लेखन-निर्देशन: राज शांडिल्य

कलाकार: आयुष्मान खुराना, नुसरत भरूचा, अन्नू कपूर, विजय राज, राजेश शर्मा, अभिषेक बनर्जी

रेटिंग: 3/5

अगर मिलेनियल्स की शब्दावली में ‘ड्रीम गर्ल’ की तारीफ करनी हो तो कहा जा सकता है कि ‘ड्रीम गर्ल’ लोल है, रोफलेबल है, लमाओनेस से भरपूर है. कहने का मतलब यह है कि फिल्म खूब हंसाती है. जैसा कि अक्सर ही आयुष्मान खुराना की फिल्में होती हैं, ‘ड्रीम गर्ल’ भी एक एडल्ट सब्जेक्ट कहे जा सकने वाले विषय पर बनी लेकिन परिवार के साथ बैठकर देखी जा सकने वाली साफ-सुथरी मनोरंजक फिल्म है. यह फिल्म इन मायनों में भी खास कही जा सकती है कि इसके साथ ‘आयुष्मान खुराना की फिल्में’ भरोसे के उस बैरोमीटर को पार कर चुकी हैं, जिसके बाद केवल उनका नाम जुड़ने के चलते दर्शक सिनेमाघरों का रुख कर लिया करेंगे.

आयुष्मान खुराना ने एक वक्त पर अपने आप को मर्दों की गृहशोभा कहा था. यह बात उनकी पिछली फिल्मों से कुछ हद तक सही साबित भी हो चुकी है. लेकिन अगर उनके लिए कोई सटीक और सम्मानजनक संबोधन होगा तो वह बॉलीवुड का नया अमोल पालेकर कहा जाना ही होगा. पालेकर की ही तरह सुदर्शन और शरीफ छवि वाले आयुष्मान खुराना का जादू एक अपेक्षाकृत कमजोर फिल्म को भी क्या रंग-रूप दे सकता है, इसका अंदाजा ‘ड्रीम गर्ल’ देखकर लगाया जा सकता है.

कहानी पर आएं तो ‘ड्रीम गर्ल’ शिद्दत से नौकरी तलाश कर रहे एक ऐसे लड़के करम को अपना नायक बनाती है जिसका खास टैलेंट लड़कियों की तरह आवाजें निकाल लेना है. इसके चलते उसे कस्बे की रामलीला-कृष्णलीला में महिलाओं के किरदार करने के लिए दिए जाते हैं. इसी टैलेंट की बदौलत उसे एक ऐसे कॉल सेंटर में नौकरी मिल जाती है जहां महंगी कॉलरेट्स पर लोग लड़कियां को फोन कर प्यार भरी बातें कर सकते हैं. आगे होता यह है कि पूजा बनकर लोगों से बात करने वाले करम के पीछे पांच-छह आशिक पड़ जाते है और फिल्म में ढेर सारा कन्फ्यूजन और मनोरंजन पैदा करने की वजह बनते हैं. हालांकि इस तरह का हास्य वेलकम-हाउसफुल सीरीज की फिल्मों में दर्शक पहले भी देख चुके हैं लेकिन यहां पर इसका सुथरा और चुटीला होना दिल जीत लेता है.

‘ड्रीम गर्ल’ में करम और पूजा के बीच झूलते आयुष्मान खुराना के काम को बार-बार कमाल बोलने का मन करता है. वे लड़कियों की आवाज में जिस भंगिमा और अदाओं के साथ आंखे-भौंहें और होंठ नचाकर बात करते हैं, देखने वाला अपनी हंसी रोक ही नहीं सकता है. सच्ची के जवाब में हर बार स्मूची कहने का उनका अंदाज भी आपको याद रह जाता है. इसके अलावा उनकी कॉमिक टाइमिंग भी आपको खास तौर से प्रभावित करती है. मज़ेदार यह है कि वे सिर्फ संवादों से ही नहीं बल्कि अपनी देहबोली से भी अपनी बात में वजन लाते हैं. बाकी पश्चिमी उत्तर प्रदेश के अलग-अलग इलाकों का लहज़ा तो वे अपनी फिल्मों में इतनी बार अपना चुके हैं कि अब कोई भी उनका जन्मस्थान एटा, मथुरा या मेरठ ही कहेगा.

