आज हिंदी दिवस है. आप इसे हिंदी का हैप्पी बर्थ डे, यौमे पैदाइश, सालगिरह, जन्म दिवस जो चाहें कह सकते हैं. इस दिन हिंदी की ढूंढ-खोज होती है. हिंदी इतनी शैतान है कि आजादी के बाद से आसानी से मिल नहीं रही है. हिंदी दिवस के कार्यक्रम के भाषण अभी ठीक से रटे भी नहीं जा पाते हैं कि वह भाग निकलती है और किसी सरकारी प्राइमरी स्कूल में मिड डे मील खाने लगती है. अफसरों से लेकर बुद्धिजीवी तक उसका पीछा करते हैं और वह चकमा देकर थोड़ी देर के लिए किसी कान्वेंटगामी बच्चे के पास जाकर बैठ जाती है. बच्चा उससे पूछता है - अरे, यार इतने दिन कहां थी तू हिंदी. मेरे, मार्क्स फिर से हिंदी में कम आए हैं. कुछ कर न. क्यों मेरा ग्रेड खराब कर रही है. हिंदी मुस्कराते हुए कहती है - चुप हो, इतनी हिंदी न झाड़, कहीं फाइन-वाइन लग गया तो मुझे मत कहना.

और फिर हिंदी वहां से भी भाग निकलती है. हिंदी डाल-डाल और सारे हिंदी सेवक पात-पात. हिंदी दिवस वाले दिन हरेक डिजाइन के बुद्धिजीवी अपने मतभेद भुला देते हैं और संयुक्त मोर्चा बनाकर हिंदी का पीछा करते हैं. लेकिन वह फिर भी किसी के हाथ नहीं आती.

खुद को राष्ट्रवादी रूझान का बताने वाले हिंदी सेवक उसका पीछा करते हुए कहते हैं, ‘हे, मां भारती की जिह्वा, मेरी संस्कृति का गौरव तुम कहां जा रही हो. तुम्हारे लिए कितनी सारी गोष्ठियां, कार्यक्रम किए जा रहे हैं. तुम्हारे स्वागत के लिए लाये गए दीप प्रज्ज्वलन वाले दीपक का तेल सूख रहा है. तुम्हारे इंतजार में खाली बैठे मुख्य अतिथि महोदय सिगरेट की तलब में मरे जा रहे हैं.’

दूसरी तरफ हिंदी के पीछे-पीछे दौड़ते वामपंथी अपने हालिया प्रकाशित काव्य संग्रह के साथ नारा लगाते हैं - लाल सलाम, लाल सलाम, हिंदी तुझको लाल सलाम. छठे वेतनमान और मोटी तनख्वाहों से लैस प्रोफेसर अपने युवा दस्ते का साथ देते हुए आह्वान करते हैं - तुम कहां जा रही हो हिंदी. तुम गरीबों-मजदूरों-सर्वहाराओं की भाषा हो. रुक जाओ, तुम्हें क्रांति की कसम.

इधर, हिंदी का पीछा चल रहा होता है. उधर, हिंदी दिवस के एक सेमिनार में आमंत्रित आलोचक सोच रहा होता है कि जिस कार्यक्रम में मैं बुलाया गया हूं उसके आयोजक की विचारधारा के बारे में ठीक से पता नहीं कर सका हूं. भाषण में दृष्टिकोषण से ज्यादा जरूरी राजनीतिक कोण है. खैर, उससे ज्यादा कौन जानता है कि विचारधारा तो द्रव जैसी मानसिक अवस्था है. जिस बर्तन में रख दो उसी का आकार ले लेती है. और वह तो इस मामले में गैस है.

इसी कार्यक्रम में आमंत्रित एक कवियत्री इस जुगाड़ में होती है कि आज के हिंदी दिवस पर इधर-उधर की फालतू बातों के बीच कम से कम एक काम की बात हो जाए और उन्हें पाब्लो नेरूदा का भारतीय-महिला संस्करण घोषित कर दिया जाए. हाल ही में एक कार्यक्रम में उसे आधुनिक महादेवी घोषित किया ही जा चुका है. उसके बाद उसने तय किया है कि अब भारतीय कवियत्रियों से अपनी तुलना करवाने से बचेगी. पिछले दिनों उसने एक कार्यक्रम में जाने से इसीलिए इनकार कर दिया था क्योंकि वहां पर उसकी तुलना मीराबाई से की जानी थी. अब वह चाहती है कि गद्य लेखन के लिए उसकी तुलना वर्जीनिया वुल्फ से की जाए.

