जर्मनी के विभाजन का प्रतीक रही बर्लिन दीवार को गिरे इस साल नवंबर में 30 वर्ष हो जायेंगे. दीवार बनायी थी भूतपूर्व पूर्वी जर्मनी की कम्युनिस्ट सरकार ने. वह नहीं चाहती थी कि उसके नागरिक पश्चिम जर्मनी के तड़क-भड़क वाले जीवन का सुख पाने के लालच में वहां पलायन कर जायें. नौ नवंबर 1989 के दिन ठीक यही हुआ. कह सकते हैं कि पूर्वी जर्मनी की जनता के ही धक्के से उस दिन बर्लिन दीवार गिर गयी. हज़ारों लोग पैदल या कारों में पश्चिम की ओर दौड़ पड़े. एक ऐसी अपूर्व अहिंसक जनक्रांति हो गयी, जिसने चार दशकों से विभाजित देश को एक कर दिया.

लेकिन, उस आकस्मिक एकीकरण के ठीक तीन दशक बाद ऐसा लग रहा है कि जर्मनी के भूतपूर्व पूर्वी और पश्चिमी भागों के बीच की उस पुरानी दीवार की जगह अब एक नयी दरार ले रही है. यह दरार है राजनैतिक सोच-समझ की. विचारधारा की. अपनी राष्ट्रीय पहचान को बनाये रखने के तौर-तरीकों की. जर्मनी के जिस पूर्वी भाग की जनता कम्युनिस्टों की तानाशाही तले कराहा करती थी, उसका एक बहुत बड़ा भाग अब नस्लवादी घोर-दक्षिणपंथ को सराहने लगा है.

जर्मनी की सबसे बड़ी पार्टियों के लिए सिरदर्द बनी एएफ़डी

बर्लिन की दीवार गिरने के बाद भूतपूर्व पूर्वी जर्मनी को भंग कर दिया गया था. उस भूभाग पर पांच नये राज्य बने. इन पांचों राज्यों में जब भी विधानसभा चुनाव होते हैं, पिछले कुछ वर्षों से यही देखने में आता है कि जर्मन जाति की शुद्धता को बनाये रखने पर जोर देने वाली पार्टी - ‘एएफ़डी’ (अल्टरनाटीवे फ़्युअर डोएचलांड/जर्मनी के लिए विकल्प) - को मिलने वाले वोटों का अनुपात वहां बढ़ता ही जा रहा है.

बीती एक सितंबर को भी यही हुआ. उस दिन पूर्वी जर्मनी के दो राज्यों सैक्सनी और ब्रान्डेनबुर्ग में विधानसभा चुनाव थे. इस बार इन राज्यों के परिणाम ऐसे रहे कि जर्मनी की केंद्र सरकार में सत्तारूढ़ देश की दोनों सबसे बड़ी पार्टियों सीडीयू (क्रिश्चन डेमोक्रैटिक यूनियन) तथा एसपीडी (सोशल डेमोक्रैटिक पार्टी) की नाक कटने से बाल-बाल बची. दोनों के वोट इस बुरी तरह घटे कि एएफ़डी इन दोनों राज्यों में पहली बार दूसरी सबसे बड़ी पार्टी बन कर उभरी.

जर्मन चांसलर अंगेला मेर्कल की पार्टी सीडीयू को सैक्सनी में अब तक के सबसे कम केवल 21.4 प्रतिशत वोट मिले. दूसरे नंबर पर रही एएफ़डी का अनुपात 18.6 प्रतिशत मत रहा. बर्लिन की केद्र सरकार में शामिल एसपीडी भी ब्रान्डेनबुर्ग में जैसे-तैसे 16.1 प्रतिशत वोट जुटा सकी, जबकि वहां भी दूसरे नंबर पर रही एएफ़डी को 14.4 प्रतिशत मतदाताओं का समर्थन मिला.

जर्मनी के एकीकरण के बाद पूर्वी जर्मन राज्यों में भूतपूर्व कम्युनिस्टों के वामदल ‘दी लिंके’ को भी अच्छा जनसमर्थन मिला करता था. किंतु इस बार सैक्सनी में उसे सिर्फ 6.9 प्रतिशत और ब्रान्डेनबुर्ग में 6.6 प्रतिशत ही वोट मिले. दोनों राज्यों में मतदान का अनुपात 60 प्रतिशत से अधिक था.