फिल्म में आयुष्मान खुराना के पिता बने अन्नू कपूर एकमात्र ऐसी वजह हैं जिसके चलते आपका ध्यान खुराना से हटता है. नासमझी की बातें नफ़ासत से करने का उनका अंदाज़, हक्का-बक्का होने वाले दृश्यों में उनके एक्सप्रेशंस और कॉमेडी करते हुए कमाल की टाइमिंग तो अभिनय के सिलेबस में शामिल करने लायक है. फिल्म की फीमेल लीड, नुसरत भरूचा कुछ खास नहीं करती हैं, पर इसलिए कि यहां पर उनके करने के लिए ज्यादा गुंजाइश नहीं थी. लेकिन फिर भी सही टोन के साथ उनकी सटीक संवाद अदायगी आपका ध्यान खींचती है. बाल ब्रह्मचारी युवक की भूमिका में अभिषेक बनर्जी और शायर-कम-हवलदार बनकर विजय राज हमेशा की तरह तालियां पाने वाला काम करते हैं. टीवीएफ वीडियोज से जाना-पहचान चेहरा बनी निधि बिष्ट यहां भी अपने पुराने पड़ चुके एक्सप्रेशन और एग्रेशन से ही काम चलाती हैं.

खामियों पर आएं तो फ्रेंडशिप कॉलिंग वाले ऐसे कॉल सेंटर्स का दौर अब खत्म हो चुका है. ऐसे में नायक का स्मार्ट वॉच पहनकर गुलु-गुलु करना कुछ लोगों को थोड़ा खटक सकता है. इसके अलावा फिल्म शुरूआत में कॉल सेंटर पर आने वाले कॉल्स के बहाने लोगों के अकेलेपन को टटोलने का जिक्र करती है लेकिन बाद में इसे संवादों में दो-तीन बार दोहराने तक ही सीमित रखती है. इस पहलू को एक्सप्लोर करने की बजाय फिल्म कॉमेडी पर ही अपना पूरा फोकस रखती है और इसीलिए यह वजन में ‘शुभ मंगल सावधान’, ‘बधाई हो’ जैसी बेहतरीन फिल्मों से कमतर रह जाती है.

लंबे समय तक कॉमेडी सर्कस की स्क्रिप्ट लिखने वाले राज शांडिल्य ने ‘ड्रीम गर्ल’ का लेखन और निर्देशन किया है. शायद इसीलिए उनकी फिल्म की यूएसपी इसके संवाद बनते हैं. इनमें हर लाइन के साथ पंच आते हैं और हंसाते हैं. ‘करम ही पूजा है’ या ‘कानून से छेड़छाड़’ जैसी बेहद जेनेरिक लाइनों को भी फिल्म इतनी चतुराई और खूबसूरती से इस्तेमाल करते है कि इन्हें सुनते ही हॉल में हंसी के फव्वारे फूट पड़ते हैं. हालांकि एक संवाद में मीटू कैंपेन का गैरजरूरी रिफरेंस चुभता है, लेकिन हर संवाद को पंचलाइन बनाने की कोशिश में, कुछ का हल्का-फुल्का ऑफेंसिव हो जाना चलाया जा सकता है. अच्छी बात यह है कि संवाद सुने-सुनाये और कहानी बहुत हद तक प्रेडिक्टेबल होने के बावजूद यहां लेखन में नयापन दिखता है और मनोरंजन में कोई कमी नहीं आती है.

कुल मिलाकर, ड्रीम गर्ल कोई ऐसी फिल्म नहीं है जो सिनेमा के पैमानों पर बहुत ऊपर रखी जा सकती हो, लेकिन मनोरंजन इसमें ठूस-ठूसकर भरा गया है. इसलिए जाइए, इस वीकेंड ड्रीमगर्ल से मिलकर आइए!