं. सारे प्रशासन थोड़े तो अज्ञानी होते हैं पर एक विश्वविद्यालय का प्रशासन स्वयं अपने यहां दशकों कार्यरत विदुषी का कार्यवृत्त नहीं जानता यह दयनीय और हास्यास्पद एक साथ है. वह वृत्त इंटरनेट पर भी सुलभ है. एक अत्यन्त सम्मानित और वयोवृद्ध विदुषी से ऐसी मांग करना अज्ञान द्वारा सत्ता-मद में ज्ञान का अपमान करना है. जो जेएनयू में रोमिला थापर के अवदान से परिचित नहीं उसे वहां कुलपति और कुलसचिव होना तो दूर, चपरासी होने का भी हक़ नहीं है.

जो हो रहा है वह निरे अज्ञानवश नहीं हो रहा है. इस अपमान के पीछे सुनियोजन है. यह एक संकीर्ण विचारधारा को, सत्ता के माध्यम से, विश्वविद्यालय जैसे मुक्त और स्वतंत्रचेता संस्थान पर लादने की कोशिश है. ज्ञान अपमानित या दंडित होकर बाहर चला जाये ताकि ऐसी संकीर्णता का आक्रामक राज्य स्थापित हो जाये. ऐसा न हो पाये इसका नागरिक प्रयत्न होना ज़रूरी है.

अरे, अब और नहीं

स्नेहमयी चौधरी साठ के दशक से काफ़ी देर बाद तक हिन्दी कविता के परिवेश और अनेक समानधर्माओं के बीच सक्रिय रहीं. उनकी भौतिक उपस्थिति की तरह उनकी काव्य-उपस्थिति भी हमेशा सौम्य रही. उनकी एक छोटी सी कविता उनका आत्मवृत्तान्त ही है- ‘फिर उसने अस्तित्व को नकारा और दूसरों में घुलमिल गयी.’ यह दूसरों में घुलना-मिलना उनकी कविता का स्वभाव रहा. उनके यहां मर्म और विवेक कविता में इसी रसायन से उपजते थे. अगर सिर्फ़ उनकी कविताओं के शीर्षकों को ही एक बार पढ़ लें, तो हमारे आसपास की अपार छवियां और यादें ताज़ा हो आती हैं. अंदर-बाहर, खड़-खड़, कुचलन, धकापेल, दिन भर, आवाज़, बकबक, राख, बिल्ली, प्रतीक्षा, हड़बड़ी, स्कूल की बस, पल्ले, मलबा, चमक, धमाका, चाल. रज़ा फ़ाउंडेशन के सहयोग से संभावना प्रकाशन द्वारा प्रकाशित मरणोत्तर संग्रह से दो कविताएं-

कर न सकें

जब अलमारी में चूहा घुस जाय

और कपड़ों को काटता रहे

आप कुछ न कर सकें....

दूसरी अलमारी में किताबें ऊटपटांग पड़ी हों

आप तरतीबवार न कर सकें...

केवल सुनते रहें, ताकते रहें

और लकड़ी के सहारे टुकुर-टुकुर चलते रहें, बस.

एक दिन

जब सब तलवारें भांजते हुए उठ खड़े होंगे

तब गले मिलेंगे?

या काटेंगे....

यह मालूम नहीं.

स्नेहमयी जी का देहावसान 2017 में उनके पति अजित कुमार के निधन के कुछ दिनों बाद हुआ था.