देश की अर्थव्यवस्था में सुस्ती की सुर्खियां अब जोर पकड़ रही हैं और सरकार के मंत्रियों को अब इससे जुड़े सवालों का सामना करना पड़ रहा है. आर्थिक मंदी की इन खबरों में सबसे ज्यादा चर्चा वाहनों की घटती बिक्री की है. अगस्त 2019 में भारतीय बाजार में कारों की बिक्री 41.09 प्रतिशत घटकर 1,15,957 कारें ही रह गई. यह यात्री वाहनों में पिछले बीस सालों की सबसे बड़ी गिरावट है. ऐसे में कार कंपनियों के अपना उत्पादन बंद करने की खबरें मंदी की सुर्खियों को और भी बढ़ा रही हैं.

हाल ही में इस मसले पर मोदी सरकार का बचाव करते हुए वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने कार की लगातार घटती बिक्री की वजह यह बताई कि मिलेनियल्स (ऐसे युवा जिनकी उम्र 20 से 37 साल है) खुद की कार खरीदने की जगह ओला और ऊबर जैसी सेवाओं का इस्तेमाल करना पसंद कर रहे हैं. वित्त मंत्री का ऐसा कहना करोड़ों लोगों को रोजगार देने वाले ऑटोमोबाइल क्षेत्र में मंदी की वजह का अतिसरलीकरण था. इस वजह से यह बात राजनीतिक तंज और लतीफों का विषय बन गई. निर्मला सीतारमण के इस बयान को लेकर विपक्ष ने उन पर जमकर निशाना साधा और सोशल मीडिया पर उन्हें खूब ट्रोल भी किया गया.

लेकिन, इन सारी बातों के बीच यह बात तो फिर भी रह जाती है कि क्या वाहनों की बिक्री सिर्फ आर्थिक मंदी की वजह से ही घट रही है?

एक अनुमान के मुताबिक, ऑटोमोबाइल क्षेत्र का देश की जीडीपी में करीब सात फीसद का योगदान है और यह क्षेत्र लगभग तीन करोड़ लोगों को रोजगार देता है. आर्थिक मंदी इस क्षेत्र को किस तरह से प्रभावित कर रही है, यह एक जटिल विषय है. लेकिन, मोटे तौर पर विश्लेषक मानते हैं कि पहले वाहन खरीदने के लिए लोन काफी आसानी से मिल जाता था. ये लोन देने वाले ज्यादातर एनबीएफसीज (नॉन बैंकिंग फाइनेंशियल कंपनीज़) होते थे जो खुद बैंकों से कर्ज लेते हैं. लेकिन, एनबीएफसीज के संकट में आने के बाद वे बैंकों को खुद अपनी देनदारियां नहीं चुका पा रहे थे. इसके चलते बैंकों ने उन्हें लोन देना बंद कर दिया जिससे कारों की बिक्री में बड़ी गिरावट आई है. इसके अलावा आर्थिक हालात, नौकरी को लेकर अनिश्चितता के चलते भी लोग कार जैसी महंगी और कम जरूरी चीजों को खरीदने से परहेज कर रहे हैं.

घटती कार बिक्री की वजह वे सारी चीजें तो हैं ही, जो आर्थिक मंदी से जुड़ी हुई हैं. लेकिन, क्या इनके अलावा भी कुछ ऐसी वजहें हैं जो कारों की बिक्री को प्रभावित कर रही हैं. एनसीआर में ऑटो फाइनेंस के काम से जुड़े एक सज्जन से जब हमने यह सवाल पूछा तो उन्होंने नाम न छापने की शर्त पर कहा, ‘कारों की बिक्री कम होने की एक वजह मंदी तो है ही. लेकिन, कोई भी बाजार हो वह एक समय तक चढ़ने के बाद उतरता तो है ही. कार के बाजार के साथ भी ऐसा ही हो रहा है.’ वे बताते हैं कि आज से चार-पांच साल पहले कार फाइनेंस कराने वालों की लाइन लगी रहती थी, लेकिन, पिछले कुछ सालों से लोन देने वालों को दूर-दराज तक के इलाकों में ग्राहकों को टटोलना पड़ रहा है.

