अफगानिस्तान में शांति को लेकर अमेरिका और तालिबान में हो रही बातचीत पर पूर्णविराम लगता दिख रहा है. राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा है कि इस आतंकी संगठन के साथ लंबे समय से चल रही बातचीत बिना किसी नतीजे पर पहुंचे खत्म हो गई है. इस बातचीत का अंत अफगानिस्तान से अमेरिकी सैनिकों की वापसी के साथ होना था. डोनाल्ड ट्रंप कहा, ‘जहां तक मेरा सवाल है, वो (बातचीत) दफन हो चुकी है.’

बीते रविवार को भी डोनाल्ड ट्रंप ने कहा था कि उन्होंने तालिबान के साथ चल रही शांति वार्ता रोक दी है. उन्होंने बीते हफ्ते अफगानिस्तान की राजधानी काबुल में तालिबान द्वारा किए गए एक हमले को इसकी वजह बताया था. इस हमले में एक अमेरिकी सैनिक सहित 12 लोगों की मौत हो गई थी. अमेरिका की ओर से राजनयिक जलमय खलीलजाद अभी तक तालिबान के साथ नौ दौर की वार्ता कर चुके हैं. लेकिन डोनाल्ड ट्रंप की इस घोषणा के बाद साल भर से जारी इस वार्ता पर विराम लगता दिखाई दे रहा है. बीते महीने यह वार्ता एक समझौते पर भी पहुंच गयी थी जिसकी घोषणा जल्द ही होने वाली थी.

भले ही डोनाल्ड ट्रंप तालिबान के साथ चल रही वार्ता रोकने के पीछे की वजह काबुल में पिछले सप्ताह हुए हमले को बता रहे हों, लेकिन उनका यह तर्क अधिकांश लोगों के गले नहीं उतर रहा है. इसकी वजह यह है कि अमेरिका पिछले एक साल से तालिबान से बात कर रहा है और इस दौरान तालिबान के हमलों में कई अमेरिकी सैनिक और राजनयिक भी मारे गए. एक रिपोर्ट के मुताबिक इस साल अब तक तालिबान के हमले में 16 अमेरिकी सैनिक अपनी जान गंवा चुके हैं. बीते महीने ही एक हमले में नाटो और अमेरिका के कई अधिकारियों की मौत हुई थी. जानकार सवाल उठाते हुए कहते हैं कि जब साल भर से अमेरिकी सैनिक तालिबान के हमले में मारे जा रहे थे तब अमेरिका ने पहले इस संगठन से बातचीत क्यों नहीं रोकी? ऐसे में अब अचानक डोनाल्ड ट्रंप का वार्ता को रोकना समझ से परे है.

कुछ अमेरिकी जानकार डोनाल्ड ट्रंप द्वारा शांति वार्ता रोकने के पीछे की असल वजह भी बताते हैं. ये लोग कहते हैं कि साल भर से चल रही बातचीत के बाद अमेरिका और तालिबान के बीच जो शुरुआती समझौता हुआ है, वही इसकी सबसे बड़ी वजह है. इस समझौते की जो बातें सामने आई हैं उनके तहत अमेरिका अगले 16 महीने में अफगानिस्तान से अपनी पूरी फ़ौज यानी सभी 14,000 सैनिकों को वापस बुला लेगा. इसके बदले तालिबान ने उससे वादा किया है कि वह कभी भी अफगानिस्तान में अलकायदा जैसे आतंकी संगठनों को शरण नहीं देगा और सभी अमेरिकी सैनिकों के निकलने के बाद अफगानिस्तान की सरकार से देश के राजनीतिक भविष्य को लेकर बातचीत शुरू करेगा. इस समझौते में यह भी कहा गया है कि अमेरिका शुरुआती 135 दिनों के अंदर अफगानिस्तान से अपने 5,400 सैनिकों को निकालेगा और वहां के अपने पांच सैन्य अड्डों को बंद करेगा.

जानकारों की मानें तो अमेरिका और तालिबान के बीच हुए इस समझौते ने सबसे ज्यादा परेशानी अफगानिस्तान सरकार के सामने खड़ी कर दी है. तालिबान का कहना है कि वह अफगानिस्तान की सरकार से तभी बात करेगा जब पूरी अमेरिकी फ़ौज अफगानिस्तान छोड़ देगी. अफगान सरकार अमेरिका के समर्थन से ही चल रही है और देश के हिस्सों में जो भी थोड़ा-बहुत उसका कब्जा है वह भी अमेरिकी फ़ौज की वजह से ही है. ऐसे में उसे डर है कि अमेरिकी फ़ौज के जाने के बाद तालिबान उससे शांति वार्ता नहीं करेगा. अफगानिस्तान की सत्ताधारी पार्टी का मानना है कि जितनी तेजी से यह संगठन अफगानिस्तान पर अपनी पकड़ मजबूत करता जा रहा है, उसे देखते हुए इसे सरकार से समझौते की जरूरत ही नहीं पड़ेगी. यानी तालिबान वहां की सरकार को अपनी ताक़त के दम पर हटा देगा.

बीते हफ्ते जब अमेरिकी राजनयिक जलमय खलीलजाद इस समझौते को लेकर अफगानिस्तान के राष्ट्रपति अशरफ गनी से मिले तो गनी ने साफ़ कहा कि वे इस समझौते से सहमत नहीं हैं. असल में उन्हें नहीं लगता कि अमेरिकी सैनिकों की विदाई के बाद तालिबान अपने वादे को पूरा करेगा.

