कुछ महीने पहले जब भारतीय जनता पार्टी ने हरियाणा के आगामी विधानसभा चुनाव में 90 में से 75 सीटें हासिल करने का नारा दिया तो कई राजनीतिकारों ने इसे अतिश्योक्ति नहीं माना. उन्हें इस दावे के पीछे कुछ वाजिब आधार दिखे. मसलन, चौटाला परिवार में आपसी कलह के चलते हरियाणा की सबसे प्रमुख क्षेत्रीय पार्टी इंडियन नेशनल लोकदल (इनेलो) में दो-फाड़ हो चुका है. नतीजतन प्रदेश में भाजपा विरोधी एक बड़ा वोट बैंक इनेलो और जननायक जनता पार्टी (जजपा) के बीच बंटकर ग़ैरप्रभावी नज़र आता है.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी हरियाणा में अपनी पार्टी भाजपा के प्रभारी रह चुके हैं और वे इस बात को अलग-अलग तरीके से भुनाने में सफल माने जाते हैं. साथ ही भाजपा ने इनेलो के दस, चार निर्दलीय और एक बसपा से निष्कासित विधायक को ख़ुद में शामिल कर प्रदेश में अपनी स्थिति और मजबूत की है. इसके अलावा हरियाणा के भाजपा कार्यकर्ता विधानसभा चुनाव में अपने संभावित प्रर्दशन को बीते आम चुनावों से जोड़कर भी देखते हैं. इस समय प्रदेश की सभी दस लोकसभा सीटें भाजपा के पास हैं. इन सीटों का विधानसभावार विश्लेषण बताता है कि प्रदेश में भाजपा 79 सीटों पर विरोधियों से आगे रही.

हरियाणा में भाजपा के 75 पार के दावे को मजबूत करने में कांग्रेस की अंदरूनी फूट भी बड़ी भूमिका निभाती है. इस समय प्रदेश कांग्रेस दो बड़े गुटों में बंटी है . इनमें से एक की अगुवाई पूर्व पार्टी प्रदेशाध्यक्ष अशोक तंवर करते हैं और दूसरे की पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा. पार्टी से जुड़े एक वरिष्ठ सूत्र की मानें तो इस फूट के चलते पिछले काफी समय से प्रदेश के अधिकतर कांग्रेस कार्यकर्ता आपस में ही उलझते रहे और कइयों ने निराशा और असमंजस की इस स्थिति में सक्रिय रहना छोड़ दिया. नतीजतन कुछेक बड़े शहरों को छोड़ बाकी जिलों में पार्टी संगठन पूरी तरह प्रभावहीन हो गया.

लेकिन बीते कुछ दिनों से कांग्रेस की स्थिति कुछ बदली सी नज़र आने लगी है. ऐसा अशोक तंवर की जगह कुमारी शैलजा को प्रदेशाध्यक्ष और किरण चौधरी की जगह भूपेंद्र सिंह हुड्डा को विधायक दल का नेता व चुनाव प्रबंधन समिति का अध्यक्ष बनाए जाने के बाद हुआ है. गौरतलब है कि हुड्डा, अशोक तंवर को पद से हटाने और खुद को मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित करने के लिए कांग्रेस हाईकमान पर लंबे समय से दबाव बना रहे थे. लेकिन तंवर को पार्टी के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी का वरदहस्त हासिल होने की वजह से ऐसा हो नहीं पा रहा था. लेकिन राहुल गांधी के अध्यक्ष पद से हटते ही भूपेंद्र सिंह हुड्डा का पलड़ा पार्टी में एकदम से भारी हो गया. हुड्डा को प्रदेश प्रभारी गुलाम नबी आजाद का भी पूरा समर्थन बताया जाता है.

