जम्मू-कश्मीर को विशेष दर्जा देने वाले संविधान के अनुछेद 370 को हटे एक महीने से ज़्यादा वक़्त बीत गया है. जहां राज्य के कुछ हिस्से, जैसे जम्मू शहर, अब सामान्य होते दिखाई दे रहे हैं, वहीं कश्मीर घाटी में तनाव अभी भी वैसा ही है जैसा इसे हटाये जाने के तुरंत बाद था. मोबाइल फोन, इंटरनेट और हजारों लोग यहां अभी भी बंद हैं और घाटी के अलग-अलग हिस्सों से प्रदर्शनों की खबरें भी लगातार ही आ रही हैं.
हालांकि सरकार ने कर्फ्यू में थोड़ी नरमी बरती है और लैंडलाइन फोन चालू कर दिये हैं. लेकिन इसके बावजूद कश्मीर में समान्य जीवन ठप्प पड़ा हुआ है और सरकार की तरफ से बरती जाने वाली नरमी का ज़मीन पर कोई असर होता दिखाई नहीं दे रहा है.
सरकार ने स्कूल, कॉलेज, दफ्तर खोल देने का ऐलान कर दिया है, लेकिन इनमें लोगों की उपस्थिति न के बराबर है. बाकी, दुकानें यहां अभी भी बंद हैं, कारोबार ठप्प पड़े हुए हैं और सड़कों पर ट्रेफिक के नाम पर सिर्फ कुछ निजी गाडियां ही चलती दिखाई देती हैं.
ऐसे में सवाल यह पैदा होता है कि आगे क्या? सत्याग्रह ने पिछले 15 दिन से कश्मीर घाटी के कई इलाकों में घूमकर लोगों और जानकारों से बात करके इस एक सवाल का जवाब खोजने की काफी कोशिश की, लेकिन इसका कोई संतोषजनक जवाब उसे नहीं मिल पाया है.
दक्षिण कश्मीर के एक वकील, आसिफ अहमद, के शब्दों में बात कही जाये तो, ‘कश्मीर घाटी, जहां दशकों से अनिश्चितता एक सामान्य नियम है, इतनी ढुलमुल कभी नहीं थी.’
आसिफ कहते हैं कि शायद ही कोई इस समय यह अनुमान लगा सकता है कि आगे क्या होने वाला है और ‘मैं दावे के साथ कह सकता हूं कि प्रशासन भी आम लोगों जितना ही बेखबर है.’
उनकी इस बात की पुष्टि पुलिस के एक बड़े अधिकारी भी करते हैं. केंद्रीय कश्मीर में तैनात ये पुलिस अधिकारी कहते हैं कि वे हालात को दैनिक आधार पर देख रहे हैं और जो करने की ज़रूरत होती है वह कर देते हैं.
‘मेंने अपनी पूरी नौकरी में कश्मीर में इतनी अनिश्चितता कभी नहीं देखी है’ अपना नाम गोपनीय रखने की शर्त पर ये पुलिस अधिकारी सत्याग्रह को बताते हैं.
अब दूसरा सवाल यह है कि ऐसा है तो क्यों है? लोगों से बात करके इस चीज़ के कई पहलू सामने आते हैं.
कश्मीर में उतने विरोध प्रदर्शन नहीं हुए
‘इस बार के प्रदर्शन 2016 में बुरहान वानी के मारे जाने के बाद हुए प्रदर्शनों से दस गुना ज़्यादा हो सकते हैं.’ सूत्रों के अनुसार, अनुच्छेद 370 को हटाये जाने से कुछ दिन पहले, कश्मीर में तैनात सुरक्षा बलों को यही बताया गया था. 2016 में हुए प्रदर्शनों में 100 से ज़्यादा लोग मारे गए थे और हजारों घायल हुए थे.
प्रदर्शन इस बार भी हो तो रहे हैं, लेकिन अनुमान से काफी कम. जानकारी के मुताबिक इनमें अब तक कम से कम दो लोगों की मौत हुई है और सौ से ज्यादा लोग घायल हैं. हालांकि सरकार ने अभी इनमें से किसी भी चीज़ की पुष्टि नहीं की है.
