देश के अर्थ जगत से इस समय हर तरफ आर्थिक सुस्ती की खबरें आ रही हैं. हर तरफ मंदी से निपटने के उपाय और देश में खपत का स्तर बढ़ाने के उपायों की चर्चा है. सस्ते कर्ज से लेकर सरकारी निवेश बढ़ाकर मंदी से निपटने की जुगत बिठायी जा रही है. चुनाव के बाद शानदार बहुमत के साथ दोबारा सत्ता में आई मोदी सरकार बजट में उद्योग जगत और बड़े निवेशकों पर थोड़ी सख्त दिखी और सुपर रिच टैक्स जैसे प्रावधान आयद किए गए. मंदी की बढ़ती चर्चा के साथ उसने ऐसी घोषणाओं को करीब-करीब वापस ले लिया है. लेकिन, सरकार के प्रयास फिलहाल ज्यादा रंग लाते नहीं दिख रहे हैं. 2019 के अप्रैल-जून की तिमाही में आर्थिक विकास की दर सिर्फ पांच फीसद रही है जो पिछले छह सालों में सबसे कम है.

यह तो मौजूदा आर्थिक हालात हैं, जिनकी आशंका चुनावों से पहले ही जताई जा रही थी. चुनाव से पहले ही ऑटोमोबाइल से लेकर उपभोक्ता वस्तुओं की खपत गिरने की खबरें आने लगीं थीं. तभी विश्लेषक कहने लगे थे कि आने वाली नई सरकार को आर्थिक मोर्चे पर काफी तकलीफों का सामना करना पड़ेगा. लेकिन, आम चुनाव की खबरों के बीच अर्थ जगत की खबरें मद्धम पड़ गईं और पूरा माहौल राजनीतिमय हो गया.

अर्थव्यवस्था के मंदी में घिरने की खबरें चुनाव बाद तेजी से आनी शुरु हुईं. सवाल यह उठता है कि क्या अगर देश में आम चुनाव न होते तो आर्थिक आंकड़े थोड़े और निराशाजनक होते? यह सवाल इसलिए उठता है क्योंकि भारत के आम चुनावों को दुनिया में सबसे महंगा चुनाव माना जाता है और कहा जाता है कि चुनावों के समय अर्थव्यवस्था में पैसे का प्रवाह काफी बढ़ जाता है.

तो क्या अगर देश में चुनाव न होते तो मंदी के हालात अभी से ज्यादा गहरे होते? चुनावों को लेकर सामान्य धारणा यह है कि हर चुनाव महंगाई लाता है और आखिरकार इसका प्रभाव आम जनता पर ही पड़ता है. बहुत से आर्थिक जानकार भी मानते हैं कि चुनाव में हुआ मोटा खर्च लंबी अवधि में अर्थव्यवस्था को कोई खास लाभ नहीं पहुंचाता है. लेकिन, आर्थिक जानकार इस बात पर भी एकमत हैं कि एक निश्चित अवधि में रोजगार और खपत के लिहाज से चुनाव में होने वाला खर्च महत्वपूर्ण होता है. यह एक तरह से अर्थव्यवस्था के लिए ‘बूस्टर शॉट’ का काम करता है.

अगर 2019 के लोकसभा चुनावों पर खर्च की बात करी जाए तो सेंटर फॉर मीडिया स्टडीज के मुताबिक, 2019 के लोकसभा चुनावों में पचास हजार करोड़ से ज्यादा का खर्च हुआ है. यह 2014 के लोकसभा चुनावों से करीब 40 फीसदी ज्यादा है. हालांकि कुछ जानकार इसे 60 हजार करोड़ रुपयों से ज्यादा बताते हैं. जाहिर है कि चुनावों पर खर्च हुई इतनी मोटी रकम के आर्थिक प्रवाह में आने पर अर्थव्यवस्था को कुछ न कुछ रफ्तार तो मिली ही होगी.

निवेश सलाहकार पंकज गोयल कहते हैं, ‘चुनावों में खर्च होने वाली 50 से 60 हजार करोड़ की रकम का महत्व आप इस बात से समझ सकते हैं कि सरकार मंदी से निपटने के लिए सरकारी बैंकों के री-कैपटिलाइजेशन के लिए 70 हजार करोड़ रूपये खर्च करने जा रही है. जाहिर है कि जिस तिमाही में चुनाव हुए उसके आर्थिक वृद्धि के आंकड़ों में इस पैसे का भी योगदान होगा.’

एक राष्ट्रीय राजनीतिक दल के सोशल मीडिया प्रभाग से जुड़े एक नेता अपना नाम न छापने की शर्त पर कहते हैं कि भारत में चुनाव जिस तरह से लड़े जाते हैं, उसमें पैसा खर्च होने के साथ यह भी महत्वपूर्ण होता है कि उसका वितरण किस प्रकार होता है. वे उदाहरण देकर समझाते हैं कि ‘मान लीजिए किसी प्रभावशाली ग्राम प्रधान या जिला पंचायत सदस्य को चुनाव के दौरान पांच लाख रूपये दिए जाते हैं तो उन पैसों का प्रवाह ट्रिकल डाउन थ्योरी (ऊपर से नीचे की ओर ) के तहत होता है. यानी कि इस पैसे का एक हिस्सा भले ही प्रभावशाली आदमी रख ले, लेकिन इसका कुछ न कुछ हिस्सा नकद, भोज या शराब के रूप में लोगों तक पहुंचता ही है. यानी अगर एक संसदीय क्षेत्र का भी उदाहरण लें तो कहा जा सकता है कि चुनावों के दौरान उस क्षेत्र की आर्थिक गतिविधियों में थोड़ी तेजी आ जाती है.’