जानकारों का कहना है कि नई जिम्मेदारी मिलने के बाद भूपेंद्र सिंह हुड्डा और कुमारी शैलजा ने प्रदेश के कई कद्दावर और जमीन से जुड़े नेताओं से मुलाकात कर उन्हें अपने पक्ष में लेने की कोशिश की है. इसी क्रम में हुड्डा नाराज किरण चौधरी को मनाने उनके घर भी पहुंचे. प्रदेश कांग्रेस से जुड़े एक सूत्र नाम न छापने की शर्त पर कहते हैं कि हुड्डा को फ्री हैंड मिलते ही उनके समर्थक विधायक अपने-अपने क्षेत्र में प्रचार में जुट गए हैं. इससे कार्यकर्ताओं में जोश महसूस किया जा सकता है.

वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक डॉ अनंतराम चौधरी भी इस पूरे घटनाक्रम को कांग्रेस के हक़ में देखते हैं. वे कहते हैं, ‘हुड्डा और कुमारी शैलजा ने हर जगह साथ जाकर यह स्थापित किया है कि वे एक टीम हैं. यह भी तय माना जा रहा है कि टिकट वितरण में भी हुड्डा का ही सिक्का चलेगा. इसलिए अधिकतर सभी छोटे-बड़े नेता धीरे-धीरे उनसे जुड़ने लगे हैं और संगठन में गुटबाजी हल्की पड़ती दिखी है... इससे पार्टी के पक्ष में सकारात्मक माहौल बना है. बीते सप्ताह इनेलो के पूर्व प्रदेशाध्यक्ष अशोक अरोड़ा ने भाजपा की बजाय कांग्रेस से जुड़कर यह बात साबित की है.’ गौरतलब है कि अरोड़ा के साथ प्रदेश में मंत्री रह चुके सुभाष गोयल, पूर्व केंद्रीय मंत्री जयप्रकाश, पूर्व विधायक प्रदीप चौधरी और कद्दावर नेता गगनजीत संधू ने भी कांग्रेस का हाथ थामा है.

हाल ही में भूपेंद्र सिंह हुड्डा और कुमारी शैलजा ने बहुजन समाज पार्टी की सुप्रीमो मायावती से मुलाकात कर चुनाव में गठबंधन से जुड़ी चर्चाओं को भी हवा दी है. हालांकि हरियाणा में बसपा का वोट प्रतिशत बीते कुछ चुनावों में लगातार घटा है. लेकिन सूबे की दर्जन भर से ज्यादा सीटों पर निर्णायक भूमिका निभाने का माद्दा बसपा आज भी रखती है. प्रदेश के एक वरिष्ठ पत्रकार इस बारे में बताते हैं कि डेरा सच्चा सौदा के प्रमुख राम रहीम के अनुयायियों में दलितों की तादाद सर्वाधिक थी और वे सभी राम रहीम के जेल जाने की वजह से मौजूदा भाजपा सरकार से खासे आक्रोशित हैं. वे आगे जोड़ते हैं कि सिरसा और फतेहाबाद जैसे क्षेत्रों में राम रहीम का प्रभाव आज भी लगभग पहले जैसी ही है.

हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर और केंद्रीय मंत्री राव इंद्रजीत सिंह के बीच की अदावत भी कांग्रेस के पक्ष में जाती दिखती है. इंद्रजीत सिंह का अहीरवाल क्षेत्र यानी दक्षिण हरियाणा में जबरदस्त वर्चस्व है. बताया जाता है कि लंबे समय से उनकी नज़र मुख्यमंत्री की कुर्सी पर है. लेकिन मनोहर लाल खट्टर के होते उनका यह ख़्वाब पूरा हो पाना बहुत मुश्किल है. भाजपा ने इस बार सिंह को चुनाव कमेटी का सदस्य बनाया है. ऐसे में पार्टी सूत्रों के मुताबिक दोनों नेताओं के बीच टिकट वितरण को लेकर भारी जद्दोजहद होने की संभावना है जिसमें कई नेताओं के टिकट कट सकते हैं. ऐसे में हर चुनाव की तरह इनमें से ज्यादातर नेता बाग़ी बनकर चुनाव में ताल ठोकने और पार्टी के वोट काटने का काम करेंगे.