इस बार प्रदर्शनों के उतना न होने की एक वजह सुरक्षा एजेंसियों द्वारा पहले से की गयी तैयारी भी है. इसके तहत तमाम नेताओं सहित हजारों लोगों की गिरफ्तारियां की गई हैं, संचार को पूरी तरह से बंद कर दिया गया है और लोगों के आंदोलन करने पर सख्त प्रतिबंध लगाये गये हैं.
लेकिन जानकार कहते हैं कि सिर्फ ये सब चीज़ें बड़े पैमाने पर प्रदर्शन न होने को ठीक से नहीं समझाती हैं.
‘प्रतिबंध कश्मीर में नए नहीं हैं और कश्मीर में लोग इनके बावजूद सड़कों पे आते रहे हैं. लोगों का इस बार सड़कों पे न आना, वो भी 370 हटाये जाने पे, मेरी समझ से बाहर है.’ कश्मीर के एक वरिष्ठ पत्रकार, सत्याग्रह से बात करते हुए कहते हैं कि शायद आने वाले वक़्त में समझ में आ जाये कि ऐसा क्यों हो रहा है, ‘कश्मीर में 1987 के चुनाव में धांधली के बाद लगभग तीन साल तक कुछ नहीं हुआ था. और फिर 1990 में जो हुआ वो पूरी दुनिया ने देखा था और अभी भी चल ही रहा है.’
वजह जो भी हो, हक़ीक़त यह है कि तनाव तो यहां भरपूर है लेकिन कुछ जगहों को छोड़कर इस वक़्त कश्मीर घाटी में हिंसा नहीं हो रही है. इसी वजह से सरकार धीरे-धीरे प्रतिबंध हटा पा रही है, इस आशा में कि हालात अब कुछ ही दिनों में सामान्य हो सकते हैं. लेकिन इस आशा की राह में कई बेहद बड़ी आशंकाएं भी हैं.
आखिरी लड़ाई
सत्याग्रह ने पिछले दो हफ्तों में कश्मीर के अनंतनाग, पुलवामा, श्रीनगर, बडगाम, शोपियां और कई अन्य जिलों में जाकर दर्जनों लोगों से बात की. इनमें दुकानदार, सरकारी मुलाजिम, ट्रांसपोर्टर्स और अन्य लोग शामिल हैं.
इन लोगों में से एक बड़ी संख्या यह मानकर चल रही है कि इस बार कश्मीर के लिए यह आखिरी लड़ाई है और यह जितनी भी देर चले इसको लड़ते रहना ज़रूरी है.
‘हर दूसरे-तीसरे साल कश्मीर छह महीने के लिए बंद हो जाता है और इस बार तो बात हमारी पहचान की है. मुझे लगता है अब नहीं हम डटे रहे तो हम खतम कर दिये जाएंगे धीरे-धीरे’ बडगाम जिले के एक 70 साल के दुकानदार, ग़ुलाम कादिर, सत्याग्रह को बताते हैं, ‘यह सब हमें अपनी आने वाली नस्लों के लिए करना ही पड़ेगा वरना किसको अच्छा लगता है क़ैद होके रहना, अपने बच्चों को स्कूल न जाते हुए देखना और हजारों करोड़ का नुकसान अलग.’
“में भी लोगों से बात कर रहा हूं और में एक अजीब चीज़ होती हुई देख रहा हूं. कश्मीर में लोग हमेशा भारत और पाकिस्तान के बीच युद्ध के खिलाफ रहे हैं, लेकिन आप अभी जिससे भी बात करें वो ये ही कहता है कि इस मसले का हल सिर्फ युद्ध है’ कश्मीर के अनंतनाग जिले में स्थित एक पत्रकार सत्याग्रह को बताते कि यह परिवर्तन आने वाले समय में कश्मीर के हालात काफी कठिन कर सकता है, ‘आप समझ सकते हैं कि जो लोग अभी युद्ध चाह रहे हैं, उनके लिए दुकानें बंद रखना या प्रतिबंधों में रहना कोई बड़ी बात नहीं है.’
