निर्देशक: अजय बहल
लेखक: अजय बहल, मनीष गुप्ता
कलाकार: अक्षय खन्ना, ऋचा चड्ढा, मीरा चोपड़ा, राहुल भट, श्रीस्वरा
रेटिंग: 3/5

इंडियन पीनल कोड का सेक्शन 375 बलात्कार की परिभाषा तय करता है. यह बताता है कि किन परिस्थितियों में किसी पुरुष को बलात्कारी कहा जाएगा. इनमें वे परिस्थितियां भी शामिल हैं जिनमें महिला की सहमति से हुआ संबंध भी बलात्कार माना जा सकता है. ‘सेक्शन 375’ कानून की इसी धारा में मौजूद पेंच को अपना आधार बनाती है और एक बेहद संवेदनशील मामले के जरिए इसकी परतों की पड़ताल करती है.

सेक्शन 375 की कहानी एक फिल्म निर्देशक के घर पर एक महिला, जूनियर कॉस्ट्यूम डिजाइनर के पहुंचने से होती है. आगे पता चलता है कि डिजाइनर ने निर्देशक पर बलात्कार का आरोप लगाया है और सेशन कोर्ट में वह अपराधी साबित हुआ है. अगले कुछ दृश्यों में फिल्म दिखाती है कि यह केस अब मुंबई हाई कोर्ट में लड़ा जाना है. फिल्म के इस हिस्से में मीटू कैंपेन, सोशल मीडिया पर चलने वाले ट्रायल, मीडिया की आक्रामकता और बलात्कार के खिलाफ होने वाले जनआंदोलनों की झलक दिखती है. लेकिन यह सब कुछ परदे पर इतने मशीनी तरीके से दिखाया जाता है कि तकरीबन 40 मिनट की इस लंबाई में आपको खासी बोरियत का सामना करना पड़ता है.

‘सेक्शन 375’ एक हार्डकोर कोर्टरूम ड्रामा है और इसमें मनोरंजन भी ऋचा च़ड्ढा और अक्षय खन्ना की एंट्री के साथ आता है. अक्षय खन्ना जहां फिल्म में हाई-प्रोफाइल केस लड़ने वाले और एक बड़ी लॉ-फर्म चलाने वाले वकील बने हैं, वहीं ऋचा चड्ढा पब्लिक प्रॉसीक्यूटर की भूमिका में दिखाई देती हैं. अदालती कार्यवाही की कुछ बारीकियों को नज़रअंदाज कर दिया जाए तो यह ट्रायल काफी हद तक सच के करीब दिखता है. साथ ही, फिल्म में कोर्ट के माहौल, वकीलों के आपसी संबंधों और जज-वकील के बीच होने वाले संवादों को भी जगह दी गई है जो फिल्म को रियलिस्टिक बनाता है. इसके अलावा, इस दौरान सिनेमैटोग्राफी और संगीत भी दृश्यों में वजन लाने में अपनी जरूरी भूमिका बढ़िया तरीके से निभाते हैं.

बलात्कार जैसे संवेदनशील विषय पर आधारित होने के बावजूद ‘सेक्शन 375’ किसी का पक्ष नहीं लेती. इसी विषय पर बनी फिल्म ‘पिंक’ की तरह यह फिल्म भी कंसेंट यानी सहमति की बात तो करती है, लेकिन कुछ मौकों पर होने वाले कानून के दुरुपयोग की तरफ भी इशारा करती है. फिल्म की एक बड़ी और जरूरी खासियत यह भी है कि कोई भी किरदार पूरी तरह से स्याह या सफेद रंग में नहीं रंगा गया है. इसके अलावा, घटनाओं के अलग-अलग वर्जन दिखाया जाना भी फिल्म के दूसरे हिस्से को खासतौर पर रोचक बनाता है. कुल मिलाकर, तमाम तरह के पक्ष और तर्क देकर फिल्म दर्शकों पर छोड़ती है कि वे सही और गलत को अपनी परिभाषाओं के अनुसार तय करें. इसलिए हो सकता है कि दिमागी चुनौतियों की बजाय मनोरंजन को तरजीह देने वालों को यह फिल्म थोड़ी कम पसंद आए.

फायर-ब्रांड वकील साहिबा कम एक्टिविस्ट की भूमिका में ऋचा चड्ढा आपको खूब लुभाती हैं. हालांकि उन्हें फिल्म में जो लुक दिया गया है, वह जरुरत से ज्यादा औसत होने के चलते कुछ देर बाद खटकता है, लेकिन उनका अभिनय पूरे वक्त सधा रहता है. बलात्कार पीड़िता की भूमिका निभा रही मीरा चोपड़ा भी कई शेड्स वाला बढ़िया अभिनय आपकी नज़र करती हैं. तेलुगू फिल्मों का जाना-माना नाम बन चुकी मीरा, प्रियंका चोपड़ा और परिणीति चोपड़ा की कज़न के तौर पर भी जानी जाती हैं. इनके अलावा, आरोपित निर्देशक की भूमिका में राहुल भट्ट और उनकी पत्नी बनकर श्रीस्वरा भी संतुलित अभिनय करते हैं.

अक्षय खन्ना ‘सेक्शन 375’ में रोचकता और ढेर सारा मनोरंजन लेकर आते हैं. दूसरे शब्दों में कहें तो वे फिल्म की जान हैं. इस बात में कोई दो राय नहीं है कि कटाक्ष को सपाट चेहरे के साथ जितने बेहतरीन तरीके से वे पेश कर सकते हैं, बॉलीवुड में दूसरा शायद ही कोई और करता होगा. बार-बार ‘हम जस्टिस के नहीं लॉ के बिजनेस में हैं’ संवाद दोहराने वाले खन्ना फिल्म को जरूरी परतें देते हैं. शुरूआत में वे जहां खुदगर्ज और घमंडी वकील नज़र आते हैं, वहीं फिल्म का अंत आते-आते कानून की सही समझ रखने के चलते उनका किरदार दर्शकों की सहानुभूति भी बटोरता है. और ऐसा पटकथा की जरूरत के हिसाब से किए गए उनके जानदार अभिनय के चलते ही होता है.

फिल्म का निर्देशन ‘बीए पास’ जैसा इंटेंस और उत्कृष्ट सिनेमा रचने वाले अजय बहल ने किया है जबकि लेखन की जिम्मेदारी उनके साथ मनीष गुप्ता ने बांटी है. बहल, गिनती के कुछ उन निर्देशकों में शामिल हैं जो नाम-दाम के बजाय सिनेमा के लिए, सिनेमा बनाते हैं. उनकी पिछली फिल्म की तरह यह फिल्म भी बगैर पितृसत्तामक यानी पैट्रियार्कल हुए पुरुषों से जुड़े त्रासद पक्ष को भी पूरी ईमानदारी और सटीकता से रखती हैय ऐसा बॉलीवुड फिल्मों में कम ही होता है. उनके कमाल निर्देशन और अक्षय खन्ना के बेहतरीन अभिनय के लिए इस फिल्म को जरूर देखा जाना चाहिए.