इस बैठक के बाद अशरफ गनी के रणनीतिक सलाहकार वहीद उमर ने मीडिया से बातचीत में कहा, ‘हम बहुत अधिक चिंतित हैं, न केवल सरकार के लिए बल्कि अफगानिस्तान के लोगों के लिए भी, अफगानिस्तान के लोगों को पहले भी यह सांप काट चुका है....वे जल्दबाजी में किए गए समझौतों का नतीजा भुगत चुके हैं जिनमें उनकी आवाज नहीं सुनी गयी थी.’ वहीद उमर के मुताबिक अफगान सरकार इस समझौते के बेहतर परिणामों को लेकर आश्वस्त नहीं है. सरकार का मानना है कि इस समझौते पर अभी और विचार एवं बहस की जरूरत है.

अफगानिस्तान सरकार के अधिकारियों ने न्यूयॉर्क टाइम्स को यह भी बताया कि अमेरिका ने तालिबान से बातचीत के दौरान जल्द ही अफगानिस्तान की जेलों से तालिबानी आतंकियों को छोड़ने की बात की है. इसके लिए राष्ट्रपति अशरफ गनी तैयार नहीं हैं. गनी ने अमेरिका से कहा है कि वे ऐसा तभी करेंगे जब तालिबान व्यापक संघर्ष विराम पर सहमत होगा.

जानकार कहते हैं कि अफगानिस्तान की सरकार द्वारा समझौते को पूरी तरह से ख़ारिज किया जाना पहली बड़ी वजह थी जिसके चलते डोनाल्ड ट्रंप को तालिबान और अफगानिस्तान के राष्ट्रपति के साथ कैम्प डेविड में होने वाली बैठकों को रद्द करना पड़ा और शांति वार्ता फिलहाल के लिए रोकनी पड़ी.

यहां पर ध्यान देने वाली एक बात यह भी है कि डोनाल्ड ट्रंप के बातचीत रद्द करने की घोषणा से कुछ घंटे पहले अमेरिका की सरकारी न्यूज़ एजेंसी रेफरल ने अशरफ गनी की अमेरिका यात्रा रद्द होने की खबर प्रकाशित की थी. रेफरल को अफगानिस्तान के एक कैबिनेट मंत्री ने नाम न छापने की शर्त पर यह भी बताया था कि अमेरिका ने तालिबान से हुए समझौते पर अफगान सरकार के विरोध को देखते हुए अशरफ गनी का अमेरिकी दौरा फिलहाल के लिए रद्द कर दिया है. अफगानिस्तान के राष्ट्रपति को इसी दौरे पर कैंप डेविड में तालिबान से इतर डोनाल्ड ट्रंप के साथ मुलाकत करनी थी.

इसके अलावा अमेरिका के अंदर से भी डोनाल्ड ट्रंप पर समझौते से पीछे हटने का दबाव पड़ा. अमेरिकी विदेश मंत्रालय के नौ पूर्व उच्चपदस्थ अधिकारियों ने अमेरिकी राष्ट्रपति को जल्दबाजी में किए जा रहे इस समझौते से बचने की सलाह दी. इन सभी ने संयुक्त रूप से लिखे एक पत्र में कहा, ‘पहले तो (इस समझौते में) यह स्पष्ट नहीं है कि अफगानिस्तान में शांति कैसे आएगी. तालिबान ने उन शर्तों को लेकर कुछ भी साफ़ नहीं कहा है जिनके तहत वह आगे जाकर अपने अफगान साथियों (अन्य राजनीतिक दलों) के साथ शांति समझौता करेगा. तालिबान का अन्य राजनीतिक दलों के साथ काम करने (या सत्ता साझा) का कोई ट्रैक रिकॉर्ड भी नहीं है.’ इन लोगों ने पत्र में चेतावनी देते हुए यह भी लिखा कि अगर अमेरिका इतनी जल्दी अफगानिस्तान से बाहर आएगा और इसके बाद अगर अफगानिस्तान के राजनीतिक दलों और तालिबान के बीच कोई सहमति नहीं बनी तो वहां गृह युद्ध होना निश्चित है.

कुछ जानकार यह भी बताते हैं कि केवल अफगान सरकार ही नहीं अमेरिकी कांग्रेस और रिपब्लिकन पार्टी के कई सदस्य भी इस समझौते के पक्ष में नहीं थे. इन लोगों का कहना था कि अगर अमेरिका अपने समर्थन से चल रही अफगानिस्तान की सरकार को इस तरह बीच मंझधार में छोड़ता है तो आगे कोई भी देश उस पर भरोसा नहीं करेगा. इससे अमेरिका की साख को भारी नुकसान होगा.

जानकार कहते हैं कि ऐसी प्रतिक्रियाओं से भी डोनाल्ड ट्रंप को यह समझ में आया कि इस मामले में और बातचीत की जरुरत है और अभी इस समझौते को हरी झंडी दिखाना सही नहीं होगा. साल भर बाद ही अमेरिका में राष्ट्रपति चुनाव होने हैं. डोनाल्ड ट्रंप अच्छे से जानते हैं कि अगर अमेरिका के अफगानिस्तान से निकलने के बाद वहां गृह युद्ध शुरू हो गया तो इसका जिम्मेदार उन्हें ही ठहराया जाएगा. और इसका खामियाजा उन्हें राष्ट्रपति चुनाव में उठाना पड़ सकता है.