यह तो जमीनी स्तर पर कार फाइनेंस का काम करने वाले एक एजेंट का अपना अनुभव है. हो सकता है कि आंकड़ों और मार्केट रिसर्च के जरिये बाजार का विश्लेषण करने वालों को यह बहुत न जंचे. लेकिन, ऑटोमोबाइल क्षेत्र के दिग्गज और बजॉज ऑटो के मैनेजिंग डायरेक्टर राजीव बजाज भी कुछ इससे मिलती-जुलती बात ही कहते हैं. एक आर्थिक समाचार पत्र से बातचीत में राजीव बजाज कहते हैं, ‘ऑटोमोबाइल क्षेत्र की मौजूदा परेशानी की वजह मंदी से ज्यादा अधिक उत्पादन और स्टाक है.’ वे आगे कहते हैं, ‘कोई भी मार्केट हमेशा एक ही रफ्तार से बिना खुद में संशोधन किए आगे नहीं बढ़ सकता है, इसलिए हमें किसी मरीचिका का पीछा नहीं करना चाहिए.’

ऑटोमोबाइल उद्योग पर नजर रखने वाले बहुत से जानकार भी मानते हैं कि अक्सर वाहन बिक्री का अंदाजा बिक्री के परंपरागत चलन के मुताबिक लगाया जाता है और वाहन कंपनियां इसी आधार पर अपना उत्पादन करती हैं. लेकिन क्या कारों की खरीद-बिक्री का हमारा तरीका इससे कुछ अलग है? क्या कार कंपनियों को भारत में जितना पोटेंशियल दिखता है वह उतना इसलिए नहीं है क्योंकि हमारी जनसंख्या का ज्यादातर हिस्सा कार खरीदने के बारे में सोच भी नहीं सकता? क्या इस लिहाज से फिलहाल हमारा कार बाजार करीब-करीब सैचुरेट हो चुका है?

ओम टूर एंड ट्रैवल नाम से टैक्सी सर्विस चलाने वाले और पुरानी कारों की खरीद बिक्री से जुड़े अमित जैन कहते हैं, ‘पिछले दस-पंद्रह सालों से भारतीय वाहन बाजार और खास तौर से कार बाजार लगातार बढ़ा है. ऐसे में धीरे-धीरे पुरानी कारों का एक नया बाजार खड़ा हो गया है. यह बाजार अब कम कीमत पर आपको कई सारे और बेहतर विकल्प उपलब्ध कराता है. यह भी नई कारों की बिक्री घटने की एक वजह हो सकती है.’ 2018 के पुरानी कारों के बिक्री के आंकड़ों पर गौर करें तो इस बात में कुछ दम नजर आता है. 2018 में 36 लाख नई कारों की बिक्री हुई तो करीब 40 लाख पुरानी कारें खरीदी-बेंची गईं. जानकार कहते हैं कि भारत में सेकेंड हैंड कारों की खरीद-बिक्री के आंकड़े अभी बहुत ज्यादा संगठित नहीं हैं, ऐसे में यह संख्या और ज्यादा भी हो सकती है.

पेशे से इंजीनियर और ऑटोमोबाइल में गहरी दिलचस्पी रखने वाले रजनीश वर्मा कहते हैं, ‘किसी विकसित देश में अगर एक नई कार खरीदी जाती है तो तीन पुरानी कारें खरीदी-बेंची जाती हैं. भारत में अभी कारों की संंख्या इतनी नहीं है कि यह अनुपात लागू हो सके. इसलिए यहां अभी बाजार के सेंटीमेंट्स और मंदी के कारण लोग नई कारें खरीदने से परहेज कर रहे हैं. और उनकी जगह पुरानी कारों के बाजार ने हल्की सी तेजी पकड़ी है.’ रजनीश कहते हैं कि बाजार के सेंटीमेंट्स सुधरने के साथ नई कारों की बिक्री भी बढेगी, लेकिन ऑटो सेक्टर को यह उम्मीद नहीं करनी चाहिए कि वह पांच साल पहले वाली रफ्तार से लगातार बढ़ता रहेगा. उनके मुताबिक, नया ऑटो बूम तभी आएगा जब अर्थव्यवस्था रफ्तार पकड़ेगी और उसकी वृद्धि का लाभ नए लोगों तक पहुंचेगा. तब कार बाजार को उसके नये खरीदार मिल सकेंगे.