हालांकि कुछ विश्लेषक ऐसे भी हैं जो हाल-फिलहाल हरियाणा में कांग्रेस की स्थिति सुधरने जैसी बातों से असहमति जताते हैं. प्रदेश के वरिष्ठ पत्रकार उमेश जोशी भी उनमें से एक हैं. चार दशक से सूबे की राजनीति को देख रहे जोशी कहते हैं कि कांग्रेस में पदाधिकारियों में बदलाव के बाद भी जमीन पर कोई खास फर्क़ नहीं पड़ा है. पार्टी के अधिकतर छोटे-बड़े नेता सिर्फ़ अपनी-अपनी जगह सुरक्षित करने में जुटे हैं और पार्टी के प्रदर्शन से उन्हें कोई खास सरोकार हो ऐसा नहीं लगता. ‘कांग्रेस जातिगत राजनीति के फेर से बाहर निकल ही नहीं पा रही है. कुमारी शैलजा को सिर्फ़ इसलिए प्रदेशाध्यक्ष बनाया गया ताकि अशोक तंवर के हटने से दलित मतदाता नाराज़ न हों. शैलजा सरकार में कोई भी जिम्मेदारी संभालने के लायक तो हैं, लेकिन चुनाव जीतने के लिए वे संगठन को कितना तैयार कर पाएंगी ये कह पाना मुश्किल है.’

हरियाणा में कांग्रेस की डगर मुश्किल होने के पीछे जोशी कुछ और पहलुओं की तरफ़ भी हमारा ध्यान ले जाते हैं. वे कहते हैं कि अब तक हरियाणा में जाट बनाम ग़ैरजाट की लड़ाई में जाट निर्णायक भूमिका निभाते थे. लेकिन इस बार स्थिति बदली सी नज़र आती है. इस बार जाट वोट इनेलो, जननायक जनता पार्टी (जजपा) और भूपेंद्र सिंह हुड्डा की वजह से कांग्रेस के बीच बंटे नज़र आते हैं. दूसरी तरफ़ ग़ैरजाट मतदाताओं (जिनमें पंजाबी, बनिया और राजपूत प्रमुख हैं) के समर्थन से भाजपा अब भी कहीं ज्यादा मजबूत नज़र आती है.

प्रदेश में जाट राजनीति से जुड़े एक सक्रिय नेता इस बारे में बताते हैं कि यदि हुड्डा अलग पार्टी बना लेते तो उन्हें फायदा मिलने की संभावना कहीं ज्यादा थी. इस पर हमारा सवाल था, ‘यदि जाट भूपेंद्र हुड्डा को वोट देना चाहें तो क्या फर्क़ पड़ता है कि वे कांग्रेस से चुनाव लड़ें या अपनी खुद की पार्टी से!’ जवाब में वे कहते हैं, ‘2009 में कांग्रेस ने भजनलाल के नेतृत्व में चुनाव लड़ा था. लेकिन मुख्यमंत्री पद की जिम्मेदारी हुड्डा को सौंपी थी. इसी को आधार बनाकर हुड्डा विरोधी यह बात फैला रहे हैं कि कांग्रेस इस बार चुनाव तो हुड्डा की अगुवाई में लड़ेगी, लेकिन मुख्यमंत्री बनने की संभावना किसी और की है! हाल ही में कुमारी शैलजा ने इन चर्चाओं को यह कहकर हवा दे दी है कि नतीजे आने से पहले पार्टी किसी भी नेता को मुख्यमंत्री पद का दावेदार घोषित नहीं करेगी. इस बात से आशंकित जाट मतदाता कांग्रेस के साथ जाने में झिझक रहे हैं.’

वे आगे जोड़ते हैं, ‘हुड्डा के व्यवहार में अपेक्षित आक्रामकता का भी अभाव है. इसके चलते भी प्रदेश का सामान्य जाट वोटर उनसे वैसा जुड़ाव महसूस नहीं कर पाता जैसा कि ओमप्रकाश चौटाला और अभय चौटाला से करता है.’