‘एएफ़डी’ जर्मनी की सभी पार्टियां के लिए अछूत के समान है. इसलिए दोनों में से किसी भी राज्य में वह इस बार भी अपनी सरकार नहीं बना पायेगी. किंतु यह तो मानना ही पड़ेगा कि सरकार चाहे जिस किसी गठबंधन की बने, ‘एएफ़डी’ को मिल रहे जनसमर्थन की अनदेखी करना किसी के लिए संभव नहीं होगा. अक्टूबर के अंत में पूर्वी जर्मनी के एक और राज्य थ्युरिंगिया में भी विधानसभा चुनाव हैं. वहां भी लगभग यही ऐसा ही देखने में आ सकता है.

अपने ही देश में विदेशी बन जाने का डर

ऐसा नहीं है कि जातीय शुद्धता की पैरोकार ‘एएफ़डी’ केवल पूर्वी जर्मन राज्यों के मतदाताओं को ही लुभावनी लगती है. जर्मनी के पश्चिमी राज्यों में भी उसकी लोकप्रियता बढ़ रही है. जर्मनी ही नहीं, पूर्वी और पश्चिमी यूरोप के लगभग सभी देशों में दक्षिणपंथी राष्ट्रवादी या नस्लवादी पार्टियां भारी चुनौती बनती जा रही हैं.

ऐसी पार्टियों की बढ़ती हुई लोकप्रियता का मुख्य कारण इन देशों की सरकारों द्वारा चलाई जा रही उदार आप्रवासी और शरणार्थी नीतियां हैं. सही या ग़लत, इन देशों की मूल जनता को लगने लगा है कि वह अपने ही देश में विदेशी बनती जा रही है. इसके चलते उसकी अपनी सांस्कृतिक पहचान, शारीरिक और आर्थिक सुरक्षा संकट में पड़ सकती है. ‘एएफ़डी’ जैसी पार्टियां असुरक्षा-भाव की इस आग में घी डालती हैं.

यह स्वीकार करने के बदले, कि जर्मनी दक्षिणपंथी संकीर्णता की ओर फिसल रहा है, अपने आप को उच्च लोकतांत्रिक आदर्शों का रक्षक समझने वाले कथित प्रगतिशील नेता अब भी यही जुगाली कर रहे हैं कि पूर्वी जर्मनों ने ‘एएफ़डी’ को बहुमत नहीं दिया है. अभी बहुमत नहीं दिया है, तो इसका यह मतलब तो नहीं हुआ कि कभी बहुमत नहीं देंगे. इसे रोका कैसे जाये, यह लंबे समय से किसी की समझ में नहीं आ रहा है. इस संभावना को भी गंभीरता से नहीं लिया जाता कि पूर्वी जर्मनी के ये रुझान पूरे जर्मनी के रुझान भी बन सकते हैं.

मन नहीं हो रहा एक

पूर्वी जर्मन राज्यों में मतदान का ढर्रा यह भी दिखाता है कि एकीकीकरण के 30 वर्ष बाद भी जर्मनी के दोनों भागों के लोगों की सोच-समझ में, उनके ज्ञानबोध में एकरूपता नहीं है. अधिकांश पूर्वी जर्मनों को ऐसा प्रतीत होता है, मानों 1989 तक के उनके इतिहास में पश्चिम जर्मनों की कोई रुचि नहीं है. उचित या अनुचित, अधिकतर पूर्वी जर्मन यह भी मानते हैं कि पश्चिम जर्मन उन्हें अपने से हेठा समझते हैं.

एएफ़डी पार्टी के कई बड़े नेता पूर्वी जर्मनी के ही निवासी हैं. माना जाता है कि पूर्वी जर्मन उन्हें व्यापक समर्थन देकर पश्चिम जर्मनों के प्रति अपने मन की भड़ास भी निकालते हैं. पश्चिम जर्मनों को शिकायत है कि हम 30 वर्षों से पूर्वी जर्मनी में नवनिर्माण द्वारा उसे पश्चिम के बराबर लाने में पैसा झोंक रहे हैं. एक अलग ‘एकजुटता टैक्स’ दे रहे हैं. और वे हैं कि कोई आभार मानने के बदले मुंह बिचकाते हैं.

तन तो एक हो गया है, पर मन अभी भी एक नहीं हो पाया है. जर्मन एकीकरण के इस उदाहरण में उन लोगों के लिए भी एक संदेश देखा जा सकता है, जो भारत या पाकिस्तान की छत्रछाया में या पूरी तरह एक अलग देश के रूप में कश्मीर के एकीकरण के सपने देखते हैं. जर्मनी तो केवल चार दशकों तक ही विभाजित था. 30 साल से एक तन हो कर भी एक मन नहीं हो पा रहा है. कश्मीर तो सात दशकों से बंटा हुआ है. दोनों भाग जर्मनी जैसी आर्थिक-तकनीकी प्रगति से भी मीलों दूर हैं. कौन लायेगा बराबरी. कौन जोड़ेगा मनों को.