कुछ सीधे-साधे आंकड़ों को देखें तो रजनीश की आखिरी बात को थोड़ा और आसानी से और आगे जाकर समझ सकते हैं. माना जाता है कि भारत की नई खरीदी जाने वाली एक तिहाई कारें महाराष्ट्र, दिल्ली, गुजरात और कर्नाटक में खरीदी जाती हैं. लेकिन, पिछले काफी दिनों से इन संपन्न राज्यों में कारों की बिक्री घटी है और कार निर्माताओं को अन्य राज्यों पर फोकस करना पड़ा है. प्रति व्यक्ति आय के हिसाब से देखें तो इन राज्यों की औसत प्रति व्यक्ति आय भारत की औसत प्रति व्यक्ति आय से 55 फीसदी ज्यादा है. इससे एक सामान्य निष्कर्ष यह निकलता है कि उदारीकरण के बाद तेजी से बढ़ते कार बाजार का एक चक्र पूरा हो चुका है और बढ़ती अर्थव्यवस्था में जो लोग कार खरीद सकते थे, उन्होंने खरीद ली है. इसके अलावा देश में एक बहुत बड़ा वर्ग ऐसा है जो आर्थिक तौर पर कार खरीदने की स्थिति में नहीं है. और इन दोनों के बीच जो छोटा सा ऐसा मध्यम वर्ग है जो कार खरीद तो सकता है, लेकिन फिलहाल मंदी की खबरों के बीच वह कार जैसी चीजों पर अपना पैसा खर्च नहीं करना चाहता है.

ओला-ऊबर जैसी एप आधारित टैक्सी सर्विसेज के कारण कारों की बिक्री घटी है, इस बात पर वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण पर काफी तंज कसे गए. लेकिन, क्या बेहतर हुए सार्वजनिक परिवहन और इन एप आधारित टैक्सी सर्विसेज के कारण शहरी यातायात में कोई फर्क नहीं पड़ा है? नोएडा में रहने वाले संतोष कुमार कहते हैं कि अगर ओला-ऊबर जैसी सर्विस नहीं होती तो उन्हें दो कारें रखनी पड़तीं क्योंकि तब उनकी कामकाजी पत्नी को दूसरी कार की जरूरत पड़ती. वे बताते हैं कि इन टैक्सी सर्विसेज के कारण अब उन्हें दूसरी कार की जरूरत ही महसूस नहीं होती है. जाहिर है कि ऐसे बहुत से संपन्न परिवार होंगे जिनकी दूसरी कार की जरूरत को ओला-ऊबर ने कम किया है.

हालांकि ओला-ऊबर और कार की बिक्री का संबंध इतना सीधा या रैखिक भी नहीं है. ओला-ऊबर के कारण नई कारों की बिक्री में फर्क पड़ा है, इस बात को मारूति सुजुकी के कार्यकारी निदेशक (सेल्स एंड मार्केटिंग) शशांक श्रीवास्ताव सही नहीं मानते हैं. एक समाचार एजेंसी से बातचीत में वे कहते हैं, ‘ओला-ऊबर छह सात साल पहले शुरु हुई हैं और यही ऑटो उद्योग का सबसे अच्छा समय रहा है. ऐसे में नई कार बिक्री को इन टैक्सी सर्विसेज से जोड़ना ठीक नही है.’ लेकिन, यहां यह भी गौर करने वाली बात है कि ओला-ऊबर इन्हीं छह सालों में तेजी से बढ़े और इनमें चलने वाली गाड़ियां भी ऑटो इंडस्ट्री की मांग का ही हिस्सा थीं. ऐसे में हो सकता है कि एक समय ओला-ऊबर ने कारों की मांग बढ़ाई हो और अब वह उन्ही की वजह से घट भी रही हो.

