पूरे भारत में टाइल्स के कारोबार के लिए मशहूर मोर्बी यानी मोरों का शहर गुजरात के समृद्धतम शहरों में से है. यह गुजरात के इसी नाम के जिले मोर्बी का मुख्यालय भी है. आज से तकरीबन 40 साल पहले इसने एक ऐसी आपदा का सामना किया था जिसके चलते यह शहर लगभग पूरी तरह तबाह हो गया था. 11 अगस्त, 1979 को आई यह आपदा मच्छू नदी पर बने मच्छू बांध के ढहने का नतीजा थी.

उस साल मॉनसून के दौरान पश्चिमी भारत में भारी बारिश हो रही थी. इसके चलते सौराष्ट्र (मोर्बी गुजरात के इसी हिस्से में है) के कुछ क्षेत्रों में हल्की बाढ़ की स्थिति थी और मच्छू बांध पानी से लबालब भर चुका था. सरकारी स्तर पर किसी को यह सूचना नहीं थी कि इस बांध के टूटने का खतरा है. बताया जाता है कि तीन दिन से ओवरफ्लो हो रहा बांध 11 अगस्त को दोपहर करीब सवा तीन बजे टूट गया और अगले 15 मिनट में सारा शहर पानी में डूब गया. इसके बाद मोर्बी के मकान और दूसरी इमारतें जमीन में धंसने लगीं और भारी संख्या में लोग और जानवर मरने लगे.

चार किलोमीटर लंबा बांध जिस तरह से टूटा था उसने मोर्बी के लोगों को संभलने के लिए कुछ मिनट का समय भी नहीं दिया था. इसके चलते अगले कुछ ही घंटों में यहां की 15 से 20 हजार की आबादी काल के गाल में समा गई. कुछ अनुमानों में इसे 25 हजार तक बताया जाता है. भारत के हालिया इतिहास में इतने लोग एक साथ गुजरात में ही तब मरे थे जब 2001 में यहां भूकंप आया था. आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक इस भूकंप से लगभग 20 हजार लोगों की मृत्यु हुई थी. 2004 में आई सूनामी की वजह से भारत में करीब 12 हजार लोग मौत का शिकार हुए थे. और 1984 में हुई भोपाल गैस त्रासदी में मरने वालों का आधिकारिक आंकड़ा करीब ढाई हजार है. हालांकि कहा जाता है कि इसके चलते करीब 10 हजार से ज्यादा लोगों की मौत हुई. ये आंकड़े मच्छू बांध के टूटने को भारत की सबसे विध्वंसकारी दुर्घटनाओं में दर्ज कर देते हैं.

राज्य सरकार ने मोर्बी में हुई दुर्घटना की जांच के लिए इसके तुरंत बाद ही एक आयोग बनाया था. लेकिन इसे 18 महीने बाद भंग कर दिया गया. उस समय राज्य सरकार के इस फैसले की काफी आलोचना हुई थी. मानवाधिकार कार्यकर्ताओं का कहना था कि आयोग की जांच में सिंचाई विभाग के बड़े अधिकारियों को जिम्मेदार ठहराया जा रहा था. इस बात के पक्ष में उनके तर्क थे कि बांध निर्माण में तकनीकी गड़बड़ियां तो थीं ही साथ ही अधिकारी पानी भराव और निकास के लिए जिस गणना पद्धति का उपयोग करते थे, वह भी सही नहीं थी. भारी बारिश के दौरान यही गलतियां बांध टूटने का कारण बनीं. कुछ समय बाद सुप्रीम कोर्ट ने आयोग को भंग करने के सरकारी फैसले को सही ठहराया. इसके बाद कभी इस मामले की जांच नहीं हो पाई और आज तक इस घटना की जिम्मेदारी तय नहीं की जा सकी है.