इन सारी गतिविधियों के बीच हिंदी इन सबसे बचकर दौड़ती-भागती रहती है. लेकिन, आखिरकार बुद्धिजीवी, राजभाषा विभाग, साहित्य अकादमियां, प्रकाशक, बेस्ट सेलर वगैरह मिलकर उसे पकड़ ही लेते हैं. सड़क पर चलने वाले आम राहगीर जिन्हें हिंदी के अलावा और कोई जबान बोलनी नहीं आती है, ये सारा तमाशा देखकर समझते हैं कि कोई हिंदी नाम का खतरनाक अपराधी फरार हो गया था, चलो अच्छा हुआ कि वह देश के मुस्तैद तंत्र की पकड़ में आ गया.

हिंदी को हिरासत में लेने के बाद उसे तुरंत हिंदी दिवस पर हो रहे सरकारी-गैर सरकारी कार्यक्रमों में वक्ता रूपी मजिस्ट्रेटों की ज्यूरी के सामने पेश कर दिया जाता है. वे तुरंत हिंदी को कठघरे में खड़ा कर देते हैं और भाषण के रुप में अपना फैसला सुनाने लगते हैं. हिंदी तुम्हारी हालत बहुत खराब है, तुम्हें फौरन बुद्धिजीवियों द्वारा संचालित भाषा के किसी दवाखाने में भर्ती करा देना चाहिए. इसी बीच वे अपने फोन पर देखते हैं कि कवियत्री ने उनके भाषण के बारे में यह फेसबुक टिप्पणी की है कि अगर हिंदी समाज को उन जैसा सार्वजनिक बुद्धिजीवी नहीं मिला होता तो गड्‍ढे में पड़ी हिंदी की हालत लगातार गिरते भूजल स्तर जैसी हो जाती. आलोचक वक्ता महोदय की इच्छा थी कि कार्यक्रम की भसड़ में फिलहाल कवियत्री की प्रतिभा की उपेक्षा कर दी जाए. लेकिन, फेसबुक टिप्पणी देखकर वे कवियत्री को नेरूदा और कालिदास का मिला-जुला संस्करण घोषित कर देते हैं.

इस बात से एक युवा कवि काफी निराश होता है. उसे लग रहा था कि उसकी कविताओं में नई प्रवृत्ति को रेखांकित करते हुए आज आलोचक जी उसके नाम से किसी नए ‘वाद’ की घोषणा करेंगे. लेकिन नौजवान कवि संयम बरकरार रखते हुए तुरंत अपनी आशु कविता के जरिये आलोचक का आभार प्रकट करता है. उसके आभार प्रकट करने के दौरान माहौल काफी भारी हो जाता है, कार्यक्रम में मौजूद तमाम गणमान्यों के चमचों को नींद आने लगती है. गणमान्य को भी उबासी आती है, लेकिन सार्वजनिक मौके पर इंद्रियों को जीत लेने की कला ही उन्हें गणमान्य बनाती है.

हिंदी की सेवा करने वाला एक दूसरा खेमा भी होता है. यह मानता है कि हिंदी के कारनामे देखने हैं तो वाट्सएप और फेसबुक पर देखो. कितनी चंचल और शोख है, वहां हमारी हिंदी. इस मत के समर्थकों में से किसी से नाराज होकर कोई आलोचक महोदय लिख-कह देते हैं कि इसकी कविता ट्रांसपोर्ट कारोबारियों के लिए काफी मुफीद है. ट्रकों के पीछे लिखी जाने वाली शायरी में वह सदैव प्रासंगिक रहेगा. इसके बाद वह कवि फिल्मों, विज्ञापन वाली हिंदी में चला जाता है और काफी पैसे बनाता है.

लेकिन, वह बार-बार साहित्य की दुनिया में लौटकर आता है और अपनी जेब से पैसे लगाकर, या नाममात्र की हिंदी वाले साहित्योत्सवों में अकादमिक टाइप के लोगों से इंतकाम लेता है. इसके बाद अकादमिक आलोचक के समर्थकों और उस लोकप्रिय लेखक के समर्थकों के बीच मंच और मंचेत्तर जगहों पर काफी गाली-गलौज होता है. इन गालियों के बहुत हल्के और निम्न स्तर पर हिंदी दिवस पर चिंता जताई जाती है. इसके बाद मंत्री जी अपने अफसरों से कहते हैं - अब से हर काम हिंदी में. अफसर उनसे कहते हैं - यस सर. और इस प्रकार हिंदी दिवस अपनी गति को प्राप्त हो जाता है.