ऐसा सोचे जाने की एक वजह है हाल ही में 89 साल के अलगाववादी नेता, सैय्यद अली शाह गिलानी, का दिया वह बयान था जिसमें उन्होने लोगों से आग्रह किया है कि वे शांतिपूर्ण प्रदर्शन करते रहें.
‘प्रदर्शन करते हुए इस बात का खास खयाल रखना है कि हम अनुशासन प्रिय रहें. अगर उसके बाद भी लोगों को मारा जाता है तो पूरी दुनिया इस बात की गवाह होगी.’ गिलानी, अपने घर में कई सालों से नज़रबंद हैं.
इसके अलावा जगह-जगह ऐसे पोस्टर्स भी देखे गए हैं जिनमें लोगों से अपील की जा रही है कि वे अपने कारोबार बंद रखें और दफ्तरों या अन्य काम की जगहों पर न जाएं.
दूसरा पक्ष
लेकिन एक सच यह भी है कि सब लोग ऐसा नहीं सोचते हैं. भले ही अल्पसंख्यक हों लेकिन ऐसे लोग भी हैं कश्मीर में जो चाहते हैं कि अब सरकार ने प्रतिबंध कम कर दिये हैं तो जीवन सामान्य हो जाये.
सत्याग्रह ने कई ऐसे लोगों से भी बात की. पुलवामा जिले के एक सेब व्यापारी, अपना नाम प्रकाशित न करने की शर्त पर कहते हैं कि चाहे कश्मीर के लोग अब सालों प्रदर्शन करते रहें, जो हो गया वह अब हो गया है.
‘ऐसे सब कुछ बंद करके बैठ जाने से हमारा दोतरफा नुकसान हो रहा है’, इस सेब व्यापारी ने सत्याग्रह को बताया, ‘370 हटने से जो नुकसान है वो तो है ही, ऐसे हम आर्थिक रूप से भी कमजोर होते जा रहे हैं.’
लेकिन इस सेब व्यापारी का यह भी कहना है कि उनके साथ काम करने वाले और लोग ऐसा नहीं सोचते और वे अकेले कुछ नहीं कर सकते.
इस बार कश्मीर में पहली बार ऐसा हो रहा है जब मिलिटेंट्स मैदान में कूद पड़े हैं और लोगों को कारोबार वगैरह बंद करके रखने के लिए बोल रहे हैं. इससे पहले कभी ऐसा नहीं हुआ था. ऐसे में इन सेब व्यापारी जैसी सोच रखने वालों के लिए खतरा भी कम नहीं है.
कई दिनों से घाटी के विभिन्न इलाकों से खबरें आ रही थीं कि मिलिटेंट्स दूकानदारों को दुकानें न खोलने की सलाह दे रहे हैं. और हाल ही में श्रीनगर के एचएमटी इलाके में एक दुकानदार की, अज्ञात बंदूकधारियों ने, गोली मार के हत्या कर दी.
इसके बाद सोपोर जिले में फिर से बंदूकधारियों ने एक परिवार के चार लोगों को, जिनमें दो साल की एक बच्ची भी थी, गोली मार के घायल कर दिया. इस परिवार का मुखिया एक सेब व्यापारी है और सूत्रों के अनुसार उसको मिलिटेंट्स ने सेब मंडी में अपनी दुकान खोलने से मना किया था.
उधर कुछ दिन पहले दक्षिण कश्मीर के बिजबेहरा इलाक़े में एक ट्रक ड्राईवर की पत्थर लगने से मौत हो गयी.
‘ये सब घटनाएं घाटी में एक भय का माहौल पैदा कर रही हैं और मुझे ऐसा लगता है कि अब वो लोग भी, जो चाहते हैं कि चीज़ें जल्दी सामान्य हों, ऐसा कहने और अपना कारोबार करने से कतराएंगे’ उत्तर कश्मीर के सोपोर जिले के एक पुलिस सूत्र सत्याग्रह को बताते हैं.
तो कुल मिलाकर अभी यही लग रहा है कि कश्मीर को सामान्य होते-होते काफी समय लगने वाला है. क्योंकि कश्मीर और जगहों जैसा नहीं है.
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