भारतीय चुनावों पर अध्ययन करने वाले राजनीति विज्ञान के शोधार्थी अमित चौरासिया कहते हैं कि अगर फिलहाल मंदी की वजहों पर गौर किया जाए तो साफ दिखता है कि इसकी बड़ी वजह ग्रामीण क्षेत्रों से मांग का काफी कम होना है. ‘आम चुनावों में खर्च होने वाली मोटी रकम का एक बड़ा हिस्सा ग्रामीण संसदीय क्षेत्रों में शराब और नगदी बांटने जैसी चीजों में खर्च किया जाता है. ऐसे में कहा जा सकता है कि चुनावों के दौरान ग्रामीण इलाकों में मांग और खपत की स्थिति थोड़ी सुधरी होगी. लेकिन यह एक बहुत ‘अस्थायी प्रवृत्ति’ है क्योंकि इससे रोजगार या खपत का कोई स्थायी चक्र नहीं शुरु होता.’ हालांकि अमित यह भी मानते हैं कि चुनाव के दौरान किसानों को लुभाने के लिए गन्ना या अन्य भुगतान करने में थोड़ी तेजी दिखाई जाती है, जिससे एक फौरी वक्त के लिए किसानों की क्रय शक्ति में इजाफा हो जाता है. इस लिहाज से चुनाव ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए थोडे मददगार हो जाते हैं.

अवध विश्वविद्यालय के अर्थशास्त्र के रिटायर्ड प्रोफेसर एनसी त्रिपाठी कहते हैं कि भारतीय चुनावों में खर्च होने वाली 50 से 60 हजार करोड़ की रकम अस्थायी तौर पर रोजगार और खपत तेज करती है, इससे किसी को इन्कार नहीं हो सकता है. वे आगे कहते हैं कि उम्मीदवारों और राजनीतिक दलों द्वारा खर्च के अलावा चुनावी साल में अंतरिम बजट में भी लोकोपकोरी योजनाओं या अन्य मदों में सरकारी खर्च बढ़ा दिया जाता है जो अंततः आर्थिक गति को थोड़ी रफ्तार देता ही है.

इस लिहाज से देखें तो एक अनुमान के मुताबिक, मोदी सरकार ने अपने अंतरिम बजट में 1.8 लाख करोड़ की ऐसी योजनाओं की घोषणा की जिन्हें लोकोपकोरी कहा जा सकता है. इनमें किसानों को सीधे नकद मदद करने वाली पीएम किसान योजना भी थी. इसका बजट 72 हजार करोड़ रूपये था. इस मोर्चे पर सरकार इतनी मुस्तैद थी कि चुनावों से पहले ही दो हजार की दो किश्तें किसानों के खाते में पहुंचा दी गई थीं. विश्लेषक भी मानते हैं कि ग्रामीण संकट से जूझ रही अर्थव्यवस्था में इन पैसों ने खपत को कुछ न कुछ तो बढ़ाया ही होगा.

केंद्र सरकार के अलावा राज्य सरकारों ने भी चुनाव के मद्देनजर लोकोपकोरी योजनाओं में अपने खर्च बढ़ाए और वे भी आर्थिक सुस्ती की हालत में कुछ न कुछ मददगार तो हुए ही होंगे. लेकिन फिर भी चुनावी धूमधाम शुरु होने के बाद की दो तिमाहियों पर गौर किया जाए तो आर्थिक वृद्धि की हालत बहुत संतोषजनक नहीं दिखती. 2019 की जनवरी-मार्च की तिमाही में आर्थिक वृद्धि दर घटकर 5.8 फीसद पर आ गई और अप्रैल से जून की तिमाही में यह और घटकर पांच फीसद पर आ गई. जबकि 2018 की आखिरी तिमाही में यह 6.8 फीसद थी.

यानी कि भारतीय चुनावों में राजनीतिक दलों द्वारा मोटी धनराशि खर्च किए जाने और सरकारी खर्च बढ़ने के बाद भी आर्थिक रफ्तार संतोषजनक गति नहीं पकड़ सकी. इसका एक मतलब यह भी निकाला जा सकता है कि अगर चुनाव नहीं होते तो 2019 की पहली दोनों तिमाहियों के आर्थिक वृद्धि के आंकड़े इससे भी ज्यादा निराशाजनक हो सकते थे.

आर्थिक जानकार मानते हैं कि चुनाव के दबाव में जो सरकारी खर्च बढ़ाया जाता है उसका अर्थव्यवस्था पर असर कुछ अलग तरीके से पड़ता है. अगर सरकार चुनाव के समय एक बड़ी रकम खर्च कर देती है तो जाहिर है कि आगे आने वाले समय में उसकी खर्च करने की क्षमता घटती है और वह राजस्व की कमी और राजकोषीय घाटे जैसी चुनौतियों से जूझती है. इस स्थिति को दीर्घकालिक लिहाज से ठीक नहीं माना जाता है.

विश्लेषकों का मानना है कि चुनाव के दौरान हुआ खर्च अर्थव्यवस्था के लिए किसी ‘एनर्जी ड्रिंक’ जैसा होता है जो तात्कालिक राहत देता है. यानी कि इससे जो राहत मिलनी थी मिल चुकी है और उसके बाद हमारी अर्थव्यवस्था की गति पांच फीसद है. अब अगर अर्थव्यवस्था में स्थायी सुधार चाहिए तो उसे ‘संतुलित आहार’ दिये जाने की जरूरत है.