ऊबर-ओला के अलावा मेट्रो ट्रेन ने भी दिल्ली जैसे शहरों में कारों के उपयोग को थोड़ा कम किया है. इस वजह से कुछ जानकारों का मानना है कि इन शहरों में अब लोगों को कार रखने की जरूरत तो है पर अब वे उतनी चलती नहीं हैं. ऐसे में शायद लोग पुरानी कारों को बेचकर नई कार लेने में ज्यादा समय लगाने लगे हैं. और यह भी उनकी बिक्री कम होने का एक छोटा सा कारण हो सकता है.

भारत में कार खरीदना अभी भी प्रतिष्ठा से जुड़ी चीज मानी जाती है. एक अध्ययन के मुताबिक, यहां नई कार खरीदने वाले 46 प्रतिशत लोग ऐसे होते हैं जो पहली बार कार खरीद रहे होते हैं. ऑटोमोबाइल क्षेत्र के जानकारों का मानना है कि बड़े शहरों में कार खरीदने का पैटर्न अब थोड़ा बदल रहा है. अब यहां कार का होना उतना बड़ा स्टेटस सिंबल नहीं रह गया है. मेरठ के कुमार गौरव इस मानसिकता को ज्यादा साफ तरीके से बताते हैं. वे कहते हैं कि उन्हें कारों का क्रेज तो है, लेकिन वे सिर्फ कार खरीदने के लिए इसे नहीं खरीदना चाहते हैं. वे कहते हैं कि जिस तरह की कार वे खरीदना चाहते हैं वह, फिलहाल उनके बजट में नहीं है, इसलिए जब तक वह उनके बजट में नहीं आ तक जाती तब घर की पुरानी कार या ओला-ऊबर से काम चलाना कोई खराब विकल्प नहीं है. कार खरीदने का सपना और अकांक्षा कुमार गौरव की बातों में भी दिखती है, लेकिन यह उस प्रतिष्ठा से नहीं जुड़ी है जो दूसरों के दिखाने के लिए होती है, बल्कि उनके लिए उनकी निजी पसंद ज्यादा मायने रखती है. ग्राहक मनोविज्ञान का यह बदलाव दरअसल पीढ़ीगत है जो बताता है कि आने वाले समय में कार बिक्री के पैटर्न में और बदलाव आने वाले हैं.

इसके अलावा ओएलएक्स ने 1500 पुरानी कार खरीदने वालों के बीच एक सर्वे किया था. इसमें यह पता चला कि इन पुरानी कार खरीदने वालों में 85 फीसद ग्राहक ऐसे थे, जिनकी उम्र 25 से 37 के बीच में थी. यानी, बड़े शहरों के युवाओं में यह मानसिकता बढ़ रही है कि अगर कार खरीदने की जरूरत पड़ती भी है तो फिर पुरानी कार खरीद ली जाए.

मंदी के कारण कारों की बिक्री कम होने के बारे में सबसे ज्यादा चर्चा एनबीएफसी द्वारा लोन न दिए जाने, बाजार में नगदी संकट और ज्यादा रजिस्ट्रेशन फीस होने जैसे कारणों पर होती है. यह चर्चा मुख्यतः प्रोफेशनल और नौकरीपेशा मध्यम वर्ग के इर्द-गिर्द ही होती है. लेकिन, ऑटो सेक्टर के हालिया अध्ययन बताते हैं कि पिछले कुछ सालों मेंं कार बाजार को गति देने में शहरी प्रोफेशनल से ज्यादा योगदान छोटे शहरों के कारोबारियों, ठेकेदारों और रियल एस्टेट के धंधे से जुड़े लोगों का रहा है. लखनऊ में प्रॉपर्टी के एक कारोबारी बताते हैं कि कैसे उत्तर प्रदेश के टू-टियर शहरों में सन् 2000 से 2010 के बीच प्रॉपर्टी का बूम रहा और उसमें किसानों से लेकर एजेंट, डेवलपर और स्थानीय नेताओं तक ने खूब पैसे बनाए. लेकिन, रियल एस्टेट सेक्टर पर सख्ती, रेरा जैसे कानून और एकाउंटेड पैसे के चलन ने प्रॉपर्टी के काम को बिल्कुल मंदा कर दिया है. इसके चलते कंस्ट्रक्शन का काम भी कम हुआ, जिसके कारण आसानी से पैसे कमाने वाला एक तंत्र पूरा थम गया है. इस पूरे विश्लेषण के बाद वे कहते हैं ऐसे में आदमी सोच-समझ कर पैसा खर्च करेगा. कार बाजार में आई मंदी को भी वे इससे जोड़ देते हैं. यह विश्लेषण पूरी तरह कार बिक्री के मामले में सटीक है, ऐसा नहीं कहा जा सकता, लेकिन यह बाजार के चलन और मनोविज्ञान को थोड़ जरूर समझाता है.

ऑटोमोबाइल के बाजार में कुछ संरचनागत और कुछ अस्थायी बदलाव तो आए ही हैं. इसके अलावा तकनीक को लेकर भी वाहन बाजार काफी उथल-पुथल वाली स्थिति में है. सरकार ने प्रदूषण नियंत्रण के लिए नए उत्सर्जन मानक निर्धारित किए हैं. मौजूदा बीएस-4 के बाद बीएस-6 मानक लागू करने को कहा गया है. यानी 31 मार्च 2020 के बाद कंपनियां ऐसे वाहन नहीं बेंच सकेंगी जिनमें बीएस-6 उत्सर्जन मानक नहीं होंगे. जाहिर है कि ऐसे में ग्राहक भी नई तकनीक के इंतजार में रहते हैं और फिलहाल कुछ महीनों के लिए खरीद टाल देते हैं. ऐसे में ऑटोमोबाइल कंपनियों को बीएस-4 उत्सर्जन मानक वाले वाहनों का उत्पादन घटाना पड़ रहा है. यह भी ऑटोमोबाइल बाजार में सुस्ती की एक वजह है. विशेषज्ञ मानते हैं कि प्रदूषण के मानक बदलने से ऐसी स्थिति आती है और सरकार ने इसके लिए चूंकि समय बहुत कम दिया है, इसलिए बाजार में थोड़ी उथल-पुथल भी ज्यादा है. नए उत्सर्जन मानक के अलावा सरकार के हालिया रूख से यह अवधारणा मजबूत हुई है कि जल्द ही इलेक्टिक वाहन बाजार में कुछ बड़ा हो सकता है. हो सकता है कि सरकारी सब्सिडी के बाद ग्राहकों को अच्छी इलेक्ट्रिक कारें अपने बजट में मिल जाए. इसने भी ग्राहकों की धारणा को कुछ बदला ही है और ग्राहक देखो और इंतजार करो की नीति पर हैं.

आर्थिक सुस्ती तो नई कारों की घटती बिक्री की बड़ी वजह है ही, लेकिन इसके साथ-साथ वाहन बाजार में आए कुछ अन्य बदलावों के भी इसमें योगदान से इनकार नहीं किया जा सकता. ग्राहक मनोविज्ञान और धारणा बहुत सी चीजों से प्रभावित होती है और मंदी जैसे सेंटीमेंट्स में वह और ज्यादा नकारात्मक तरीके से असर करती है. हो सकता है कि यात्री वाहन बाजार जल्द अपने में कुछ करेक्शन करे और कुछ महीनों बाद हमें हालात बेहतर नजर आएं. लेकिन यह उतनी ही तेजी से होगा जितनी तेजी से अर्थव्यवस्था सुधरेगी और उससे होने वाले लाभ नए लोगों तक पहुंचेंगे.